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कैसे बना था आपका पसंदीदा 'स्ट्रेस बस्टर' बबल रैप, इंजीनियरों की एक गलती ने किस तरह रचा इतिहास?

बबल रैप की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी है. वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि इन बुलबुलों को फोड़ने से निकलने वाली आवाज और उंगलियों का दबाव इंसान के तनाव को कम करने में मदद करता है.

बबल रैप की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी है. वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि इन बुलबुलों को फोड़ने से निकलने वाली आवाज और उंगलियों का दबाव इंसान के तनाव को कम करने में मदद करता है.

ऑनलाइन पार्सल के साथ आने वाला वह बबल रैप जिसे हम और आप बड़े चाव से फोड़ते हैं, दरअसल एक वैज्ञानिक असफलता का नतीजा थी. जिस चीज को आज दुनिया भर में सामान की सुरक्षा के लिए सबसे भरोसेमंद माना जाता है, उसे कभी दीवारों की शोभा बढ़ाने के लिए बनाया गया था. जिसे हम बबल रैप कहते हैं, उसका जन्म किसी लैब की सोची-समझी प्लानिंग से नहीं, बल्कि दो इंजीनियरों की एक ऐसी गलती से हुआ जिसने अनजाने में पैकेजिंग की पूरी इंडस्ट्री ही बदल दी.

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बबल रैप के बनने की कहानी साल 1957 में शुरू होती है, जब दो अमेरिकी इंजीनियर अल्फ्रेड फील्डिंग और मार्क चवनेस न्यू जर्सी के एक गैरेज में कुछ नया प्रयोग कर रहे थे. उनका इरादा एक ऐसा प्लास्टिक वॉलपेपर तैयार करना था, जिसमें एक खास तरह का टेक्सचर या उभार हो. वे चाहते थे कि इसे दीवारों पर लगाया जाए ताकि घर को एक आधुनिक लुक मिल सके. इसी कोशिश में उन्होंने दो प्लास्टिक की चादरों को एक मशीन के जरिए आपस में चिपकाने का प्रयास किया.
बबल रैप के बनने की कहानी साल 1957 में शुरू होती है, जब दो अमेरिकी इंजीनियर अल्फ्रेड फील्डिंग और मार्क चवनेस न्यू जर्सी के एक गैरेज में कुछ नया प्रयोग कर रहे थे. उनका इरादा एक ऐसा प्लास्टिक वॉलपेपर तैयार करना था, जिसमें एक खास तरह का टेक्सचर या उभार हो. वे चाहते थे कि इसे दीवारों पर लगाया जाए ताकि घर को एक आधुनिक लुक मिल सके. इसी कोशिश में उन्होंने दो प्लास्टिक की चादरों को एक मशीन के जरिए आपस में चिपकाने का प्रयास किया.
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प्रयोग के दौरान मशीन में कुछ ऐसी गड़बड़ हुई कि दोनों प्लास्टिक शीट के बीच में छोटी-छोटी जगहों पर हवा फंस गई. जब वह शीट बाहर निकली, तो वह समतल होने के बजाय छोटे-छोटे हवा से भरे बुलबुलों से भरी हुई थी. वॉलपेपर के नजरिए से यह एक बड़ी गड़बड़ी और फेल प्रोजेक्ट था, क्योंकि कोई भी अपनी दीवार पर बुलबुले वाला प्लास्टिक नहीं लगाना चाहता था.
प्रयोग के दौरान मशीन में कुछ ऐसी गड़बड़ हुई कि दोनों प्लास्टिक शीट के बीच में छोटी-छोटी जगहों पर हवा फंस गई. जब वह शीट बाहर निकली, तो वह समतल होने के बजाय छोटे-छोटे हवा से भरे बुलबुलों से भरी हुई थी. वॉलपेपर के नजरिए से यह एक बड़ी गड़बड़ी और फेल प्रोजेक्ट था, क्योंकि कोई भी अपनी दीवार पर बुलबुले वाला प्लास्टिक नहीं लगाना चाहता था.

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