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भारत का पहला इलेक्ट्रिसिटी प्लांट कहां लगा, कितनी थी उसकी क्षमता?

बिजली की शुरुआत सिर्फ एक तकनीकी बदलाव नहीं थी, बल्कि यह आधुनिक भारत की नींव रखने वाली घटना थी. आइए जानें कि किस देश में सबसे पहले बिजली घर बना था और उसकी पावर कितनी थी.

बिजली की शुरुआत सिर्फ एक तकनीकी बदलाव नहीं थी, बल्कि यह आधुनिक भारत की नींव रखने वाली घटना थी. आइए जानें कि किस देश में सबसे पहले बिजली घर बना था और उसकी पावर कितनी थी.

आज बिजली हमारे जीवन का ऐसा हिस्सा बन चुकी है, जिसके बिना एक दिन भी गुजारना मुश्किल है. घर की रोशनी से लेकर मोबाइल चार्ज करने तक सब कुछ इसी पर टिका है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भारत में पहली बार बिजली कहां जली थी? किस शहर ने सबसे पहले अंधेरे को पीछे छोड़ा? और उस दौर में बने पहले बिजलीघर की ताकत आखिर कितनी थी? इसकी कहानी बेहद दिलचस्प है.

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भारत में सबसे पहले बिजली कोलकाता (तब का कलकत्ता) में पहुंची थी. 19वीं सदी के आखिर में यह शहर ब्रिटिश भारत की राजधानी हुआ करता था और व्यापारिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र था.
भारत में सबसे पहले बिजली कोलकाता (तब का कलकत्ता) में पहुंची थी. 19वीं सदी के आखिर में यह शहर ब्रिटिश भारत की राजधानी हुआ करता था और व्यापारिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र था.
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1880 के दशक में यहां बिजली का प्रयोग शुरू हुआ. उस समय शहर की सड़कों पर गैस लैंप जलते थे, लेकिन धीरे-धीरे उनकी जगह बिजली के बल्बों ने लेना शुरू किया. बताया जाता है कि 1882 के आसपास यहां संगठित रूप से बिजली उत्पादन की शुरुआत हुई थी. यही भारत का पहला बिजलीघर माना जाता है.
1880 के दशक में यहां बिजली का प्रयोग शुरू हुआ. उस समय शहर की सड़कों पर गैस लैंप जलते थे, लेकिन धीरे-धीरे उनकी जगह बिजली के बल्बों ने लेना शुरू किया. बताया जाता है कि 1882 के आसपास यहां संगठित रूप से बिजली उत्पादन की शुरुआत हुई थी. यही भारत का पहला बिजलीघर माना जाता है.
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कोलकाता में स्थापित पहला बिजलीघर डायरेक्ट करंट यानी DC प्रणाली पर आधारित था. इसका संचालन उस समय की कलकत्ता इलेक्ट्रिक सप्लाई कंपनी द्वारा किया जाता था, जो आगे चलकर CESC Limited के नाम से जानी गई.
कोलकाता में स्थापित पहला बिजलीघर डायरेक्ट करंट यानी DC प्रणाली पर आधारित था. इसका संचालन उस समय की कलकत्ता इलेक्ट्रिक सप्लाई कंपनी द्वारा किया जाता था, जो आगे चलकर CESC Limited के नाम से जानी गई.
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इस बिजलीघर की क्षमता आज के हिसाब से बहुत कम थी, लेकिन उस दौर में यह बड़ी उपलब्धि थी. यह लगभग 1300 बल्बों को रोशन करने में सक्षम था. उस समय यह संख्या कम नहीं मानी जाती थी. खास बात यह थी कि बिजली की तारें जमीन के नीचे बिछाई गई थीं, जो उस दौर के लिए आधुनिक तकनीक मानी जाती थी.
इस बिजलीघर की क्षमता आज के हिसाब से बहुत कम थी, लेकिन उस दौर में यह बड़ी उपलब्धि थी. यह लगभग 1300 बल्बों को रोशन करने में सक्षम था. उस समय यह संख्या कम नहीं मानी जाती थी. खास बात यह थी कि बिजली की तारें जमीन के नीचे बिछाई गई थीं, जो उस दौर के लिए आधुनिक तकनीक मानी जाती थी.
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जब पहली बार सड़कों पर बिजली के बल्ब जले, तो लोगों के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था. कई लोग इसे अंग्रेजों की कोई जादुई ताकत मानते थे. कहा जाता है कि कुछ लोग अपने बच्चों को बल्ब के पास जाने से रोकते थे. उन्हें लगता था कि आग को कांच के अंदर कैद कर दिया गया है.
जब पहली बार सड़कों पर बिजली के बल्ब जले, तो लोगों के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था. कई लोग इसे अंग्रेजों की कोई जादुई ताकत मानते थे. कहा जाता है कि कुछ लोग अपने बच्चों को बल्ब के पास जाने से रोकते थे. उन्हें लगता था कि आग को कांच के अंदर कैद कर दिया गया है.
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धीरे-धीरे लोगों का डर कम हुआ और बिजली को स्वीकार किया जाने लगा. बाजार, दफ्तर और बड़े घर रोशनी से जगमगाने लगे. शहर की रफ्तार बदलने लगी. सिर्फ बल्ब ही नहीं, बल्कि बिजली से चलने वाले पंखों की शुरुआत भी सबसे पहले कोलकाता में ही हुई.
धीरे-धीरे लोगों का डर कम हुआ और बिजली को स्वीकार किया जाने लगा. बाजार, दफ्तर और बड़े घर रोशनी से जगमगाने लगे. शहर की रफ्तार बदलने लगी. सिर्फ बल्ब ही नहीं, बल्कि बिजली से चलने वाले पंखों की शुरुआत भी सबसे पहले कोलकाता में ही हुई.
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1902 के आसपास यहां के कुछ घरों और कार्यालयों में इलेक्ट्रिक फैन लगने लगे. शुरू में लोग पंखों से भी घबराते थे. उन्हें लगता था कि यह घूमता हुआ पंखा गिरकर चोट पहुंचा सकता है, लेकिन समय के साथ यह डर भी खत्म हो गया.
1902 के आसपास यहां के कुछ घरों और कार्यालयों में इलेक्ट्रिक फैन लगने लगे. शुरू में लोग पंखों से भी घबराते थे. उन्हें लगता था कि यह घूमता हुआ पंखा गिरकर चोट पहुंचा सकता है, लेकिन समय के साथ यह डर भी खत्म हो गया.

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