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कब और कैसे तैयार हुआ था दुनिया का पहला फ्रिज, बिना बिजली किस तरह करता था काम?

आज रसोई की शान बन चुका फ्रिज एक वक्त पर बिजली से नहीं चलता था. दुनिया का पहला कंप्रेसर आधारित फ्रिज 1834 में बनाया गया, जो बहुत बड़ा और जहरीली गैसों के कारण केवल उद्योगों में इस्तेमाल होता था.

आज रसोई की शान बन चुका फ्रिज एक वक्त पर बिजली से नहीं चलता था. दुनिया का पहला कंप्रेसर आधारित फ्रिज 1834 में बनाया गया, जो बहुत बड़ा और जहरीली गैसों के कारण केवल उद्योगों में इस्तेमाल होता था.

आज के समय में फ्रिज हमारी रसोई का एक ऐसा जरूरी हिस्सा बन चुका है जिसके बिना जिंदगी अधूरी सी लगती है. ठंडे पानी से लेकर ताजी सब्जियों और बची हुई दाल को सुरक्षित रखने तक, फ्रिज हर पल हमारे काम आता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब दुनिया में यह मशीन नहीं थी, तब लोग क्या करते थे? फ्रिज के आविष्कार से पहले हजारों सालों तक इंसानों के पास खाना ठंडा रखने का कोई साधन नहीं था. उस दौर में लोग नदियों की बर्फ को जमीन के नीचे गड्ढे खोदकर छुपाते थे, ताकि गर्मियों में उसका इस्तेमाल किया जा सके.

