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बूथ कैप्चरिंग के तोड़ में लाई गई थी EVM, जानें- इसके शुरुआत से अब तक के सभी विवादों की कहानी

निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव का होना किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए महत्वपूर्ण है और भारत के परिपेक्ष में इसकी अहमियत सबसे ज्यादा है, क्योंकि भारत पूरे विश्व में सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रतिनिधित्व करता है.

भारतीय लोकतंत्र में 'बूथ कैप्चरिंग' जैसी समस्या से सामना पहली बार 1957 के आम चुनाव में हुआ. यह घटना बेगूसराय जिले की मटिहानी विधानसभा सीट के रचियाही इलाके में हुई. बूथ कैप्चरिंग, 1970 और 1980 के दशक के दौरान यह शब्द अखबारों की सुर्खियों में हुआ करता था. इस दौरान चुनाव में भाग लेने वाली पार्टियों और उम्मीदवारों की संख्या में कई गुना इजाफा हुआ और इसके साथ ही धन और बल के माध्यम से चुनाव जीतने के लिए बूथ कैप्चरिंग का नया हथकंडा अपनाया गया. पूरी डिटेल खबर के लिए यहां क्लिक करें

भारत में होने वाले आम चुनाव एक ऐसे महाकुम्भ की तरह है जिसे संपन्न कराने की जिम्मेदारी अपने आप में बहुत कठिन है. मगर चुनाव-दर-चुनाव  मजबूत होता भारतीय लोकतंत्र काबिल-ए-तारीफ है. हम इस सीरीज में अब तक हुए  महत्वपूर्ण आम चुनावों में  भारतीय लोकतंत्र की निष्ठा और उसकी जिम्मेदारियों का एक खाका तैयार कर रहे हैं. आज ज़िक्र होगा  ईवीएम  यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का जिसके  जरिए मतदाता  हर चुनाव में मतदान करता है.

आखिर क्यों लाना पड़ा ईवीएम? निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव का होना किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए महत्वपूर्ण है और भारत के परिपेक्ष में इसकी अहमियत सबसे ज्यादा है, क्योंकि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र का है. ऐसे में आम चुनाव के प्रहरी कहे जाने वाले चुनाव आयोग के लिए यह सबसे बड़ा सिरदर्द था कि चुनाव में होने वाली धांधलियों पर कैसे लगाम लागाई जाए. निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव को सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग हमेशा चुनावी प्रक्रिया में सुधार करता रहा है. इस कड़ी में आगे काम करते हुए सभी दलों की सहमति से ईवीएम यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन लाई गई.

ईवीएम क्या है भारत की दो पब्लिक सेक्टर कम्पनियां भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) बैंगलोर और इलेक्ट्रॉनिक्स कारपोरेशन ऑफ़ इन्डिया (ECIL) हैदराबाद चुनाव आयोग के लिए ईवीएम का निर्माण करते हैं. ईवीएम के दो हिस्से होते हैं एक हिस्सा बैलेटिंग यूनिट जो मतदाताओं के द्वारा संचालित किए जाते हैं तो दूसरा कंट्रोल यूनिट पोलिंग अफसरों की निगरानी में रहता है. ईवीएम के दोनों हिस्से पांच मीटर लंबे तार के जरिए जुड़े रहते हैं. एक ईवीएम में 64 प्रत्याशियों के नाम दर्ज हो सकते हैं. मतों को दर्ज करने की क्षमता की बात करें तो एक ईवीएम मशीन में 3840 मतों को दर्ज किया जा सकता है. ईवीएम का संचालन बिना बिजली के किया जाता है क्योंकि इसे बैटरी से पावर दिया जाता है.

ईवीएम का इस्तेमाल 1982 में केरल के परूर विधानसभा सीट के 50 मतदान केंद्रों पर मतदान के लिए पहली बार ईवीएम का इस्तेमाल किया गया था. 'ईवीएम पूरी तरह से वैधानिक रूप हासिल कर ले' इसके लिए 1983 में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से निर्देश जारी किए गए थे. तब तत्काल प्रभाव से इसके इस्तेमाल पर रोक लगाई गई थी. चुनाव आयोग की वेबसाइट के मुताबिक, साल 1988 में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में बदलाव करते हुए नई धारा 61ए जोड़ी गई जिसके तहत चुनाव आयोग को यह अधिकार प्राप्त हो गया कि वह चुनावों में ईवीएम का इस्तेमाल कर सकते हैं. ईवीएम को भारतीय चुनाव में लाना रातों-रात का खेल नहीं था. बल्कि इसके पीछे एक लंबी प्रक्रिया थी.

