Dungarpur News : सरकारी स्कूल की जर्जर छत का प्लास्टर गिरा, 23 बच्चे बाल-बाल बचे, 2 शिक्षक घायल
Dungarpur News In Hindi: डूंगरपुर में एक सरकारी स्कूल की जर्जर छत का प्लास्टर गिरने से बड़ा हादसा हो गया. लंच कर रहे 23 बच्चों की जान बच गई, लेकिन मलबे में दबकर 2 शिक्षक गंभीर रूप से घायल हो गए हैं.

राजस्थान के डूंगरपुर जिले से इस वक्त की एक बेहद बड़ी और हैरान करने वाली खबर सामने आ रही है. यहां के एक सरकारी स्कूल में उस वक्त अफरा-तफरी मच गई, जब एक जर्जर भवन की छत का प्लास्टर अचानक भरभराकर नीचे गिर गया. गनीमत यह रही कि इस हादसे में 23 मासूम बच्चों की जान बाल-बाल बच गई, लेकिन कार्यालय (ऑफिस) में काम कर रहे दो शिक्षक भारी मलबे की चपेट में आकर गंभीर रूप से घायल हो गए हैं.
यह पूरी घटना डूंगरपुर जिले के वरदा क्षेत्र स्थित 'राजकीय प्राथमिक विद्यालय मारगिया महूड़ा' की है. मंगलवार सुबह करीब 10:30 बजे स्कूल में रोजमर्रा की तरह पढ़ाई चल रही थी. लंच का समय होने पर 10 बालिकाएं और 13 बालक (कुल 23 बच्चे) बरामदे में बैठकर खाना खा रहे थे. बच्चे अपनी धुन में थे कि तभी अचानक एक जोरदार आवाज हुई और बगल के ही कार्यालय (ऑफिस रूम) की छत का भारी-भरकम प्लास्टर नीचे आ गिरा.
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मलबे में दबे दो शिक्षक, हालत गंभीर
हादसे के वक्त शिक्षिका शिल्पा कुमारी रोत और शिक्षक राजकुमार बुनकर ऑफिस में बैठकर विभागीय कार्य कर रहे थे. छत का प्लास्टर सीधे उनके ऊपर गिरा, जिससे दोनों मलबे में दबकर लहूलुहान हो गए. शिक्षिका शिल्पा कुमारी के पैर और कंधे पर गंभीर चोटें आई हैं. वहीं, शिक्षक राजकुमार के सिर और गर्दन पर गहरी चोट लगी है.
कुक और पड़ोसियों ने मलबे से निकाला बाहर
धमाके की जोरदार आवाज सुनते ही स्कूल की कुक (हेल्पर) कमला रोत और पड़ोसी लता व महिपाल रोत तुरंत मौके पर दौड़े. उन्होंने सूझबूझ दिखाते हुए भारी मलबे को हटाया और दोनों लहूलुहान शिक्षकों को बाहर निकाला. घटना की सूचना मिलते ही आंतरी के पीईईओ (PEEO) प्रभारी सुमेर सिंह राठौड़ और प्रवेश जैन मौके पर पहुंचे. घायलों को तुरंत आंतरी पीएचसी (PHC) ले जाया गया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद उनकी गंभीर हालत को देखते हुए उन्हें बड़े अस्पताल के लिए रेफर कर दिया गया है.
सिस्टम और सुरक्षा पर उठे बड़े सवाल
डूंगरपुर की इस घटना ने एक बार फिर सरकारी स्कूलों के खस्ताहाल इंफ्रास्ट्रक्चर और बच्चों व शिक्षकों की सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं. आखिर कब तक नौनिहाल और शिक्षक इन जर्जर छतों के नीचे जान हथेली पर रखकर बैठने को मजबूर रहेंगे? अब देखना यह है कि प्रशासन इस हादसे के बाद कितनी जल्दी जागता है और जर्जर स्कूलों की मरम्मत के लिए क्या कदम उठाता है.
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