शपथग्रहण समारोह का कौन उठाता है खर्च, क्या इसमें आम आदमी को भी मिलती है एंट्री?
शपथ ग्रहण समारोह का खर्च सरकारें उठाती हैं. इसमें सुरक्षा और बुनियादी ढांचे पर सबसे ज्यादा पैसा लगता है. आम जनता सार्वजनिक मैदानों में होने वाले आयोजनों में शामिल हो सकती है.

- आम जनता के लिए सार्वजनिक स्थलों पर रहती है व्यवस्था.
बंगाल चुनाव के नतीजों के बाद जब नई सरकार के शपथ ग्रहण की बारी आएगी, तो राजभवन से लेकर कोलकाता के बड़े मैदानों तक हलचल तेज हो जाएगी. मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल का यह शपथ ग्रहण समारोह सिर्फ एक संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन का एक बड़ा जरिया भी होता है. ऐसे में हर नागरिक के मन में यह सवाल उठता है कि इस भव्य आयोजन पर खर्च होने वाले करोड़ों रुपये आखिर आते कहां से हैं और क्या एक साधारण नागरिक इस ऐतिहासिक पल का गवाह बन सकता है.
किस पर होता है आयोजन का भार?
जब भी किसी राज्य में मुख्यमंत्री का शपथ ग्रहण समारोह आयोजित होता है, तो उसका पूरा वित्तीय भार संबंधित राज्य सरकार के खजाने पर पड़ता है. यह पैसा सीधे तौर पर करदाताओं यानी आम जनता द्वारा चुकाए गए टैक्स से आता है. पश्चिम बंगाल के संदर्भ में, राज्य का सामान्य प्रशासन विभाग इस पूरे खर्च का लेखा-जोखा तैयार करता है. टेंट, स्टेज, साउंड सिस्टम से लेकर मेहमानों के स्वागत-सत्कार तक की हर छोटी-बड़ी चीज का भुगतान सरकारी फंड से किया जाता है.
सुरक्षा व्यवस्था का भारी-भरकम बजट
शपथ ग्रहण समारोह में सबसे बड़ा हिस्सा सुरक्षा व्यवस्था पर खर्च होता है. मुख्यमंत्री, राज्यपाल और आने वाले तमाम वीआईपी मेहमानों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हजारों पुलिसकर्मियों और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की जाती है. इस बल के आवागमन, भोजन और लॉजिस्टिक का खर्च गृह विभाग के बजट से वहन किया जाता है. चूंकि यह एक आधिकारिक सरकारी कार्यक्रम है, इसलिए इसके लिए विशेष बजटीय प्रावधान किए जाते हैं ताकि प्रोटोकॉल में कोई कमी न रहे.
भव्यता के आधार पर बदलता खर्च
शपथ ग्रहण का खर्च इस बात पर निर्भर करता है कि आयोजन कितना भव्य है. अगर मुख्यमंत्री केवल राजभवन के अंदर सादगी से शपथ लेते हैं, तो खर्च काफी कम होता है, लेकिन अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या अरविंद केजरीवाल और चंद्रबाबू नायडू की तरह बड़े मैदानों में हजारों लोगों की उपस्थिति में शपथ ली जाती है, तो यह आंकड़ा करोड़ों में पहुंच जाता है. बंगाल में भी अगर ममता बनर्जी या कोई अन्य नेता बड़े स्टेडियम में शपथ लेने का फैसला करता है, तो आयोजन की लागत कई गुना बढ़ जाती है.
निजी दान और चंदे की भूमिका
आमतौर पर सरकारी कार्यक्रमों में चंदे का प्रावधान नहीं होता, लेकिन कई बार राजनीतिक दल अपनी ताकत दिखाने के लिए रैलियों का आयोजन करते हैं. भारत में आधिकारिक शपथ ग्रहण तो सरकारी कोष से ही होता है, लेकिन उसके साथ जुड़ी राजनीतिक रैलियों का खर्च दल खुद वहन करते हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो अमेरिकी राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण के लिए कॉर्पोरेट दान और उद्घाटन समितियां धन जुटाती हैं, लेकिन भारत में मुख्य समारोह पूरी तरह सरकारी होता है.
आम जनता को जाने का मिलता है मौका?
क्या एक आम आदमी इस समारोह को करीब से देख सकता है? इसका जवाब आयोजन स्थल पर निर्भर करता है. यदि शपथ ग्रहण राजभवन के भीतर हो रहा है, तो वहां जगह की कमी के कारण केवल चुनिंदा वीआईपी और अतिथियों को ही प्रवेश मिलता है, लेकिन अगर सरकार किसी बड़े पार्क या मैदान (जैसे ब्रिगेड परेड ग्राउंड या सॉल्ट लेक स्टेडियम) में शपथ लेती है, तो वहां आम नागरिकों के लिए विशेष दीर्घाएं या पब्लिक गैलरी बनाई जाती हैं.
एंट्री पास और सुरक्षा के कड़े नियम
सार्वजनिक स्थल पर होने वाले समारोह में भी एंट्री पूरी तरह मुफ्त या अनियंत्रित नहीं होती है. सुरक्षा कारणों से आम नागरिकों को भी पास की जरूरत पड़ सकती है. ये पास अक्सर स्थानीय विधायकों या प्रशासनिक अधिकारियों के माध्यम से वितरित किए जाते हैं. समारोह स्थल पर जाने के लिए कड़ी सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ता है. मोबाइल फोन, बैग या किसी भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण को ले जाने पर प्रतिबंध हो सकता है ताकि संवैधानिक मर्यादा और सुरक्षा बनी रहे.
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