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बंगाल: 'सादगी भरी ममता' क्या वाकई बदल डालेगी अपनी सरकार की तस्वीर?

दिवंगत प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) की अगुवाई वाली एनडीए सरकार (NDA Government) में अक्टूबर 1999 में ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) जब देश की पहली महिला रेल मंत्री (Railway Minister) बनी, तब संसद (Parliament) में उनकी पहली एंट्री को लेकर सिर्फ मीडिया ही नहीं, बल्कि विपक्ष के दिग्गज नेता भी हैरान थे. संसद के गेट नंबर एक के बाहर आकर एक पुरानी फीएट कार रुकती है और उसमें से सफेद सूती साड़ी और पैरों में हवाई चप्पल पहने बाहर निकलने वाली और चारों तरफ से कैमरामैन की भीड़ से घिरी महिला कहती है, “जी हां,अब अटलजी ने मुझे रेल मंत्री बना दिया है.”  बंगाली मिश्रित हिंदी में वह  पत्रकारों से मुखातिब होते हुए कहती हैं, "आपको जब भी कोई प्रॉब्लम हो या कोई कंप्लेंट हो, तो सीधे मुझसे आकर मिलिए.मैं अपना दरवाजा सिर्फ आपके लिए नहीं, हर जरुरतमंद के लिए हमेशा खोलकर रखूंगी."

उस जमाने में संसद की रिपोर्टिंग करने वाले बंगाली अखबारों के पत्रकारों के अलावा राष्ट्रीय मीडिया ममता को कोई खास तवज्जो नहीं दिया करता था. लेकिन रेल मंत्री बनते ही उन्होंने अपनी सादगी और आम जनता से मिलने के लिए अपने दरवाजे खुले रखने के ऐलान के साथ खूब सुर्खियां बटोरीं. वह इसलिए कि ममता से पहले सिर्फ जॉर्ज फर्नांडिस (George Fernandes) ही ऐसे नेता रहे हैं, जिन्होंने देश के रक्षा मंत्री रहते हुए भी अपने सरकारी आवास के मेन गेट को ही उखड़वा दिया था. यानी जो चाहे, जब चाहे, उस घर में आ-जा सकता है. सुरक्षा के नाम पर महज़ एक बंदूकधारी सुरक्षाकर्मी हुआ करता था, जिसने कभी किसी को न टोका, न रोका कि यहां किसलिए आये हो. शायद इसलिए कि जॉर्ज साहब का ये आदेश था कि उनके घर आने वाले किसी भी व्यक्ति से न कोई पूछताछ की जाये और न ही उन्हें रोका जाए. आतंकी वारदातों का खतरा तो तब भी उतना ही था, जो बाद में, संसद पर हमले के साथ सच हुआ भी लेकिन आज हम इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते कि आप किसी मंत्री के आवास पर ऐसे बेरोकटोक जा सकते हैं.

भ्रष्टाचार का खुलासा होते ही पार्थ चटर्जी पर की कार्रवाई
खैर,बात कर रहे थे, ममता बनर्जी की जिनसे उनके विपक्षी नेता चाहे जितना रंज रखते हों लेकिन वे उनकी सादगी, साफगोई और जुझारुपन को लेकर उनके खिलाफ कभी कोई सवाल नहीं उठा पाए हैं. रही बात भ्रष्टाचार की, तो उन्होंने अपने सबसे करीबी मंत्री पार्थ चटर्जी के भ्रष्टाचार का खुलासा होते ही उन्हें सरकार से बाहर करने में ज्यादा देर नहीं लगाई. हालांकि वह अक्सर ये आरोप लगाती रही हैं कि केंद्र सरकार अपनी एजेंसियों के जरिये विपक्ष को निशाना बनाने और उसकी आवाज़ चुप कराने के लिए उनका बेज़ा इस्तेमाल कर रही है. लेकिन पार्थ चटर्जी की करीबी अर्पिता मुखर्जी के घर से कथित तौर पर करोड़ों रुपये की बरामदगी की तस्वीरें देखकर उन्होंने ऐसा कोई आरोप नहीं लगाया, उल्टे पार्थ को अपनी सरकार और पार्टी के पद से हटा दिया.