बूथ कैप्चरिंग के तोड़ में लाई गई थी EVM, जानें- इसके शुरुआत से अब तक के सभी विवादों की कहानी

ईवीएम के इस्तेमाल का अधिकार हासिल होने के बाद साल 1992 में विधि और न्याय मंत्रालय ने भारत के निर्वाचक कानून में आवश्यक संशोधन की अधिसूचना जारी की. चुनाव आयोग से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक 1998 में एमपी, राजस्थान और दिल्ली की 16 विधानसभा सीटों पर ईवीएम का इस्तेमाल किया गया. 1999 के लोकसभा चुनाव में 46 लोकसभा सीटों पर ईवीएम का इस्तेमाल हुआ. साल 2000 के बाद देश के सभी लोकसभा, विधानसभा, उपचुनाव में ईवीएम का इस्तेमाल होने लगा. 2001 में तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी के सभी सीटों पर ईवीएम से चुनाव संपन्न कराए गए. 2001 के बाद 3 लोकसभा और 110 से ज्यादा विधानसभा चुनावों में ईवीएम का इस्तेमाल किया गया. साल 2004 के आम चुनाव में देश के सभी मतदान केंद्रों पर 10.75 लाख ईवीएम के जरिए मतदान कराए गए और इसके साथ भारत ई-लोकतंत्र में परिवर्तित हो गया. पिछले लोकसभा चुनाव में यानी 2014 के लोकसभा चुनाव में 55.41 करोड़ मतदाताओं ने ईवीएम का इस्तेमाल किया.

ईवीएम पर उठे सवाल आए दिन हर चुनाव के बाद सत्ता से बाहर रहने वाली पार्टियां ही ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती आई हैं.  साल 2009 में लोकसभा चुनावों के बाद ईवीएम पहली बार विवादों में आया. इस दौरान बीजेपी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार लालकृष्ण आडवानी और तत्कालीन जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी ने ईवीएम के जरिए चुनावों में धांधली के आरोप लगाए. साल 2010 में बीजेपी नेता जीवीएल नरसिम्हा राव ने एक किताब लिखी- 'डेमोक्रेसी एट रिस्क, कैन वी ट्रस्ट आवर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन?' जिसमें उन्होंने ईवीएम पर सवाल उठाए. इस दौरान सुब्रमण्यम स्वामी ने अपनी शिकायत को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया था. ईवीएम के सत्यापन के लिए अक्टूबर, 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने वीवीपैट वाली ईवीएम के इस्तेमाल का आदेश दिया.

बूथ कैप्चरिंग के तोड़ में लाई गई थी EVM, जानें- इसके शुरुआत से अब तक के सभी विवादों की कहानी

2014 के लोकसभा चुनाव के बाद लगभग हर चुनाव में हारने वाली पार्टियां ईवीएम पर सवाल खड़ा करती आई हैं. मार्च 2017 में 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद 10 अप्रैल 2017 को 13 राजनीतिक दल चुनाव आयोग गए और ईवीएम पर सवाल उठाए. मई 2017 में आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज ने ईवीएम जैसी मशीन लाकर दिल्ली विधानसभा के भीतर डेमो के जरिए दिखाया कि ईवीएम से छेड़छाड़ संभव है. इसे संज्ञान में लेते हुए 20 मई 2017 को चुनाव आयोग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए 3 जून 2017 को ईवीएम हैक करने की चुनौती दी. उस दिन केवल दो राजनीतिक दल- एनसीपी और सीपीएम चुनाव आयोग गए लेकिन दोनों ने ईवीएम हैक करने की चुनौती में भाग नहीं लिया बल्कि ईवीएम कैसे काम करती है उसकी जानकारी ली.

चुनाव आयोग की सफाई ईवीएम की सुरक्षा के मुद्दे पर चुनाव आयोग बार-बार कहता आया है कि मशीन मतदान प्रक्रिया के लिए काफी सुदृढ़ है और इससे किसी भी तरह की छेड़खानी नहीं की जा सकती. इसके पीछे चुनाव आयोग का तर्क यह है कि ईवीएम कम्प्यूटर या इंटरनेट से संचालित नहीं होती है जिस वजह से इसे हैक करना नामुमकिन है. किसी तरह की कनेक्टिविटी जैसे- हार्डवेयर पोर्ट, वायरलेस, वाईफाई या ब्लूटूथ डिवाइस से ईवीएम का संचालन संभव नहीं है इसलिए मशीन टैम्परिंग का सवाल ही नहीं उठता है.

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