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रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सदियों से मिट्टी के मटके को ही असली देसी फ्रिज के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है. करीब 2500 ईसा पूर्व की सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई के दौरान मिले मिट्टी के विशेष बर्तन इस बात का पुख्ता सबूत हैं कि हमारे पूर्वज मिट्टी की मदद से पानी और अनाज को ठंडा रखते थे.
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सदियों से मिट्टी के मटके को ही असली देसी फ्रिज के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है. करीब 2500 ईसा पूर्व की सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई के दौरान मिले मिट्टी के विशेष बर्तन इस बात का पुख्ता सबूत हैं कि हमारे पूर्वज मिट्टी की मदद से पानी और अनाज को ठंडा रखते थे.
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वहीं दूसरी तरफ ईरान में मिट्टी की बड़ी-बड़ी गुंबददार इमारतें बनाई जाती थीं और यूरोप के अमीर लोग अपने घरों में खास तौर पर 'आइस हाउस' बनवाते थे, ताकि ठंडक को लंबे समय तक कैद रखा जा सके.
वहीं दूसरी तरफ ईरान में मिट्टी की बड़ी-बड़ी गुंबददार इमारतें बनाई जाती थीं और यूरोप के अमीर लोग अपने घरों में खास तौर पर 'आइस हाउस' बनवाते थे, ताकि ठंडक को लंबे समय तक कैद रखा जा सके.
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इंसान के मन में मशीनों के जरिए ठंडक पैदा करने का पहला विचार 18वीं सदी में आया था. सबसे पहले स्कॉटिश प्रोफेसर विलियम कुलेन ने साल 1755 में एक छोटी सी मशीन का ढांचा तैयार किया था, जो आसपास की हवा को सोखकर बर्फ जमा देती थी. हालांकि, यह प्रयोग केवल लैब तक ही सीमित रहा.
इंसान के मन में मशीनों के जरिए ठंडक पैदा करने का पहला विचार 18वीं सदी में आया था. सबसे पहले स्कॉटिश प्रोफेसर विलियम कुलेन ने साल 1755 में एक छोटी सी मशीन का ढांचा तैयार किया था, जो आसपास की हवा को सोखकर बर्फ जमा देती थी. हालांकि, यह प्रयोग केवल लैब तक ही सीमित रहा.
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इसके बाद साल 1805 में अमेरिकी आविष्कारक ओलिवर इवांस ने भी बर्फ बनाने की एक मशीन पर काम किया, लेकिन इस तकनीक को असली कामयाबी साल 1834 में मिली जब अमेरिकी इंजीनियर जैकब पर्किंस ने पहली रेफ्रिजरेशन मशीन बनाकर उसका पेटेंट कराया.
इसके बाद साल 1805 में अमेरिकी आविष्कारक ओलिवर इवांस ने भी बर्फ बनाने की एक मशीन पर काम किया, लेकिन इस तकनीक को असली कामयाबी साल 1834 में मिली जब अमेरिकी इंजीनियर जैकब पर्किंस ने पहली रेफ्रिजरेशन मशीन बनाकर उसका पेटेंट कराया.
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जैकब पर्किंस को उनके इसी ऐतिहासिक योगदान के कारण आज 'फादर ऑफ द रेफ्रिजरेटर' यानी फ्रिज का जनक कहा जाता है. उनका बनाया हुआ वह दुनिया का पहला फ्रिज लकड़ी और धातु के एक भारी-भरकम फ्रेम से तैयार किया गया था.
जैकब पर्किंस को उनके इसी ऐतिहासिक योगदान के कारण आज 'फादर ऑफ द रेफ्रिजरेटर' यानी फ्रिज का जनक कहा जाता है. उनका बनाया हुआ वह दुनिया का पहला फ्रिज लकड़ी और धातु के एक भारी-भरकम फ्रेम से तैयार किया गया था.
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आज के आधुनिक फ्रिज भी काफी हद तक पर्किंस की उसी पुरानी बेसिक डिजाइन पर काम करते हैं. उस शुरुआती मशीन के भीतर एक कंप्रेसर, पाइपों का जाल और कुछ खास केमिकल गैसों का इस्तेमाल किया गया था, जो मिलकर तापमान को तेजी से कम करने की क्षमता रखती थीं.
आज के आधुनिक फ्रिज भी काफी हद तक पर्किंस की उसी पुरानी बेसिक डिजाइन पर काम करते हैं. उस शुरुआती मशीन के भीतर एक कंप्रेसर, पाइपों का जाल और कुछ खास केमिकल गैसों का इस्तेमाल किया गया था, जो मिलकर तापमान को तेजी से कम करने की क्षमता रखती थीं.
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दुनिया का वह पहला फ्रिज आज की तरह बिजली से नहीं, बल्कि पूरी तरह से भाप के इंजन से चलाया जाता था. बिजली का आविष्कार न होने के कारण कंप्रेसर को घुमाने के लिए भाप की भारी ऊर्जा का सहारा लेना पड़ता था. आकार में बहुत बड़ा होने के कारण उस फ्रिज को किसी साधारण घर की रसोई में रखना पूरी तरह असंभव था.
दुनिया का वह पहला फ्रिज आज की तरह बिजली से नहीं, बल्कि पूरी तरह से भाप के इंजन से चलाया जाता था. बिजली का आविष्कार न होने के कारण कंप्रेसर को घुमाने के लिए भाप की भारी ऊर्जा का सहारा लेना पड़ता था. आकार में बहुत बड़ा होने के कारण उस फ्रिज को किसी साधारण घर की रसोई में रखना पूरी तरह असंभव था.
