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मरे हुए लोगों से AI कैसे करवा रहा बात! नई तकनीक की सच्चाई डरा देगी

Artificial Intelligence: AI अब इंसानों की ज़िंदगी के इतने करीब पहुंच गई है कि वह मर चुके लोगों की आवाज़ तक को जीवित कर सकती है.

Artificial Intelligence: AI अब इंसानों की ज़िंदगी के इतने करीब पहुंच गई है कि वह मर चुके लोगों की आवाज़ तक को जीवित कर सकती है.

AI अब इंसानों की ज़िंदगी के इतने करीब पहुंच गई है कि वह मर चुके लोगों की आवाज़ तक को जीवित कर सकती है. अक्सर जब कोई अपना गुज़र जाता है तो लोग उनकी तस्वीरों और वीडियोज़ को बार-बार देखकर यादें ताज़ा करते हैं. कई बार मन में यह ख्वाहिश भी होती है कि काश उनसे एक बार बात हो पाती. अब तकनीक ने इसका रास्ता निकाल लिया है. एक ऐसा AI टूल सामने आया है जो मृतक की आवाज़ में आपसे बातचीत कर सकता है. हालांकि यह असली संवाद नहीं होगा बल्कि पूरी तरह से मशीन द्वारा तैयार किया गया भ्रम होगा.

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मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार,
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, "Creepy AI" नामक यह सॉफ्टवेयर मृत रिश्तेदारों या करीबियों की आवाज़ की नकल कर उनसे बातचीत का अनुभव देता है. इसका सिस्टम मरे हुए लोगों के पुराने पैटर्न और बातचीत को पहचानकर उसी अंदाज़ में प्रतिक्रिया करता है.
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यानी ऐसा लगता है जैसे सामने वही व्यक्ति मौजूद हो. शुरुआती दौर में इस तकनीक से लोग बेहद खुश दिखे क्योंकि उन्हें अपने प्रियजनों से जुड़ाव का एहसास हुआ. कई यूज़र्स तो रोज़ उनसे सलाह-मशविरा करने भी लगे.
यानी ऐसा लगता है जैसे सामने वही व्यक्ति मौजूद हो. शुरुआती दौर में इस तकनीक से लोग बेहद खुश दिखे क्योंकि उन्हें अपने प्रियजनों से जुड़ाव का एहसास हुआ. कई यूज़र्स तो रोज़ उनसे सलाह-मशविरा करने भी लगे.
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लेकिन मनोवैज्ञानिक और विशेषज्ञ इसके नतीजों को लेकर चिंतित हैं. उनका कहना है कि लंबे समय तक ऐसी तकनीक का इस्तेमाल लोगों को हकीकत से काट सकता है. धीरे-धीरे वे असली दुनिया की बजाय काल्पनिक रिश्तों में जीने लगेंगे जो मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है. इसके अलावा इसमें एक बड़ा खतरा प्राइवेसी का भी है. जब लोग अपने मृत परिजनों की जानकारी AI को सौंपते हैं तो वह डेटा कंपनी के पास स्टोर होता है. यह जानकारी संवेदनशील हो सकती है और दुरुपयोग का खतरा हमेशा बना रहता है.
लेकिन मनोवैज्ञानिक और विशेषज्ञ इसके नतीजों को लेकर चिंतित हैं. उनका कहना है कि लंबे समय तक ऐसी तकनीक का इस्तेमाल लोगों को हकीकत से काट सकता है. धीरे-धीरे वे असली दुनिया की बजाय काल्पनिक रिश्तों में जीने लगेंगे जो मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है. इसके अलावा इसमें एक बड़ा खतरा प्राइवेसी का भी है. जब लोग अपने मृत परिजनों की जानकारी AI को सौंपते हैं तो वह डेटा कंपनी के पास स्टोर होता है. यह जानकारी संवेदनशील हो सकती है और दुरुपयोग का खतरा हमेशा बना रहता है.
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कंपनी का तर्क है कि उनका मकसद सिर्फ लोगों को अपने खोए हुए प्रियजनों से भावनात्मक रूप से जुड़ने का अवसर देना है. लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यह लोगों की भावनाओं का इस्तेमाल करने जैसा है. कई मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि लंबे समय में यह तकनीक मानसिक अस्थिरता को बढ़ावा दे सकती है और लोग फिक्शनल दुनिया को ही हकीकत मानने लगेंगे.
कंपनी का तर्क है कि उनका मकसद सिर्फ लोगों को अपने खोए हुए प्रियजनों से भावनात्मक रूप से जुड़ने का अवसर देना है. लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यह लोगों की भावनाओं का इस्तेमाल करने जैसा है. कई मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि लंबे समय में यह तकनीक मानसिक अस्थिरता को बढ़ावा दे सकती है और लोग फिक्शनल दुनिया को ही हकीकत मानने लगेंगे.
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कुल मिलाकर, यह तकनीक जितनी आकर्षक और सुकून देने वाली लगती है उतनी ही डरावनी और खतरनाक भी साबित हो सकती है. लोगों को इसे सिर्फ एक तकनीकी प्रयोग मानकर इस्तेमाल करना चाहिए, वरना यह असल ज़िंदगी से दूरी बढ़ाने का कारण बन सकती है.
कुल मिलाकर, यह तकनीक जितनी आकर्षक और सुकून देने वाली लगती है उतनी ही डरावनी और खतरनाक भी साबित हो सकती है. लोगों को इसे सिर्फ एक तकनीकी प्रयोग मानकर इस्तेमाल करना चाहिए, वरना यह असल ज़िंदगी से दूरी बढ़ाने का कारण बन सकती है.

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