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AI से अब जानवरों की भाषा समझना होगा आसान! लेकिन सामने है एक बड़ा खतरा

AI की मदद से वैज्ञानिक जानवरों की भाषा और संकेतों को समझने के करीब पहुंच रहे हैं. लेकिन इस टेक्नोलॉजी के गलत इस्तेमाल से जीवों पर नया खतरा भी मंडरा सकता है.

AI की मदद से वैज्ञानिक जानवरों की भाषा और संकेतों को समझने के करीब पहुंच रहे हैं. लेकिन इस टेक्नोलॉजी के गलत इस्तेमाल से जीवों पर नया खतरा भी मंडरा सकता है.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल पूरी दुनिया में काफी तेजी से बढ़ा है. नॉर्मल यूजर्स से लेकर टेक कंपनियां तक एआई को अपनी जरूरत के अनुसार इस्तेमाल कर रही हैं. ऐसे में एक रिपोर्ट में सामने आया है कि अब एआई को जानवरों की भाषा को समझने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा. माना जा रहा है कि आने वाले समय में एआई की मदद से इंसान जानवरों के नेचर से लेकर उनकी भाषा तक को आसानी से समझ सकेंगे. लेकिन इस टेक्नोलॉजी के साथ कुछ खतरे भी सामने आ रहे हैं. आइए समझते हैं कि क्या है पूरा मामला.

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मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, स्पेन में जीवविज्ञानी विट्टोरियो बाग्लियोनी करीब तीन दशकों से कैरियन कौओं पर रिसर्च कर रहे हैं. उन्होंने अपनी रिसर्च साल 2018 में शुरू की थी. इन रिसर्च में उन्होंने करीब 43 कौओं पर छोटे माइक्रोफोन लगाए थे.
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, स्पेन में जीवविज्ञानी विट्टोरियो बाग्लियोनी करीब तीन दशकों से कैरियन कौओं पर रिसर्च कर रहे हैं. उन्होंने अपनी रिसर्च साल 2018 में शुरू की थी. इन रिसर्च में उन्होंने करीब 43 कौओं पर छोटे माइक्रोफोन लगाए थे.
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आपको बता दें कि माइक्रोफोन लगाने के बाद उन्हें कई हजार घंटों की रिकॉर्डिंग तो मिल गई लेकिन अब सवाल ये था कि उन्हें चेक कौन करेगा क्योंकि इतने बड़े डेटा को चेक करना काफी मुश्किल काम था. इसीलिए उन्होंने अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का रास्ता चुना.
आपको बता दें कि माइक्रोफोन लगाने के बाद उन्हें कई हजार घंटों की रिकॉर्डिंग तो मिल गई लेकिन अब सवाल ये था कि उन्हें चेक कौन करेगा क्योंकि इतने बड़े डेटा को चेक करना काफी मुश्किल काम था. इसीलिए उन्होंने अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का रास्ता चुना.
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बता दें कि वैज्ञानिकों ने Earth Species Project के मशीन-लर्निंग मॉडल की मदद से अलग-अलग आवाजों को छांटा और ये पता लगाने की कोशिश की कि कौन-सी आवाज किस पक्षी की थी. समय के साथ उनका रिकॉर्ड लगभग 1.5 लाख रिकॉर्डिंग तक पहुंच गया था.
बता दें कि वैज्ञानिकों ने Earth Species Project के मशीन-लर्निंग मॉडल की मदद से अलग-अलग आवाजों को छांटा और ये पता लगाने की कोशिश की कि कौन-सी आवाज किस पक्षी की थी. समय के साथ उनका रिकॉर्ड लगभग 1.5 लाख रिकॉर्डिंग तक पहुंच गया था.
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बताते चलें कि इस रिसर्च के दौरान बाग्लियोनी ने कौओं की एक ऐसी आवाज पर ध्यान दिया जो उन्हें काफी दिलचस्प लगी. जब एक बाज जैसे शिकारी पक्षी ने कौए के घोंसले पर हमला किया तो कौए ने दूसरी आवाजें निकालने से पहले धीमी आवाज में एक संकेत दिया. इसके तुरंत बाद दूसरे कौए वहां पहुंचे और घोंसले की रक्षा करने लगे. बाग्लियोनी ने इस संकेत को कुछ हद तक मदद के लिए बुलाने जैसी पुकार माना. यानी ये माना जा सकता है कि खतरा आने पर कौआ अपने साथियों को आवाज देकर बुलाता है.
बताते चलें कि इस रिसर्च के दौरान बाग्लियोनी ने कौओं की एक ऐसी आवाज पर ध्यान दिया जो उन्हें काफी दिलचस्प लगी. जब एक बाज जैसे शिकारी पक्षी ने कौए के घोंसले पर हमला किया तो कौए ने दूसरी आवाजें निकालने से पहले धीमी आवाज में एक संकेत दिया. इसके तुरंत बाद दूसरे कौए वहां पहुंचे और घोंसले की रक्षा करने लगे. बाग्लियोनी ने इस संकेत को कुछ हद तक मदद के लिए बुलाने जैसी पुकार माना. यानी ये माना जा सकता है कि खतरा आने पर कौआ अपने साथियों को आवाज देकर बुलाता है.
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आपकी जानकारी के लिए बता दें कि AI बड़ी मात्रा में डेटा को इंसानों के मुकाबले में बेहद तेजी से खंगाल सकता है. यही वजह है कि वैज्ञानिक पक्षियों, व्हेल, भेड़ियों और दूसरी प्रजातियों की आवाजों और व्यवहार से जुड़े डेटाबेस को स्टडी कर रहे हैं.
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि AI बड़ी मात्रा में डेटा को इंसानों के मुकाबले में बेहद तेजी से खंगाल सकता है. यही वजह है कि वैज्ञानिक पक्षियों, व्हेल, भेड़ियों और दूसरी प्रजातियों की आवाजों और व्यवहार से जुड़े डेटाबेस को स्टडी कर रहे हैं.
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जहां इस टेक्नोलॉजी से वैज्ञानिक खोजों के नए दरवाजे खुल सकते हैं, वहीं इसका गलत इस्तेमाल चिंता का विषय भी है. न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के César Rodríguez-Garavito के अनुसार, AI बड़े स्तर पर जानवरों को नुकसान पहुंचाने की क्षमता भी पैदा कर सकता है. वैज्ञानिकों के बीच खास चिंता प्लेबैक टेक्नोलॉजी को लेकर है. इसमें रिकॉर्ड की गई किसी जानवर की आवाज दोबारा उसी प्रजाति के जानवरों को सुनाई जाती है और उनके रिएक्शन की स्टडी की जाती है. अगर इसका इस्तेमाल बार-बार या गलत तरीके से किया जाए तो जानवर तनाव में आ सकते हैं.
जहां इस टेक्नोलॉजी से वैज्ञानिक खोजों के नए दरवाजे खुल सकते हैं, वहीं इसका गलत इस्तेमाल चिंता का विषय भी है. न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के César Rodríguez-Garavito के अनुसार, AI बड़े स्तर पर जानवरों को नुकसान पहुंचाने की क्षमता भी पैदा कर सकता है. वैज्ञानिकों के बीच खास चिंता प्लेबैक टेक्नोलॉजी को लेकर है. इसमें रिकॉर्ड की गई किसी जानवर की आवाज दोबारा उसी प्रजाति के जानवरों को सुनाई जाती है और उनके रिएक्शन की स्टडी की जाती है. अगर इसका इस्तेमाल बार-बार या गलत तरीके से किया जाए तो जानवर तनाव में आ सकते हैं.

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