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International Everest Day: एवरेस्ट पर कितनी ऊंचाई पर जाने पर फूलने लगती है सांस, कहां पर है डेथ जोन?

International Everest Day: एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचने से पहले एक डेथ जोन आता है. आइए जानते हैं कि क्यों है यह खतरनाक और यह कितनी ऊंचाई पर आता है.

International Everest Day: एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचने से पहले एक डेथ जोन आता है. आइए जानते हैं कि क्यों है यह खतरनाक और यह कितनी ऊंचाई पर आता है.

International Everest Day: हर साल 29 मई को दुनिया एवरेस्ट दिवस मनाती है. अब तक कई लोगों ने माउंट एवरेस्ट को फतह किया है. लेकिन यह काफी कम लोग जानते हैं कि चोटी पर पहुंचने से काफी पहले ही पर्वतारोहियों को सांस लेने में दिक्कत होने लगती है. 8000 मीटर से ऊपर एक डेथ जोन है जहां ऑक्सीजन का स्तर इतनी तेजी से गिर जाता है कि इंसान का शरीर धीरे-धीरे काम करना बंद करने लगता है. आइए जानते हैं इस डेथ जोन के बारे में पूरी जानकारी.

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काफी लोग मानते हैं कि सांस लेने की समस्या सिर्फ एवरेस्ट की चोटी के पास ही शुरू होती है. लेकिन असल में इसका असर काफी पहले शुरू हो जाता है. 2500 से 3500 मीटर की ऊंचाई के बीच हवा काफी पतली हो जाती है. ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है और सर दर्द, चक्कर आना, थकान और थोड़ी सी भी हलचल करने पर सांस फूलने जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं.
काफी लोग मानते हैं कि सांस लेने की समस्या सिर्फ एवरेस्ट की चोटी के पास ही शुरू होती है. लेकिन असल में इसका असर काफी पहले शुरू हो जाता है. 2500 से 3500 मीटर की ऊंचाई के बीच हवा काफी पतली हो जाती है. ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है और सर दर्द, चक्कर आना, थकान और थोड़ी सी भी हलचल करने पर सांस फूलने जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं.
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जब तक पर्वतारोही 5364 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एवरेस्ट बेस कैंप तक पहुंचाते हैं तब तक ऑक्सीजन की उपलब्धता समुद्र तल की तुलना में लगभग आधी रह चुकी होती है. इस बिंदु से आगे हर शारीरिक गतिविधि थकाने वाली हो जाती है और पर्वतारोहियों को ऊंचाई पर होने वाली खतरनाक बीमारियों से बचने के लिए सावधानी से अपने शरीर को वहां के माहौल के हिसाब से ढालना पड़ता है.
जब तक पर्वतारोही 5364 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एवरेस्ट बेस कैंप तक पहुंचाते हैं तब तक ऑक्सीजन की उपलब्धता समुद्र तल की तुलना में लगभग आधी रह चुकी होती है. इस बिंदु से आगे हर शारीरिक गतिविधि थकाने वाली हो जाती है और पर्वतारोहियों को ऊंचाई पर होने वाली खतरनाक बीमारियों से बचने के लिए सावधानी से अपने शरीर को वहां के माहौल के हिसाब से ढालना पड़ता है.
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8000 मीटर से ऊपर का इलाका दुनिया भर में डेथ जोन के नाम से जाना जाता है. यहां ऑक्सीजन का स्तर सामान्य वायुमंडलीय स्थितियों की तुलना में लगभग एक तिहाई रह जाता है. बिना अतिरिक्त ऑक्सीजन के इंसान का जीवित रहना काफी मुश्किल हो जाता है.
8000 मीटर से ऊपर का इलाका दुनिया भर में डेथ जोन के नाम से जाना जाता है. यहां ऑक्सीजन का स्तर सामान्य वायुमंडलीय स्थितियों की तुलना में लगभग एक तिहाई रह जाता है. बिना अतिरिक्त ऑक्सीजन के इंसान का जीवित रहना काफी मुश्किल हो जाता है.
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डेथ जोन के अंदर शरीर अब वहां के माहौल के हिसाब से खुद को ढाल नहीं पाता. ऑक्सीजन की भारी कमी की वजह से कोशिकाएं, मांसपेशियां और अंग धीरे-धीरे काम करना बंद करने लगते हैं. यहां तक की खाना खाना, सोना या फिर ऊर्जा वापस पाना भी लगभग नामुमकिन हो जाता है.
डेथ जोन के अंदर शरीर अब वहां के माहौल के हिसाब से खुद को ढाल नहीं पाता. ऑक्सीजन की भारी कमी की वजह से कोशिकाएं, मांसपेशियां और अंग धीरे-धीरे काम करना बंद करने लगते हैं. यहां तक की खाना खाना, सोना या फिर ऊर्जा वापस पाना भी लगभग नामुमकिन हो जाता है.
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इतनी ज्यादा ऊंचाई जानलेवा स्थिति पैदा कर सकती है. ऑक्सीजन की कमी की वजह से दिमाग में सूजन आने लगती है और साथ ही फेफड़ों में तरल पदार्थ भी जमा होने लगता है. अगर तुरंत नीचे ना उतरा जाए तो इन बीमारियों की वजह से मतिभ्रम,‌ भ्रम की स्थिति, जोरदार खांसी, शरीर का संतुलन बिगड़ना और अचानक बेहोश हो जाना जैसी समस्याएं हो सकती हैं.
इतनी ज्यादा ऊंचाई जानलेवा स्थिति पैदा कर सकती है. ऑक्सीजन की कमी की वजह से दिमाग में सूजन आने लगती है और साथ ही फेफड़ों में तरल पदार्थ भी जमा होने लगता है. अगर तुरंत नीचे ना उतरा जाए तो इन बीमारियों की वजह से मतिभ्रम,‌ भ्रम की स्थिति, जोरदार खांसी, शरीर का संतुलन बिगड़ना और अचानक बेहोश हो जाना जैसी समस्याएं हो सकती हैं.
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डेथ जोन में तापमान अक्सर -30 डिग्री सेल्सियस से -40 डिग्री सेल्सियस के बीच गिर जाता है. इसके साथ ही ऑक्सीजन की कमी से सोचने समझने की शक्ति और फैसले लेने की क्षमता पर भी बुरा असर पड़ता है. कुछ ही मिनट में फ्रॉस्टबाइट हो जाता है.
डेथ जोन में तापमान अक्सर -30 डिग्री सेल्सियस से -40 डिग्री सेल्सियस के बीच गिर जाता है. इसके साथ ही ऑक्सीजन की कमी से सोचने समझने की शक्ति और फैसले लेने की क्षमता पर भी बुरा असर पड़ता है. कुछ ही मिनट में फ्रॉस्टबाइट हो जाता है.

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