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जब अलार्म नहीं था तो कैसे उठते थे लोग? जानिए कौन से तरीके थे बेहद प्रचलित

स्मार्टफोन और डिजिटल घड़ी से पहले लोग सुबह जागने के लिए नॉकर अपर्स और कैंडल क्लॉक जैसे अनोखे तरीकों का इस्तेमाल करते थे. आइए बाकी और अन्य तरीकों के बारे में जानते हैं.

स्मार्टफोन और डिजिटल घड़ी से पहले लोग सुबह जागने के लिए नॉकर अपर्स और कैंडल क्लॉक जैसे अनोखे तरीकों का इस्तेमाल करते थे. आइए बाकी और अन्य तरीकों के बारे में जानते हैं.

आज के डिजिटल दौर में हमारी सुबह स्मार्टफोन के अलार्म से होती है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब बिजली और घड़ियां नहीं थीं, तब दुनिया कैसे जागती थी? ईरान-इजरायल और अमेरिका के बीच मंडराते युद्ध के बादलों ने आज पूरी दुनिया को एक अनिश्चित भविष्य की ओर धकेल दिया है, जहां तकनीक और बिजली पर निर्भरता कभी भी खतरे में पड़ सकती है. ऐसे में इतिहास के वे पुराने तरीके याद आते हैं जब इंसान तकनीक नहीं, बल्कि अपनी सूझबूझ और अनोखे पेशों के दम पर समय का पाबंद रहता था. 100-200 साल पहले लोग बिना किसी इलेक्ट्रॉनिक मशीन के भी मोर्चा संभालने के लिए वक्त पर तैयार हो जाते थे.

