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वो एक गलती जिसने अमेरिका और इजराइल से न सिर्फ 'जीत' छीन ली, बल्कि दानव बना दिया

28 फरवरी 2026. जब अमेरिका और इजरायल ने 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' के तहत ईरान पर अपने सबसे बड़े और घातक संयुक्त हमले की शुरुआत की, तो उनका लक्ष्य स्पष्ट था—ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामनेई का खात्मा. खामनेई इस हमले में मारे गए. रणनीतिक और सैन्य दृष्टिकोण से, वाशिंगटन और तेल अवीव में इसे एक 'ऐतिहासिक जीत' माना जा रहा था. डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू ने इसे दुनिया के सामने एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया.

लेकिन यह 'जीत' चंद घंटों में ही एक ऐसे रणनीतिक और कूटनीतिक दुःस्वप्न में बदल गई, जिसने न केवल अमेरिका और इजरायल को पूरी दुनिया में अलग-थलग कर दिया, बल्कि उन्हें एक 'दानवी' स्वरूप में भी स्थापित कर दिया. वह गलती खामनेई की हत्या नहीं थी, बल्कि दक्षिणी ईरान के मिनाब शहर में 'शजरेह तैयबेह' (Shajareh Tayyebeh) प्राथमिक विद्यालय की उन 165 मासूम बच्चियों की सामूहिक हत्या थी, जिनका इस युद्ध से कोई लेना-देना नहीं था.

मिनाब का वह खौफनाक मंजर: जब स्कूल बना कब्रिस्तान

28 फरवरी की सुबह, जब 7 से 12 साल की बच्चियां अपनी कक्षाओं में पढ़ रही थीं, तभी आसमान से मौत बरसी. अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ एजेंसियों और जांचकर्ताओं (जैसे सीएनएन और अल जज़ीरा) के अनुसार, यह कोई सामान्य चूक या 'कोलैटरल डैमेज' नहीं था. रिपोर्टों के मुताबिक, इस स्कूल पर एक के बाद एक कई मिसाइलें दागी गईं (जिसे सैन्य भाषा में 'डबल टैप' या 'ट्रिपल टैप' कहा जाता है). इस हमले में स्कूल की छत ढह गई और 165 से अधिक मासूम बच्चियां, उनके शिक्षक और कुछ माता-पिता मलबे में दफन हो गए.

अमेरिकी राष्ट्रपति ने इसे "ईरान की अपनी खराब मिसाइलों का नतीजा" बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की. लेकिन स्वतंत्र जांचों और मलबे से मिले अमेरिकी 'टोमाहॉक' (Tomahawk) क्रूज़ मिसाइल के टुकड़ों ने सच्चाई को दुनिया के सामने ला दिया. सबसे डराने वाला तथ्य यह सामने आया कि इस हमले के लक्ष्यों को चुनने में कथित तौर पर 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (AI) का इस्तेमाल किया गया था, जिसने एक नागरिक स्कूल को सैन्य बेस समझकर पल भर में तबाह कर दिया.

दुनिया के सामने बेनकाब हुआ 'दानवी' रूप और सहयोगियों का पीछे हटना

खामनेई की हत्या को एक सैन्य या राजनीतिक कार्रवाई मानकर शायद दुनिया का एक बड़ा धड़ा चुप रह जाता, लेकिन मिनाब की घटना ने अमेरिका और इजरायल के उस नैतिक आधार को पूरी तरह नष्ट कर दिया, जिसका वे अक्सर दावा करते हैं. इस एक घटना ने वैश्विक कूटनीति के समीकरणों को रातों-रात पलट दिया:

• वैश्विक संस्थाओं का तीव्र आक्रोश: संयुक्त राष्ट्र (UN) के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने इसे "बच्चों और शिक्षा पर एक गंभीर व अक्षम्य हमला" करार दिया. यूनेस्को (UNESCO) ने इसे "अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का घोर उल्लंघन" बताया. नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई ने भी इस हमले की निंदा करते हुए इसे एक ऐसा अपराध कहा जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता.

• शुभचिंतकों और सहयोगियों का किनारा करना: जो यूरोपीय देश (फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन) और खाड़ी राष्ट्र (सऊदी अरब, यूएई) शुरुआत में इस हमले पर मौन थे या परोक्ष समर्थन दे रहे थे, वे इस नरसंहार की तस्वीरें सामने आते ही पीछे हट गए. खून से सने स्कूल बैग्स और मलबे में दबी बच्चियों की तस्वीरों ने पश्चिमी देशों में भी घरेलू राजनीति में भूचाल ला दिया. कोई भी वैश्विक नेता अब 'बाल हत्यारों' के साथ खड़ा नहीं दिखना चाहता था.

सैन्य विजय बनाम कूटनीतिक आत्महत्या: क्यों दूर रही जीत?

"किसी स्कूल पर हमला और कक्षा में बच्चियों की हत्या इस बात का सबसे ज्वलंत उदाहरण है कि कैसे युद्ध एक झटके में उनका भविष्य चुरा लेता है." — संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार विशेषज्ञ

ट्रंप और नेतन्याहू ने सोचा था कि खामनेई के खात्मे से ईरान का हौसला टूट जाएगा और मध्य पूर्व में उनका निर्विवाद वर्चस्व स्थापित हो जाएगा. लेकिन मिनाब की घटना ने इस पूरे विमर्श को पलट दिया. इस सामूहिक हत्या ने ईरान के भीतर और बाहर, अमेरिका-इजरायल विरोधी भावनाओं को उस चरम पर पहुंचा दिया, जहां किसी भी तरह की शांति वार्ता या समझौते की गुंजाइश खत्म हो गई.

ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामनेई को अब अपने देशवासियों का वह पूर्ण और उग्र समर्थन प्राप्त है, जो शायद शांति काल में संभव नहीं था. ईरान के जो नागरिक अपनी ही सरकार का विरोध कर रहे थे, वे भी विदेशी ताकतों द्वारा अपनी बच्चियों की इस बेरहम हत्या के बाद राष्ट्रवाद की लहर में एकजुट हो गए हैं.

महाशक्तियों के अहंकार की हार

इतिहासकार जब 2026 के इस ईरान युद्ध का मूल्यांकन करेंगे, तो वे खामनेई की मौत को केवल एक घटना के रूप में देखेंगे. मुख्य अध्याय मिनाब की उन मासूम बच्चियों का होगा, जिनकी सामूहिक हत्या ने आधुनिक युद्ध प्रणाली की क्रूरता को दुनिया के सामने नंगा कर दिया. यह एक ऐसी गलती थी जिसने साबित कर दिया कि जब युद्ध की मशीनरी अंधी हो जाती है, तो वह सबसे पहले अपनी ही 'जीत' को निगल जाती है.

आज अमेरिका और इजरायल के पास भले ही असीमित सैन्य ताकत हो, लेकिन वैश्विक मंच पर वे इतने अकेले, अलग-थलग और कलंकित पहले कभी नहीं थे. मिनाब के स्कूल के मलबे से उठती चीखें और अंतरराष्ट्रीय कानून की उड़ती धज्जियां, ट्रंप और नेतन्याहू की इस तथाकथित ऐतिहासिक जीत की सबसे बड़ी और शर्मनाक हार का स्थायी प्रतीक बन गई हैं.

[लेखक प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और सम-सामयिक लेखन के साथ ही टेलीविजन डिबेट्स में अपनी राय जोरदार तरीके से रखते आ रहे हैं]

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