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भारतीयों को कैसे लगी चाय की लत, इससे पहले सुबह-सुबह दिन की शुरुआत कैसे करते थे लोग?
1950 से पहले भारतीयों की सुबह की आदतें पूरी तरह प्राकृतिक और स्वास्थ्यवर्धक थीं. अंग्रेजों ने विज्ञापन और मुफ्त वितरण के जरिए करीब 50 वर्षों में चाय को भारतीय घरों का मुख्य पेय बनाया.
आज भारत के किसी भी घर में सुबह की दस्तक बिना चाय के अधूरी मानी जाती है. नींद खुलते ही हाथ में गर्म प्याली का होना अब एक रस्म बन चुका है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस चाय के बिना हमारा दिन शुरू नहीं होता, वह हमारी संस्कृति का हिस्सा थी ही नहीं है? सदियों तक आयुर्वेद और कुदरती पेयों पर निर्भर रहने वाले भारतीयों को आखिर चाय का चसका किसने और कैसे लगाया? यह कहानी केवल एक पेय की नहीं, बल्कि एक सोची-समझी व्यापारिक रणनीति की है जिसने हमारे सुबह के सुकून को हमेशा के लिए बदल दिया.
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भारत में चाय का इतिहास बहुत पुराना नहीं है. 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में अंग्रेजों ने भारत में बड़े पैमाने पर चाय के बागान लगाए. उनका मुख्य उद्देश्य चाय को विदेशों में निर्यात करना था, लेकिन जब वैश्विक बाजार में मांग कम हुई, तो उन्होंने भारत को ही एक बड़ा बाजार बनाने का फैसला किया.
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1920 से लेकर 1950 के बीच अंग्रेजों ने बेहद आक्रामक तरीके से चाय का प्रचार किया. रेलवे स्टेशनों और कारखानों में मुफ्त चाय पिलाने के स्टॉल लगाए गए ताकि लोगों को इसका स्वाद लग सके.
Published at : 27 Mar 2026 08:36 AM (IST)
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