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Countries Without Army: इन देशों के पास नहीं है अपनी कोई आर्मी, फिर कैसे होती है देश की सुरक्षा?

Countries Without Army: दुनिया में कुछ देश ऐसे भी हैं जिनकी अपनी कोई स्थायी सेना नहीं है. आइए जानते हैं कि इन देशों की रक्षा कैसे होती है.

Countries Without Army: दुनिया में कुछ देश ऐसे भी हैं जिनकी अपनी कोई स्थायी सेना नहीं है. आइए जानते हैं कि इन देशों की रक्षा कैसे होती है.

Countries Without Army: मौजूदा समय में चल रहे वैश्विक तनाव ने दुनिया को याद दिलाया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सैन्य शक्ति कितनी ज्यादा जरूरी हो सकती है. कई देश अपनी सीमाओं और हितों की रक्षा के लिए सशस्त्र बलों पर काफी ज्यादा निर्भर रहते हैं. लेकिन हैरानी की बात यह है कि दुनिया में लगभग 36 ऐसे देश और क्षेत्र हैं जिनके पास कोई भी स्थायी सेना नहीं है. आइए जानते हैं यह देश अपनी रक्षा कैसे करते हैं.

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बिना सेना वाले देशों द्वारा अपनाई जाने वाली सबसे आम सुरक्षा रणनीति में से एक है ज्यादा शक्तिशाली राष्ट्रों के साथ रक्षा समझौता पर हस्ताक्षर करना. ऐसी संधियों के जरिए कोई दूसरा देश उनकी बाहरी सुरक्षा की जिम्मेदारी ले लेता है. जैसे मोनाको की सुरक्षा का जिम्मा फ्रांस संभालता है और भूटान ने ऐतिहासिक रूप से भारत के साथ घनिष्ठ सुरक्षा सहयोग बनाए रखा है.
बिना सेना वाले देशों द्वारा अपनाई जाने वाली सबसे आम सुरक्षा रणनीति में से एक है ज्यादा शक्तिशाली राष्ट्रों के साथ रक्षा समझौता पर हस्ताक्षर करना. ऐसी संधियों के जरिए कोई दूसरा देश उनकी बाहरी सुरक्षा की जिम्मेदारी ले लेता है. जैसे मोनाको की सुरक्षा का जिम्मा फ्रांस संभालता है और भूटान ने ऐतिहासिक रूप से भारत के साथ घनिष्ठ सुरक्षा सहयोग बनाए रखा है.
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कुछ देश राष्ट्रीय रक्षा गठबंधनों में शामिल होकर अपनी सुरक्षा को मजबूत करते हैं. इसका एक सबसे बड़ा उदाहरण आइसलैंड है. इसके पास कोई भी स्थायी सेना नहीं है लेकिन वह नाटो का सदस्य है. नाटो के सामूहिक रक्षा सिद्धांत के तहत किसी एक सदस्य देश पर हुए हमले को सभी सदस्यों पर हुआ हमला माना जाता है.
कुछ देश राष्ट्रीय रक्षा गठबंधनों में शामिल होकर अपनी सुरक्षा को मजबूत करते हैं. इसका एक सबसे बड़ा उदाहरण आइसलैंड है. इसके पास कोई भी स्थायी सेना नहीं है लेकिन वह नाटो का सदस्य है. नाटो के सामूहिक रक्षा सिद्धांत के तहत किसी एक सदस्य देश पर हुए हमले को सभी सदस्यों पर हुआ हमला माना जाता है.
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कुछ द्विपीय राष्ट्र ऐसे अनूठे समझौतों पर भी निर्भर होते हैं जिनके तहत वे प्रभावी रूप से अपनी राष्ट्रीय रक्षा का जिम्मा बड़े देशों को सौंप देते हैं. उदाहरण के लिए माइक्रोनेशिया, पलाऊ और मार्शल द्वीप समूह कॉम्पैक्ट ऑफ फ्री एसोसिएशन के जरिए से अमेरिका से जुड़े हुए हैं. उसके तहत अमेरिका इन देशों की रक्षा के लिए जिम्मेदार होता है और यदि जरूरत हो तो वह सैन्य अड्डे भी स्थापित कर सकता है.