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इसके साथ ही यह शुरुआती तकनीक बहुत ज्यादा महंगी थी, इसमें ईंधन की खपत बहुत अधिक होती थी और इसका रख-रखाव करना भी आम आदमी के बस की बात नहीं थी. शुरुआती दौर के रेफ्रिजरेटरों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह थी कि उनमें ठंडक पैदा करने के लिए जिन गैसों का इस्तेमाल किया जाता था, वे बेहद जहरीली और ज्वलनशील (जल्दी आग पकड़ने वाली) होती थीं.
इसके साथ ही यह शुरुआती तकनीक बहुत ज्यादा महंगी थी, इसमें ईंधन की खपत बहुत अधिक होती थी और इसका रख-रखाव करना भी आम आदमी के बस की बात नहीं थी. शुरुआती दौर के रेफ्रिजरेटरों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह थी कि उनमें ठंडक पैदा करने के लिए जिन गैसों का इस्तेमाल किया जाता था, वे बेहद जहरीली और ज्वलनशील (जल्दी आग पकड़ने वाली) होती थीं.
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इनके लीक होने पर जान का खतरा बना रहता था, यही वजह थी कि शुरुआत में इस मशीन का इस्तेमाल घरों के बजाय सिर्फ बड़े-बड़े उद्योगों और कारखानों तक ही सीमित रखा गया. इसी दौरान अमेरिकी डॉक्टर जॉन गौरी ने अस्पतालों के मरीजों को ठंडी हवा देने के लिए बर्फ बनाने वाली एक नई मशीन का विकास किया था.
इनके लीक होने पर जान का खतरा बना रहता था, यही वजह थी कि शुरुआत में इस मशीन का इस्तेमाल घरों के बजाय सिर्फ बड़े-बड़े उद्योगों और कारखानों तक ही सीमित रखा गया. इसी दौरान अमेरिकी डॉक्टर जॉन गौरी ने अस्पतालों के मरीजों को ठंडी हवा देने के लिए बर्फ बनाने वाली एक नई मशीन का विकास किया था.
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साल 1870 के दशक में जर्मन इंजीनियर कार्ल वॉन लिंडे ने रेफ्रिजरेशन के क्षेत्र में एक और बड़ी प्रणाली विकसित की, जिसने दुनिया के बीयर उद्योग, मीट मार्केट और बड़े फूड स्टोरेज सेंटर्स में एक बड़ी क्रांति ला दी. रिपोर्ट के मुताबिक, इस नई जर्मन तकनीक ने मशीन के भीतर से ऑक्सीजन को बाहर निकालकर रेफ्रिजरेशन की पूरी प्रक्रिया को पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित और उपयोगी बना दिया था. इसके बाद ही फ्रिज को आम इंसानों के घरों तक पहुंचाने का रास्ता पूरी तरह साफ हो सका.
साल 1870 के दशक में जर्मन इंजीनियर कार्ल वॉन लिंडे ने रेफ्रिजरेशन के क्षेत्र में एक और बड़ी प्रणाली विकसित की, जिसने दुनिया के बीयर उद्योग, मीट मार्केट और बड़े फूड स्टोरेज सेंटर्स में एक बड़ी क्रांति ला दी. रिपोर्ट के मुताबिक, इस नई जर्मन तकनीक ने मशीन के भीतर से ऑक्सीजन को बाहर निकालकर रेफ्रिजरेशन की पूरी प्रक्रिया को पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित और उपयोगी बना दिया था. इसके बाद ही फ्रिज को आम इंसानों के घरों तक पहुंचाने का रास्ता पूरी तरह साफ हो सका.
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दुनिया के बाजारों में घरेलू इस्तेमाल के लिए पहले छोटे इलेक्ट्रिक फ्रिज की एंट्री साल 1913 में हुई. बिजली से चलने के कारण यह मशीन बहुत सुरक्षित और आकार में छोटी हो गई थी. अगले 20 सालों में अमेरिका और यूरोप के देशों में इन इलेक्ट्रिक कप्तानों की मांग बहुत तेजी से बढ़ी.
दुनिया के बाजारों में घरेलू इस्तेमाल के लिए पहले छोटे इलेक्ट्रिक फ्रिज की एंट्री साल 1913 में हुई. बिजली से चलने के कारण यह मशीन बहुत सुरक्षित और आकार में छोटी हो गई थी. अगले 20 सालों में अमेरिका और यूरोप के देशों में इन इलेक्ट्रिक कप्तानों की मांग बहुत तेजी से बढ़ी.
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साल 1920 और 1930 के दशक तक आते-आते यह फ्रिज मध्यमवर्गीय परिवारों की पहुंच के भीतर आने लगा था. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, साल 1950 तक अमेरिका के लगभग हर शहरी घर की रसोई में फ्रिज अपनी जगह बना चुका था.
साल 1920 और 1930 के दशक तक आते-आते यह फ्रिज मध्यमवर्गीय परिवारों की पहुंच के भीतर आने लगा था. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, साल 1950 तक अमेरिका के लगभग हर शहरी घर की रसोई में फ्रिज अपनी जगह बना चुका था.
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भारत के इतिहास में पहली बार साल 1928 में विदेशों से आयात करके फ्रिज का इस्तेमाल शुरू किया गया था. उस समय फ्रिज को केवल इंग्लैंड और अमेरिका से ही मंगाया जाता था, और यह अमीर राजा-महाराजाओं के लिए एक बेहद कीमती और लग्जरी सामान माना जाता था.
भारत के इतिहास में पहली बार साल 1928 में विदेशों से आयात करके फ्रिज का इस्तेमाल शुरू किया गया था. उस समय फ्रिज को केवल इंग्लैंड और अमेरिका से ही मंगाया जाता था, और यह अमीर राजा-महाराजाओं के लिए एक बेहद कीमती और लग्जरी सामान माना जाता था.

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