'बीमारी में जीवनसाथी की देखभाल न करना क्रूरता है', राजस्थान हाई कोर्ट ने मंजूर की तलाक याचिका
Rajasthan High Court: अदालत ने कहा कि कहा है कि यदि कोई जीवनसाथी बिना उचित कारण बीमार पति या पत्नी की देखभाल नहीं करता, तो इसे मानसिक क्रूरता माना जा सकता है.

बीमारी के दौरान जीवनसाथी की देखभाल से दूरी बनाना भी वैवाहिक क्रूरता माना जा सकता है. राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पति-पत्नी का रिश्ता केवल साथ रहने तक सीमित नहीं होता, बल्कि मुश्किल समय में एक-दूसरे का सहारा बनना भी उनकी जिम्मेदारी है. यदि कोई जीवनसाथी बिना उचित कारण बीमार पति या पत्नी की देखभाल नहीं करता, तो इसे मानसिक क्रूरता माना जा सकता है.
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि पति लंबे समय से गंभीर बीमारी से जूझ रहा था. ऐसे समय में पत्नी ने उसकी देखभाल करने के बजाय उससे दूरी बना ली. अदालत के अनुसार, पत्नी का व्यवहार संवेदनहीन और अमानवीय था. इससे पति को मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ा और वैवाहिक संबंध पूरी तरह टूट गए.
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विवाह केवल कानूनी संबंध नहीं- हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने कहा कि विवाह केवल कानूनी संबंध नहीं, बल्कि विश्वास, सहयोग और आपसी जिम्मेदारियों का भी बंधन है. जब एक जीवनसाथी बीमारी जैसी कठिन परिस्थिति में दूसरे का साथ छोड़ देता है, तो यह रिश्ते की मूल भावना के विपरीत माना जाएगा. अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे हालात में दोनों के बीच विश्वास और साथ रहने की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है.
'पति-पत्नी के रिश्ते में सम्मान, संवेदना और सहयोग सबसे अहम'
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी माना कि पति-पत्नी के रिश्ते में सम्मान, संवेदना और सहयोग सबसे अहम आधार होते हैं. यदि ये पूरी तरह खत्म हो जाएं और दोनों के बीच मतभेद इतने बढ़ जाएं कि एक ही छत के नीचे रहना संभव न रहे, तो ऐसे विवाह को जबरन जारी रखना किसी के हित में नहीं है.
इन्हीं तथ्यों के आधार पर राजस्थान हाईकोर्ट ने पति की तलाक की याचिका स्वीकार कर ली. अदालत ने अपने फैसले में कहा कि पत्नी का व्यवहार मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है और इस स्थिति में पति को वैवाहिक बंधन से मुक्त किया जाना उचित है.
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