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औद्योगिक क्रांति के समय, खासकर 1800 से 1900 के बीच ब्रिटेन में 'नॉकर अपर्स' नाम का एक अनोखा पेशा बेहद मशहूर था. उस समय कारखानों में काम करने वाले मजदूरों के पास न तो घड़ियां थीं और न ही अलार्म खरीदने के पैसे. ऐसे में ये इंसानी अलार्म पूरी रात जागते थे और सुबह 3 बजे से ही गलियों में निकल जाते थे.
औद्योगिक क्रांति के समय, खासकर 1800 से 1900 के बीच ब्रिटेन में 'नॉकर अपर्स' नाम का एक अनोखा पेशा बेहद मशहूर था. उस समय कारखानों में काम करने वाले मजदूरों के पास न तो घड़ियां थीं और न ही अलार्म खरीदने के पैसे. ऐसे में ये इंसानी अलार्म पूरी रात जागते थे और सुबह 3 बजे से ही गलियों में निकल जाते थे.
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उनके पास एक लंबी छड़ी होती थी जिससे वे लोगों की खिड़कियों पर टक-टक करते थे. वे तब तक वहां से नहीं हटते थे जब तक घर के अंदर से कोई जागने का जवाब न दे दे. लंदन की मैरी स्मिथ जैसी महिलाएं मटर की गोलियों (pea shooter) से खिड़कियों पर निशाना लगाकर लोगों को जगाती थीं.
उनके पास एक लंबी छड़ी होती थी जिससे वे लोगों की खिड़कियों पर टक-टक करते थे. वे तब तक वहां से नहीं हटते थे जब तक घर के अंदर से कोई जागने का जवाब न दे दे. लंदन की मैरी स्मिथ जैसी महिलाएं मटर की गोलियों (pea shooter) से खिड़कियों पर निशाना लगाकर लोगों को जगाती थीं.
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सैकड़ों साल पहले चीन में लोग समय के पाबंद होने के लिए कैंडल क्लॉक का इस्तेमाल करते थे. यह तरीका बेहद चतुर और वैज्ञानिक था. वे एक लंबी मोमबत्ती पर खास निशान लगाते थे और वहां एक पीतल की कील अटका देते थे. जैसे-जैसे मोमबत्ती जलती और पिघलती, वह कील नीचे रखी धातु की ट्रे पर गिर जाती थी.
सैकड़ों साल पहले चीन में लोग समय के पाबंद होने के लिए कैंडल क्लॉक का इस्तेमाल करते थे. यह तरीका बेहद चतुर और वैज्ञानिक था. वे एक लंबी मोमबत्ती पर खास निशान लगाते थे और वहां एक पीतल की कील अटका देते थे. जैसे-जैसे मोमबत्ती जलती और पिघलती, वह कील नीचे रखी धातु की ट्रे पर गिर जाती थी.
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ट्रे पर गिरते ही जब कील छन की आवाज करती, तो लोग गहरी नींद से जाग जाते थे. प्राचीन जापान और यूरोप में भी यह तरीका रात के वक्त समय मापने और अलार्म के तौर पर बेहद लोकप्रिय था. आज जिस तरह ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ रहा है, उससे ऊर्जा और संचार संकट का खतरा पैदा हो गया है.
ट्रे पर गिरते ही जब कील छन की आवाज करती, तो लोग गहरी नींद से जाग जाते थे. प्राचीन जापान और यूरोप में भी यह तरीका रात के वक्त समय मापने और अलार्म के तौर पर बेहद लोकप्रिय था. आज जिस तरह ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ रहा है, उससे ऊर्जा और संचार संकट का खतरा पैदा हो गया है.
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अगर किसी बड़े युद्ध के कारण बिजली ग्रिड या डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर फेल होता है, तो इंसान को एक बार फिर प्रकृति और पुराने तरीकों की शरण में जाना पड़ सकता है. मुर्गे की बांग, चर्च की घंटियां और प्राकृतिक आवाजें आज भी उतने ही कारगर अलार्म हैं जितने सदियों पहले थे. प्राचीन समय में लोग सिर्फ मशीनों पर नहीं, बल्कि अपनी Biological Clock को नियंत्रित करना भी जानते थे.
अगर किसी बड़े युद्ध के कारण बिजली ग्रिड या डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर फेल होता है, तो इंसान को एक बार फिर प्रकृति और पुराने तरीकों की शरण में जाना पड़ सकता है. मुर्गे की बांग, चर्च की घंटियां और प्राकृतिक आवाजें आज भी उतने ही कारगर अलार्म हैं जितने सदियों पहले थे. प्राचीन समय में लोग सिर्फ मशीनों पर नहीं, बल्कि अपनी Biological Clock को नियंत्रित करना भी जानते थे.
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पुराने समय में लोगों के पास सबसे भरोसेमंद अलार्म मुर्गा होता था, जो सूरज की पहली किरण के साथ ही बांग देता था. ग्रामीण इलाकों में आज भी यह तरीका प्रचलित है. इसके अलावा, एक और मनोवैज्ञानिक तरीका था जिसमें लोग रात को सोने से पहले खूब पानी पीते थे. सुबह होने तक यूरिनरी ब्लैडर भर जाने के कारण शरीर में होने वाली बेचैनी उन्हें अपने आप नींद से जगा देती थी.
पुराने समय में लोगों के पास सबसे भरोसेमंद अलार्म मुर्गा होता था, जो सूरज की पहली किरण के साथ ही बांग देता था. ग्रामीण इलाकों में आज भी यह तरीका प्रचलित है. इसके अलावा, एक और मनोवैज्ञानिक तरीका था जिसमें लोग रात को सोने से पहले खूब पानी पीते थे. सुबह होने तक यूरिनरी ब्लैडर भर जाने के कारण शरीर में होने वाली बेचैनी उन्हें अपने आप नींद से जगा देती थी.
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चीन में कुछ लोग अपनी उंगलियों के बीच अगरबत्ती लगाकर सोते थे. यह तरीका सुनने में काफी जोखिम भरा लगता है, लेकिन इसे बेहद सटीकता से अंजाम दिया जाता था. जैसे ही अगरबत्ती जलते हुए उंगली के पास पहुंचती, उसकी हल्की जलन इंसान को नींद से झकझोर देती थी. यह तरीका उन योद्धाओं या संदेशवाहकों के लिए था जिन्हें कम समय की नींद लेकर जल्दी मोर्चे पर लौटना होता था.
चीन में कुछ लोग अपनी उंगलियों के बीच अगरबत्ती लगाकर सोते थे. यह तरीका सुनने में काफी जोखिम भरा लगता है, लेकिन इसे बेहद सटीकता से अंजाम दिया जाता था. जैसे ही अगरबत्ती जलते हुए उंगली के पास पहुंचती, उसकी हल्की जलन इंसान को नींद से झकझोर देती थी. यह तरीका उन योद्धाओं या संदेशवाहकों के लिए था जिन्हें कम समय की नींद लेकर जल्दी मोर्चे पर लौटना होता था.

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