Middle East Crisis: क्या होर्मुज को अपने कब्जे में ले सकता है चीन, ऐसा हुआ तो किस देश को होगा सबसे ज्यादा फायदा?
Middle East Crisis: मिडिल ईस्ट में अभी भी तनाव जारी है. अब इस तनाव में चीन भी शामिल हो चुका है. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या चीन होर्मुज स्ट्रेट को कंट्रोल कर सकता है? आइए जानते हैं.

- ड्रंप के फैसले से होर्मुज स्ट्रेट पर बढ़ा तनाव।
- चीन का सैन्य नियंत्रण के बजाय ईरान से सहयोग।
- चीन की बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति क्षेत्रीय संतुलन हेतु।
- होरमुज़ नियंत्रण से चीन को तेल व्यापार लाभ।
Middle East Crisis: डोनाल्ड ट्रंप के नाकाबंदी के फैसले के बाद होर्मुज स्ट्रेट के आसपास तनाव काफी ज्यादा बढ़ चुका है. दरअसल हाल ही में अमेरिकी नेवी ने होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाज का रास्ता ब्लॉक किया. इस पर चीन ने भड़कते हुए कहा कि हमें कोई भी तीसरा देश ईरान से अपने जहाज लाने से नहीं रोक सकता. दूसरी तरफ अमेरिका ने भी यह धमकी दे दी है कि ईरान से आने वाले चीन के तेल टैंकरों को रोका जाएगा. इसी बीच एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या चीन होर्मुज पर नियंत्रण कर सकता है? साथ ही अगर ऐसा होता है तो इसका फायदा सबसे ज्यादा किस देश को होगा? आइए जानते हैं इन सवालों के जवाब.
चीन द्वारा सीधे नियंत्रण की संभावना
बढ़ते तनाव के बावजूद चीन द्वारा सैन्य तरीकों से होर्मुज पर सीधे नियंत्रण करने की संभावना काफी कम है. यह क्षेत्र ईरान और ओमान के क्षेत्रीय जल क्षेत्र के अंदर आता है. इस पर कब्जा करने का कोई भी प्रयास एक वैश्विक संघर्ष को जन्म दे सकता है. इससे भी जरूरी बात यह है कि चीन खुद अपने तेल आयात के लिए इस मार्ग पर काफी ज्यादा निर्भर है. इससे इस क्षेत्र में किसी भी तरह की अस्थिरता उसकी अपनी अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम भरी साबित हो सकती है. लेकिन आपको बता दें कि यह नुकसान शॉर्ट टर्म होगा.
ईरान के साथ साझेदारी
सैन्य नियंत्रण के बजाय चीन द्वारा ईरान के साथ रणनीतिक सहयोग के जरिए से अपना प्रभाव बढ़ाने की ज्यादा संभावना है. फिलहाल ईरान के तेल एक्सपोर्ट का एक बड़ा हिस्सा, कथित तौर पर 90% तक चीन की तरफ ही जाता है. इस साझेदारी को मजबूत करके चीन बिना एक भी गोली चलाए इस क्षेत्र से होने वाली शिपिंग और ऊर्जा प्रवाह पर अपना दबदबा बना सकता है.
चीन की बढ़ती उपस्थिति
बीते कुछ सालों में चीन ने अरब सागर और खाड़ी क्षेत्रों में अपनी नौसैनिक और आर्थिक उपस्थिति बढ़ाई है. इस विस्तार को अमेरिकी प्रभाव के मुकाबले एक संतुलन बनाने और अपने ऊर्जा हितों की सुरक्षा करने के एक तरीके के रूप में देखा जाता है.
सबसे ज्यादा फायदा किसे होगा?
अगर चीन होर्मुज स्ट्रेट को कंट्रोल कर भी लेता है तो इसका सबसे ज्यादा फायदा भी उसे ही होगा. दरअसल अर्थव्यवस्था को होने वाला नुकसान एक शॉर्ट टर्म रिस्क है लेकिन अगर फायदे की बात करें तो वह लॉन्ग टर्म साबित हो सकता है. इसका सबसे बड़ा फायदा वैश्विक तेल व्यापार में चीनी युआन के बढ़ते महत्व के रूप में सामने आ सकता है. अगर तेल के लेन-देन अमेरिकी डॉलर से हटकर युआन में होने लगते हैं तो यह वैश्विक वित्तीय समीकरणों को पूरी तरह से बदल सकता है.
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ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक लाभ
होर्मुज स्ट्रेट पर कंट्रोल चीन को काफी ज्यादा सुरक्षित और अनुमानित ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने में सक्षम बनाएगा. इससे वैश्विक परेशानियों के प्रति उसकी संवेदनशीलता काफी कम हो जाएगी. इसी के साथ प्रतिद्वंदी अर्थव्यवस्थाओं के लिए लागत और जोखिम बढ़ने की संभावना रहेगी.
भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति काफी ज्यादा चिंताजनक हो सकती है. भारत होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले तेल पर काफी ज्यादा निर्भर है. चीन और ईरान के बीच मजबूत होती साझेदारी सप्लाई चेन को बाधित कर सकती है, कीमतों को बढ़ा सकती है और साथ ही इस क्षेत्र में रणनीतिक दबाव भी पैदा कर सकती है.
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