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क्या मस्जिद से जबरन लाउडस्पीकर उतरवा सकती है सरकार? क्या है नियम

Mosque Loudspeaker Rules: पश्चिम बंगाल में मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने की तैयारी चल रही है. इसी बीच आइए जानते हैं कि क्या सरकार जबरदस्ती मस्जिदों से लाउडस्पीकर उतरवा सकती है.

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  • पश्चिम बंगाल में लाउडस्पीकर विवाद, नौशाद सिद्दीकी ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए।
  • लाउडस्पीकर का उपयोग मौलिक अधिकार नहीं, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है।
  • रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लाउडस्पीकर का उपयोग प्रतिबंधित रहता है।
  • अनुमति आवश्यक और ध्वनि सीमा तय, डेसिबल मीटर से जाँच की जाती है।

Mosque Loudspeaker Rules: पश्चिम बंगाल में मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने को लेकर विवाद बढ़ता ही जा रहा है. इंडियन सेकुलर फ्रंट के नौशाद सिद्दीकी ने पुलिस की कार्यवाही पर सवाल उठाते हुए कहा है कि अगर प्रशासन बिना किसी लिखित आदेश के मस्जिदों पर लाउडस्पीकर हटाने का दबाव बनाता है तो वह कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे. उन्होंने यह भी कहा है कि इस मामले को लेकर राज्य के पुलिस महानिदेशक को एक ईमेल भेजा गया है. इस विवाद के बीच आइए जानते हैं कि क्या सरकार मस्जिदों से जबरन लाउडस्पीकर हटा सकती है और साथ ही इनके इस्तेमाल के बारे में कानून क्या कहता है. 

क्या लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करना मौलिक अधिकार है?

संविधान धर्म की आजादी की गारंटी देता है. जिसमें अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार-प्रसार करने का पूरा अधिकार है. लेकिन यह स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और दूसरे कानूनी प्रतिबंधों के अधीन है.

लाउडस्पीकर का इस्तेमाल अपने आप में मौलिक अधिकार नहीं माना जाता. इस वजह से धार्मिक संस्थान एम्प्लीफिकेशन उपकरण के इस्तेमाल के लिए बिना किसी रोक टोक के अधिकार का दवा नहीं कर सकते. भले ही उसकी आवाज कितनी भी तेज हो, वक्त कुछ भी हो या फिर आस-पास रहने वाले लोगों पर उसका कैसा भी असर पड़े.

अदालतों ने बार-बार धार्मिक रीति-रिवाज और लाउडस्पीकर के इस्तेमाल के बीच अंतर साफ किया है. प्रार्थना या फिर पूजा एक जरूरी धार्मिक गतिविधि हो सकती है लेकिन इसे तेज आवाज में सुनाने के लिए लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करना अपने आप में कोई अनिवार्य धार्मिक अधिकार नहीं माना जाता. 

यह भी पढ़ेंः हिंदू, मुस्लिम या ईसाई... धर्म बदलना किस रिलीजन में ज्यादा मुश्किल, जानें यहां?

लाउडस्पीकर के समय के बारे में कानून क्या कहता है? 

ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम 2000, लाउडस्पीकर और पब्लिक एड्रेस सिस्टम के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाते हैं. आमतौर पर सार्वजनिक स्थानों पर रात 10:00 बजे से सुबह 6:00 बजे तक के बीच लाउडस्पीकर का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. राज्य सरकार सीमित छूट दे सकती है, जिससे धार्मिक या फिर संस्कृतिक अवसरों के दौरान कुछ खास दिनों में आधी रात तक इनके इस्तेमाल की मंजूरी मिल सकती है. इसका मतलब है कि भले ही किसी धार्मिक संस्थान को लाउडस्पीकर चलाने की अनुमति हो लेकिन वह यह नहीं मान सकता कि उसका इस्तेमाल पूरी रात किया जा सकता है. 


क्या मस्जिद से जबरन लाउडस्पीकर उतरवा सकती है सरकार? क्या है नियम

क्या लिखित अनुमति जरूरी है? 

लाउडस्पीकर या फिर पब्लिक एड्रेस सिस्टम लगाने और इस्तेमाल करने के लिए आमतौर पर अधिकारी से अनुमति लेनी जरूरी है. राज्य और स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था के आधार पर अनुमति जिला मजिस्ट्रेट, पुलिस कमिश्नर या फिर किसी दूसरे अधिकृत अधिकारी द्वारा दी जा सकती है. इस वजह से बिना जरूरी अनुमति के लगाए गए लाउडस्पीकर को अनऑथराइज्ड माना जा सकता है.

प्रशासन ऐसे उपकरणों को हटाने के आदेश दे सकता है या फिर कानून के तहत अनुमति प्राप्त दूसरी कार्रवाई कर सकता है. हालांकि क्या अधिकारियों को पहले लिखित नोटिस या फिर आदेश जारी करना होगा यह उस राज्य के खास नियम और उल्लंघन के स्थिति पर ही निर्भर होता है.


क्या मस्जिद से जबरन लाउडस्पीकर उतरवा सकती है सरकार? क्या है नियम

कानूनी तौर पर कितनी आवाज की इजाजत है? 

लाउडस्पीकर इस्तेमाल करने की इजाजत का मतलब यह नहीं है कि इसे किसी भी आवाज में चलाया जा सकता है. शोर की सीमा आसपास के इलाके की प्रकृति के आधार पर तय की जाती है. रिहायशी इलाकों के लिए शोर की तय सीमा आमतौर पर दिन में 55 डेसिबल और रात में 45 डेसिबल होती है. कमर्शियल और इंडस्ट्रियल इलाकों के लिए सीमा ज्यादा होती है और साइलेंस जोन के लिए नियम ज्यादा सख्त होते हैं.

साइलेंस जोन में आमतौर पर अस्पताल, शिक्षण संस्थान और ऐसी दूसरी जगह आती हैं जहां शोर से ज्यादा सुरक्षा की जरूरत होती है. अधिकारी यह पता लगाने के लिए साउंड लेवल या डेसिमल मीटर का इस्तेमाल कर सकते हैं कि क्या लाउडस्पीकर तय से सीमा से ज्यादा शोर कर रहा है. अगर आवाज ज्यादा पाई जाती है तो अधिकारी चलाने वालों को आवाज कम करने या फिर दूसरी शर्तों का पालन करने का निर्देश दे सकते हैं.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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