ममता के बारे में बंगाल में एक बात सबसे ज्यादा प्रचलित है और लगता है कि उनकी लोकप्रियता का सबसे बड़ा हथियार भी वही है. पहला ये कि वे हद दर्जे की ईमानदार हैं, दूसरा कि वे बेहद जिद्दी हैं, यानी जो ठान लेती हैं, उसे पूरा करके ही चैन लेती हैं और तीसरा ये कि वे बेहद जुझारु किस्म की महिला हैं, जो सड़कों पर आकर अपने विरोधियों से मुकाबला करने व उनसे निपटना जानती हैं.

1998 में कांग्रेस से हुईं अलग
बताते हैं कि सड़क पर उतरकर अपने जुझारूपन दिखाने का ये जज़्बा उन्हें अपने शिक्षक व स्वतंत्रता सेनानी रहे पिता प्रमिलेश्वर बनर्जी से विरासत में मिला है. अपनी इसी जिद के चलते साल 1998 में उन्होंने कांग्रेस से सिर्फ़ इसलिए नाता तोड़ लिया था कि वह दशकों से बंगाल में राज कर रही वाम मोर्चा सरकार से उतनी शिद्दत से लड़ ही नहीं पा रही थी. ममता ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी नई पार्टी तृणमूल कांग्रेस बनाई.जनता से जुड़े मुद्दों पर जमकर संघर्ष किया और अपनी पार्टी की जड़ें बंगाल के गांवों तक लगा दी.कहते हैं कि राजनीति इंस्टेंट कॉफ़ी मशीन नहीं होती, जहां बटन दबाते ही आपका प्याला भर जाए.ये संघर्ष,समर्पण और सब्र का वो संगम है,जिसका स्वाद किसी भी नेता को आखिरकार जनता ही चखाती है.

बेशक ममता आज अपनी सरकार में रहे एक काबीना मंत्री की करतूतों से विपक्ष के निशाने पर हैं लेकिन आज से 11 साल पहले बीजेपी तो छोड़िये, कांग्रेस ने भी कभी नहीं सोचा था कि बंगाल से लेफ्ट का सफाया इतनी बुरी तरह से भी हो सकता है. लेकिन ममता ने 13 साल की लंबी लड़ाई के बाद सालों से राज कर रही वाममोर्चा सरकार को उखाड़ फेंका और साल 2011 में पहली बार सत्ता की कमान संभाली.

हालांकि सत्ता में आने के बाद ममता पर भ्रष्ट नेताओं को संरक्षण देने समेत कई सवाल उठते रहे हैं. लेकिन उनके कट्टर आलोचक भी मानते हैं कि वे निजी जीवन में बेहद ईमानदार हैं. शायद यही वजह है कि बंगाल में हुए कई घोटालों की जांच करने वाली केंद्रीय एजेंसियों को ममता बनर्जी के खिलाफ अब तक ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है, जिसके आधार पर वे उन्हें कटघरे में खड़ा कर सकें.

ममता ने किया मंत्रिमंडल विस्तार
पार्थ चटर्जी का घोटाला सामने आने के बाद ममता ने बुधवार को अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया है. इसमें एक बड़ा नाम बाबुल सुप्रियो का है, जो बीजेपी छोड़कर टीएमसी में आए हैं और वे मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में मंत्री भी रहे हैं. बताते हैं कि ममता ने इस बार ठोक-बजाकर तो नए मंत्री बनाए ही हैं लेकिन साथ ही पुराने सहयोगियों को भी आगाह कर दिया है कि एक आने का भ्रष्टाचार भी बर्दाश्त नहीं होगा.

ममता की सियासी जिंदगी से जुड़ा ये तथ्य भी जानना जरुरी है कि साल 1993 में वे बंगाल युवा कांग्रेस (Bengal Youth Congress) की  अध्यक्ष थीं. तब कोलकाता (Kolkata) के राज्य सचिवालय यानी राइटर्स बिल्डिंग (Writers Building) पर हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस की गोली से 13 युवक मारे गए थे. तबसे ममता हर साल 21 जुलाई को शहीद रैली का आयोजन करती रहीं हैं. सीएम बनने के बाद उन्होंने उन पीड़ित परिवारों के एक-एक सदस्य को नौकरी तो दी ही, साथ ही उनको आर्थिक सहायता भी दिलाई.

अब ऐसी सादगी व समर्पण को भला भ्रष्टाचार के तराजू में आखिर कौन व कैसे तोल सकता है?

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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