कुछ द्विपीय राष्ट्र ऐसे अनूठे समझौतों पर भी निर्भर होते हैं जिनके तहत वे प्रभावी रूप से अपनी राष्ट्रीय रक्षा का जिम्मा बड़े देशों को सौंप देते हैं. उदाहरण के लिए माइक्रोनेशिया, पलाऊ और मार्शल द्वीप समूह कॉम्पैक्ट ऑफ फ्री एसोसिएशन के जरिए से अमेरिका से जुड़े हुए हैं. उसके तहत अमेरिका इन देशों की रक्षा के लिए जिम्मेदार होता है और यदि जरूरत हो तो वह सैन्य अड्डे भी स्थापित कर सकता है.
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आधिकारिक सेना ना होने के बावजूद भी कई देश ऐसे ट्रेंड पुलिस या फिर अर्धसैनिक बल बनाए रखते हैं जो सुरक्षा संबंधी खतरों से निपटने में सक्षम होते हैं. जैसे कोस्टा रिका ने 1949 में अपनी सेना को खत्म कर दिया और अब वह पब्लिक फोर्स नाम के एक सुरक्षा संगठन पर निर्भर है. हालांकि तकनीकी तौर पर यह एक पुलिस यूनिट है लेकिन इसमें सीमा सुरक्षा और आतंकवाद रोधी अभियानों के लिए खास टीम शामिल हैं.
आधिकारिक सेना ना होने के बावजूद भी कई देश ऐसे ट्रेंड पुलिस या फिर अर्धसैनिक बल बनाए रखते हैं जो सुरक्षा संबंधी खतरों से निपटने में सक्षम होते हैं. जैसे कोस्टा रिका ने 1949 में अपनी सेना को खत्म कर दिया और अब वह पब्लिक फोर्स नाम के एक सुरक्षा संगठन पर निर्भर है. हालांकि तकनीकी तौर पर यह एक पुलिस यूनिट है लेकिन इसमें सीमा सुरक्षा और आतंकवाद रोधी अभियानों के लिए खास टीम शामिल हैं.
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कुछ देशों ने जानबूझकर संवैधानिक सुधारों के जरिए अपनी सेना को खत्म कर दिया है. ऐसा इसलिए ताकि सैनिक तख्तापलट या तानाशाही शासन को रोका जा सके. कोस्टा रिका और पनामा इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं. सेना पर भारी भरकम बजट खर्च करने के बजाय इन देशों ने उस पैसे को शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक विकास में लगाया.
कुछ देशों ने जानबूझकर संवैधानिक सुधारों के जरिए अपनी सेना को खत्म कर दिया है. ऐसा इसलिए ताकि सैनिक तख्तापलट या तानाशाही शासन को रोका जा सके. कोस्टा रिका और पनामा इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं. सेना पर भारी भरकम बजट खर्च करने के बजाय इन देशों ने उस पैसे को शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक विकास में लगाया.
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जिन देशों के पास सेना नहीं होती वे किसी एक उपाय पर निर्भर रहने के बजाय कई रणनीतियों के मेल पर निर्भर होते हैं. रक्षा संधियां, अंतरराष्ट्रीय गठबंधन, अर्धसैनिक सुरक्षा बल और कूटनीतिक संबंध मिलकर एक सुरक्षा ढांचा तैयार करते हैं.
जिन देशों के पास सेना नहीं होती वे किसी एक उपाय पर निर्भर रहने के बजाय कई रणनीतियों के मेल पर निर्भर होते हैं. रक्षा संधियां, अंतरराष्ट्रीय गठबंधन, अर्धसैनिक सुरक्षा बल और कूटनीतिक संबंध मिलकर एक सुरक्षा ढांचा तैयार करते हैं.

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