यूपी का बांदा क्यों तोड़ रहा गर्मी के सारे रिकॉर्ड, भारत का यह जिला इतना गर्म क्यों है?
उत्तर प्रदेश का बांदा जिला इन दिनों भीषण तपिश के कारण दुनिया के सबसे गर्म स्थानों में शामिल हो चुका है. यहांं थार मरुस्थल की शुष्क हवाओं, पथरीली सतह और हरियाली की भारी कमी के तपन जानलेवा हो रही है.

- बांदा में रिकॉर्ड तोड़ 47.6 डिग्री तापमान दर्ज हुआ.
- थार मरुस्थल से गर्म हवाएं बांदा को झुलसा रही हैं.
- पथरीली जमीन और घटता वन क्षेत्र गर्मी बढ़ा रहे हैं.
- अवैध खनन और कंक्रीट जंगल 'हीट आइलैंड' बना रहे हैं.
गर्मी के मौसम में उत्तर भारत का तपना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थित बांदा जिले ने तपन के सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं. मई के महीने में सूरज की सीधी और तीखी किरणों ने इस पूरे शहर को एक जलती हुई भट्टी में तब्दील कर दिया है. हालात इस कदर बेकाबू हो चुके हैं कि दोपहर के वक्त सड़कों पर पूरी तरह सन्नाटा पसर जाता है और लोग अपने घरों में कैद होने को मजबूर हैं. यह केवल मौसम का सामान्य बदलाव नहीं है, बल्कि प्रकृति के साथ हुए खिलवाड़ का एक डरावना नतीजा है.
रिकॉर्ड तोड़ तापमान और वैश्विक सुर्खियां
बांदा जिला इन दिनों न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि वैश्विक स्तर पर सबसे गर्म क्षेत्रों की सूची में शीर्ष पर पहुंच गया है. मई के महीने में यहां का तापमान लगातार 47 से 48 डिग्री सेल्सियस के बीच दर्ज किया जा रहा है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, बीते एक महीने में यह शहर दो बार पूरी दुनिया का और तीन बार पूरे एशिया महाद्वीप का सबसे गर्म शहर घोषित हो चुका है. इस साल मई में यहां अधिकतम तापमान 47.6 डिग्री सेल्सियस तक जा पहुंचा, जिसने पिछले 75 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ दिया. इससे भी भयानक स्थिति 19 मई को देखी गई थी, जब यहां का पारा 48.2 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया था.
थार मरुस्थल से उठती आग की लपटें
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के वैज्ञानिकों के अनुसार, बांदा की इस रिकॉर्डतोड़ तपिश के पीछे पहला बड़ा भौगोलिक कारण राजस्थान का थार मरुस्थल है. इन दिनों थार मरुस्थल से बेहद शुष्क और झुलसाने वाली पछुआ हवाएं तेज गति से उत्तर प्रदेश के दक्षिणी हिस्से और बुंदेलखंड की तरफ बढ़ रही हैं. इन गर्म हवाओं के रास्ते में कोई प्राकृतिक अवरोध न होने के कारण ये सीधे बांदा को अपनी चपेट में ले रही हैं. इसके साथ ही, आसमान में बादलों की नाममात्र मौजूदगी न होने के कारण सूर्य की किरणें सीधे तौर पर धरती को तपा रही हैं.
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बुंदेलखंड की पथरीली सतह का कहर
बांदा जिले की भौगोलिक संरचना भी इसे बाकी मैदानी इलाकों से बिल्कुल अलग और अधिक गर्म बनाती है. पूरा बुंदेलखंड क्षेत्र अपनी पथरीली जमीन और विशाल चट्टानों के लिए जाना जाता है. ग्रेनाइट और भारी पत्थरों से ढकी यह जमीन दिन के समय सूरज की किरणों को बहुत तेजी से सोखती है और अत्यधिक गर्म हो जाती है. सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह पथरीली सतह रात के समय इस गर्मी को बहुत धीमी गति से वातावरण में वापस छोड़ती है. इसके परिणामस्वरूप यहां दिन के साथ-साथ रातें भी बेहद गर्म और बेचैन करने वाली हो जाती हैं.
पश्चिमी विक्षोभ की बेरुखी से बढ़ी आफत
इस साल मौसम चक्र की एक और बेरुखी ने बांदा की स्थिति को बदतर बना दिया. मई महीने की शुरुआत में आए पश्चिमी विक्षोभ के कारण उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में हल्की बूंदाबांदी हुई थी और लोगों को चिलचिलाती धूप से थोड़ी राहत मिली थी. लेकिन बुंदेलखंड का यह इलाका इस मौसमी बदलाव से पूरी तरह अछूता रह गया. यहां प्री-मानसून की एक बूंद भी नहीं गिरी, जिसके कारण अप्रैल के महीने से संचित हो रही गर्मी लगातार बढ़ती चली गई और पूरा जिला एक भीषण हीटवेव के दुष्चक्र में फंस गया.
