Opinion: भारत-चीन संबंध और फ्री तिब्बत पर नई दिल्ली का 'अस्पष्ट' रुख

तिब्बत की निर्वासित सरकार, जिसे केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (CTA) भी कहा जाता है, उसने ने एक बार फिर पेनपा त्सेरिंग को अपना नया राष्ट्रपति चुना है. उन्होंने बुधवार को मैक्लोडगंज, धर्मशाला के दलाई लामा मंदिर में 'सिक्योंग' (तिब्बती भाषा में राष्ट्रपति) के रूप में शपथ ली. इस शपथ ग्रहण समारोह में 14वें दलाई लामा भी शामिल हुए. भारत के वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा, इस कार्यक्रम में अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम (UK) और लैटिन अमेरिका के आधिकारिक प्रतिनिधि भी मौजूद थे. इन सभी ने धर्मशाला (जो कि CTA का मुख्यालय है) के मंच का उपयोग करते हुए, तिब्बत में चीन की भूमिका की कड़ी निंदा की. यह सब ऐसे समय में हुआ जब भारत और चीन 2020 के सीमा गतिरोध के बाद एक बार फिर अपने संबंधों को सुधारने (मेल-मिलाप) की कोशिश कर रहे हैं.
CTA की स्थापना दलाई लामा ने 1959 में की थी और 2011 तक वह इस संस्था के सर्वोच्च प्रमुख थे, जो निर्वासित तिब्बतियों के राजनीतिक मामलों को देखती है. साल 2011 में, उन्होंने अपनी पूरी राजनीतिक और प्रशासनिक शक्तियां एक लोकतांत्रिक रूप से चुने गए नेता को सौंप दीं. शक्तियों के इस हस्तांतरण के बाद पेनपा त्सेरिंग सीधे चुने गए तीसरे तिब्बती नेता हैं. CTA के राष्ट्रपति के रूप में यह उनका दूसरा कार्यकाल है.
भारत-चीन संबंधों में उतार-चढ़ाव
जहाँ एक तरफ दलाई लामा को भारत में शरण मिलना भारत और चीन के बीच विवाद की एक पुरानी वजह रहा है, वहीं बीजिंग (चीन) CTA की स्थापना को लेकर भी नई दिल्ली (भारत) पर गुस्सा जाहिर करता रहा है.
अप्रैल-मई 2020 में शुरू हुए सीमा गतिरोध के बाद दोनों देशों के बीच लगभग चार साल तक रिश्ते तनावपूर्ण रहे. इस गतिरोध के दौरान जून 2020 में गलवान घाटी में हिंसक झड़प भी हुई थी. इसके बाद, भारत और चीन ने रिश्तों की बर्फ पिघलाने की कोशिश की. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अक्टूबर 2024 में रूस के कज़ान में ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के इतर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ एक द्विपक्षीय बैठक की. इस बैठक ने औपचारिक रूप से राजनयिक संबंधों को दोबारा शुरू करने का संकेत दिया. इस बैठक से पहले दोनों देशों की सेनाओं के बीच सीमा पर गश्त (petrolling) को लेकर एक समझौता हुआ था, जिसने पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चार साल से चले आ रहे गतिरोध को खत्म कर दिया और भारत के गश्त करने के अधिकारों को वापस बहाल कर दिया.
इस बैठक के बाद कई उच्च स्तरीय यात्राएं हुईं, लेकिन सबसे बड़ी सफलता अगस्त 2025 में मिली जब पीएम मोदी 25वें शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के लिए चीन के तियानजिन गए. साल 2018 के बाद मोदी की यह पहली आधिकारिक चीन यात्रा थी. इस यात्रा के परिणामस्वरूप संबंधों में सुधार आया, जिसके बाद वीजा पाबंदियों में ढील दी गई, सीधी उड़ानें फिर से शुरू हुईं और निवेश के नियमों को आसान बनाया गया.
दलाई लामा के उत्तराधिकारी का मुद्दा
भारत अब उम्मीद कर रहा है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस साल सितंबर में होने वाले ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने भारत आएंगे. इसलिए, जब भारत चीन के साथ अपने संबंधों को सुधारने की उम्मीद कर रहा है, तो नई दिल्ली के लिए यह समझदारी होगी कि वह दलाई लामा के पुनर्जन्म (उत्तराधिकारी) के मुद्दे पर अपना रुख साफ करे. यह मुद्दा बीजिंग के लिए न केवल एक राजनीतिक बल्कि एक भू-राजनीतिक (geopolitical) मुद्दा बन चुका है.
पेनपा त्सेरिंग के शपथ ग्रहण समारोह से कुछ ही दिन पहले, चीनी सरकार ने दलाई लामा के पुनर्जन्म और तिब्बतियों का प्रतिनिधित्व करने वाली एक वैध संस्था के रूप में CTA को मान्यता देने पर एक कड़ा बयान जारी किया था. यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि चीन ने 14-15 मई को हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में अपने विदेश मंत्री वांग यी को नहीं भेजा, बल्कि उनकी जगह चीनी राजदूत को शामिल होने का निर्देश दिया.