हरियाली का पूरी तरह गायब होना
पर्यावरण विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बांदा के इस तरह भट्टी बनने का सबसे बड़ा और चिंताजनक कारण यहां का लगातार घटता वन क्षेत्र है. वर्तमान में बांदा जिले में सिर्फ 3% ग्रीन कवर यानी हरियाली बची है. अगर इसकी तुलना पड़ोसी जिलों से करें, तो चित्रकूट में 18% और ललितपुर में 11.5% वन क्षेत्र मौजूद है. पेड़ों की इस भारी कमी के कारण जमीन के अंदर की प्राकृतिक नमी पूरी तरह खत्म हो चुकी है. वनस्पति विहीन होने के कारण यहां 'अल्बीडो इफेक्ट' काफी बढ़ गया है, जिससे धूप अवशोषित होने के बजाय वापस लौटकर वातावरण को और गर्म कर रही है.
केन नदी का सीना चीरता अवैध खनन
बांदा की जीवनदायिनी मानी जाने वाली केन नदी आज खुद मानवीय लालच के कारण सिसक रही है. नदी और उसके आस-पास के विशाल क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर अवैध बालू (मोरंग) का खनन किया जा रहा है. स्थानीय सूत्रों के अनुसार, यहां से हर दिन 2,000 से 3,000 ट्रक बालू अवैध रूप से बाहर भेजा जा रहा है. अत्यधिक दोहन के कारण नदी का जलस्तर अपने न्यूनतम बिंदु पर पहुंच गया है. बालू हटने से नदी तट की प्राकृतिक वनस्पतियां नष्ट हो चुकी हैं, जिसने इस पूरे क्षेत्र के प्राकृतिक कूलिंग सिस्टम को हमेशा के लिए ठप कर दिया है.
सर्दियों में सूखे ने बिगाड़ा खेल
इस साल मौसम की मार सिर्फ गर्मियों में ही नहीं, बल्कि सर्दियों के मौसम से ही शुरू हो गई थीय दिसंबर से लेकर अप्रैल के बीच देश में बहुत कम पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय हुए. इसके कारण सर्दियों के महीनों और मार्च-अप्रैल में होने वाली पारंपरिक छिटपुट बारिश पूरी तरह गायब रही. आमतौर पर गर्मियों के आगमन से ठीक पहले होने वाली यह हल्की बारिश सूखी मिट्टी को अंदर तक ठंडा रखती है. इस बार बारिश न होने से शुरुआती महीनों से ही 'हीट-बिल्डअप' यानी गर्मी का संचय होना शुरू हो गया, जो मई आते-आते ज्वालामुखी बन गया.
'मैन-मेड हीट आइलैंड' की कड़वी हकीकत
भूवैज्ञानिकों का स्पष्ट कहना है कि बांदा अब एक प्राकृतिक शहर न रहकर इंसानी हरकतों से निर्मित मैन-मेड हीट आइलैंड में तब्दील हो चुका है. पेड़ न होने से वातावरण में नमी नहीं है, नमी की कमी से जलस्रोत और नदियां तेजी से सूख रहे हैं. सूखी नदियां और अंधाधुंध बालू खनन मिलकर स्थानीय स्तर पर एक कृत्रिम 'ग्रीनहाउस इफेक्ट' पैदा कर रहे हैं. इसके साथ ही, जिले में चौबीसों घंटे चलने वाले पत्थर काटने के क्रशर उद्योग और भारी ट्रकों के अनवरत धुएं ने रात के समय भी तापमान को नीचे गिरने का कोई रास्ता नहीं छोड़ा है.
एनजीटी के नियमों की अनदेखी
बांदा की इस प्रशासनिक और पर्यावरणीय बदहाली को सुधारने के प्रयास भी केवल कागजों तक ही सीमित दिखाई देते हैं. प्रशासन की ओर से जो नए पौधे लगाए भी जा रहे हैं, वे नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के तय मानकों और स्थानीय जलवायु के अनुकूल नहीं हैं. सही रखरखाव और गलत प्रजाति के चयन के कारण ये पौधे भीषण गर्मी के पहले ही दौर में सूखकर नष्ट हो जाते हैं. भूवैज्ञानिकों ने कड़ी चेतावनी दी है कि यदि अवैध खनन पर तुरंत पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया गया और जल संरक्षण के साथ सघन वृक्षारोपण नहीं हुआ, तो आने वाले सालों में बांदा रहने लायक नहीं बचेगा.
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