भारतीय विदेश नीति का विरोधाभास
त्सेरिंग के शपथ ग्रहण समारोह में आए सभी विदेशी प्रतिनिधियों ने खुलकर चीन की आलोचना की, जबकि नई दिल्ली (भारत सरकार) इस पर चुप रही. भारत की विदेश नीति में विरोधाभास इस बात से दिखता है कि एक तरफ तो वह चीन के साथ अपने तनावपूर्ण संबंधों को सुधारना चाहता है, लेकिन दूसरी तरफ वह विदेशी ताकतों को भारतीय जमीन का इस्तेमाल कर चीनी सरकार की आलोचना करने की अनुमति देता है.
दिलचस्प बात यह है कि भारत खुद अपनी विदेश नीति में 'वन चाइना' (एक चीन) सिद्धांत का पालन करने के कारण किसी भी आधिकारिक बैठक में चीन के सामने तिब्बत का मुद्दा कभी नहीं उठाता. फिर भी, भारत दूसरों को अपनी धरती से बीजिंग पर निशाना साधने की इजाजत देता है.
जून 2024 में, अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की पूर्व अध्यक्ष नैंसी पेलोसी और अमेरिकी सांसदों के एक दल ने दलाई लामा से मिलने धर्मशाला का दौरा किया था. अपने सार्वजनिक भाषण के दौरान, पेलोसी ने तिब्बत के मुद्दे को लेकर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के खिलाफ काफी कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया था. नई दिल्ली के गलियारों में ऐसा माना जाता है कि पेलोसी द्वारा शी जिनपिंग की इस कड़ी आलोचना के कारण ही चीन ने भारत के साथ सीमा विवाद सुलझाने की बातचीत में देरी की थी.
भारतीय अधिकारियों के बयान और भविष्य की रणनीति
बुधवार को नए सिक्योंग के शपथ ग्रहण के दौरान विदेशी प्रतिनिधियों ने एक बार फिर चीन पर तीखे हमले किए. लेकिन यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात भारतीय अधिकारियों द्वारा दिए गए बयान थे. राज्यसभा सांसद सुजीत कुमार और 'ऑल-पार्टी इंडियन पार्लियामेंट्री फोरम फॉर तिब्बत' के सह-संयोजक व लोकसभा सांसद तापिर गाओ इस कार्यक्रम में मौजूद थे.
सुजीत कुमार ने तिब्बत के अंदर रह रहे तिब्बतियों के बारे में बात करते हुए कहा कि उन्हें "उनके बुनियादी मानवाधिकारों से वंचित किया जा रहा है" और चीन द्वारा उनकी भाषा, संस्कृति, धर्म, पहचान तथा उनके जीने के मूल तरीके को "व्यवस्थित रूप से नष्ट" किया जा रहा है. कुमार ने अपने भाषण में कहा, "यह मानवता के खिलाफ अपराध के अलावा और कुछ नहीं है, यह एक नरसंहार है."
इसके बाद अरुणाचल प्रदेश से आने वाले तापिर गाओ ने कहा कि राष्ट्रपति त्सेरिंग के नेतृत्व में बनने वाली नई कैबिनेट (17वीं कशाग) को न केवल निर्वासित तिब्बतियों के कल्याण और विकास का ध्यान रखना चाहिए, बल्कि "तिब्बत के अंदर रह रहे उन तिब्बतियों का भी ध्यान रखना चाहिए जो पीड़ित हैं, और अपनी शिक्षा, संस्कृति, धर्म व मानवाधिकारों के लिए डर के साए में जी रहे हैं." गाओ ने कहा, "हमें एक स्वतंत्र तिब्बत के लिए मिलकर काम करने की जरूरत है."
सवाल यह उठता है कि यदि भारतीय अधिकारियों को लगता है कि CTA का भविष्य का काम यही होना चाहिए, तो भारत सरकार खुद दोनों पक्षों के नेताओं की द्विपक्षीय बातचीत में तिब्बत का मुद्दा उठाने से क्यों कतराती है? शायद भारत को डर है कि अगर वह ऐसा करेगा, तो चीन जम्मू-कश्मीर के विवाद का मुद्दा उठा देगा.
हालांकि, बदलते भू-राजनीतिक माहौल के बीच, भले ही भारत और चीन अपने संबंधों को सुधारने की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के दोनों तरफ भारी सेना की तैनाती के कारण सीमा पर स्थिति अब भी तनावपूर्ण है. अगर नई दिल्ली चीन के खिलाफ एक मजबूत मोहरा (leverage) चाहती है, तो वह चीन के सामने 'तिब्बत कार्ड' खेलना शुरू कर सकती है.
दूसरी तरफ, बीजिंग लगातार भारत को यह कहकर दबाव बना रहा है कि दलाई लामा का पुनर्जन्म उनका आंतरिक मामला है और भारत को CTA को मान्यता नहीं देनी चाहिए क्योंकि उसे 'वन चाइना' सिद्धांत का पालन करना चाहिए. बीजिंग की इन धमकियों पर आंखें मूंदने के बजाय, अब समय आ गया है कि नई दिल्ली तिब्बत मुद्दे पर एक ठोस विदेश नीति बनाए, क्योंकि दलाई लामा को भारत में शरण लिए हुए अब लगभग सात दशक (70 साल) होने वाले हैं.
[नोट: उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है]






























