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क्या चांद पर भी आता है तूफान, पृथ्वी से यह कितना अलग?

Moon Storms: चांद पर आने वाले तूफान पृथ्वी से काफी अलग होते हैं. आइए जानते हैं कि आखिर चांद पर कैसे तूफान आते हैं.

Moon Storms: चांद पर आने वाले तूफान पृथ्वी से काफी अलग होते हैं. आइए जानते हैं कि आखिर चांद पर कैसे तूफान आते हैं.

Moon Storms: जब भी हम तूफानों के बारे में सोचते हैं तो आम तौर पर हमारे दिमाग में तेज हवाएं, भारी बारिश, गरज और बिजली चमकने की तस्वीर आती है. लेकिन चांद पर मौसम बिल्कुल अलग तरह का होता है. वहां पृथ्वी की तरह कोई घना वायुमंडल नहीं है इस वजह से वहां हवा, बादल और बारिश वाले सामान्य तूफान नहीं आ सकते. आइए जानते हैं कि चांद पर कैसे तूफान आते हैं और वे पृथ्वी से कैसे अलग होते हैं.

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पृथ्वी के उलट चांद पर कोई घना वायुमंडल नहीं है जो बादल, बारिश और तेज हवा वाले सामान्य मौसम तंत्र को सहारा दे सके. हालांकि इसका मतलब यह नहीं होता कि चांद पर तूफान आते ही नहीं है.
पृथ्वी के उलट चांद पर कोई घना वायुमंडल नहीं है जो बादल, बारिश और तेज हवा वाले सामान्य मौसम तंत्र को सहारा दे सके. हालांकि इसका मतलब यह नहीं होता कि चांद पर तूफान आते ही नहीं है.
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पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र और घना वायुमंडल हमें सूरज के हानिकारक विकिरण से काफी हद तक बचाता है. चांद पर ऐसी कोई भी परत नहीं है इस वजह से कोरोनावायरस इंजेक्शन के दौरान निकलने वाले चार्जड पार्टिकल्स और ऊर्जा सीधे इसकी सतह से टकराते हैं. यह सौर तूफान चंद्रमा की मिट्टी में इलेक्ट्रोस्टेटिक डिस्चार्ज पैदा कर सकते हैं. इसे कभी-कभी छोटी बिजली के रूप में भी देखा जाता है.
पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र और घना वायुमंडल हमें सूरज के हानिकारक विकिरण से काफी हद तक बचाता है. चांद पर ऐसी कोई भी परत नहीं है इस वजह से कोरोनावायरस इंजेक्शन के दौरान निकलने वाले चार्जड पार्टिकल्स और ऊर्जा सीधे इसकी सतह से टकराते हैं. यह सौर तूफान चंद्रमा की मिट्टी में इलेक्ट्रोस्टेटिक डिस्चार्ज पैदा कर सकते हैं. इसे कभी-कभी छोटी बिजली के रूप में भी देखा जाता है.
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चांद पर सूरज के प्रकाश वाले हिस्से और अंधेरे वाले हिस्से को अलग करने वाली सीमा के पास धूल से जुड़ी एक अनोखी घटना होती है. इस सीमा को टर्मिनेटर कहा जाता है. सूरज की रोशनी वाले हिस्से पर पॉजिटिव इलेक्ट्रिकल चार्ज आ जाता है जबकि अंधेरे वाले हिस्से पर नेगेटिव चार्ज होता है. इस विद्युत अंतर की वजह से चांद की बारीक धूल सतह के ऊपर उठकर हॉरिजॉन्टल दिशा में चलने लगती है.
चांद पर सूरज के प्रकाश वाले हिस्से और अंधेरे वाले हिस्से को अलग करने वाली सीमा के पास धूल से जुड़ी एक अनोखी घटना होती है. इस सीमा को टर्मिनेटर कहा जाता है. सूरज की रोशनी वाले हिस्से पर पॉजिटिव इलेक्ट्रिकल चार्ज आ जाता है जबकि अंधेरे वाले हिस्से पर नेगेटिव चार्ज होता है. इस विद्युत अंतर की वजह से चांद की बारीक धूल सतह के ऊपर उठकर हॉरिजॉन्टल दिशा में चलने लगती है.
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टर्मिनेटर के पास इलेक्ट्रिकली चार्ज धूल की हलचल से कुछ अनोखे दृश्य बन सकते हैं. नील आर्मस्ट्रांग और दूसरे अंतरिक्ष यात्रियों ने इस घटना से जुड़ी धुंधली और चमकती हुई लकीरें देखी थी. पृथ्वी पर आने वाली धूल भरी आंधियों के उलट यह गतिविधि तेज हवाओं की वजह से नहीं बल्कि इलेक्ट्रिकल चार्जिंग की वजह से होती है.
टर्मिनेटर के पास इलेक्ट्रिकली चार्ज धूल की हलचल से कुछ अनोखे दृश्य बन सकते हैं. नील आर्मस्ट्रांग और दूसरे अंतरिक्ष यात्रियों ने इस घटना से जुड़ी धुंधली और चमकती हुई लकीरें देखी थी. पृथ्वी पर आने वाली धूल भरी आंधियों के उलट यह गतिविधि तेज हवाओं की वजह से नहीं बल्कि इलेक्ट्रिकल चार्जिंग की वजह से होती है.
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पृथ्वी पर छोटे उल्कापिंड वायुमंडल में प्रवेश करते समय घर्षण की वजह से जल जाते हैं. इन्हें लोग टूटता तारा कहते हैं. चांद पर इन चीजों को रोकने के लिए कोई सुरक्षात्मक वायुमंडल नहीं है. इसी वजह से माइक्रोमीटियोरॉइड्स कहीं जाने वाले अंतरिक्ष के छोटे पत्थर काफी तेजी से चांद की सतह तक पहुंच सकते हैं.
पृथ्वी पर छोटे उल्कापिंड वायुमंडल में प्रवेश करते समय घर्षण की वजह से जल जाते हैं. इन्हें लोग टूटता तारा कहते हैं. चांद पर इन चीजों को रोकने के लिए कोई सुरक्षात्मक वायुमंडल नहीं है. इसी वजह से माइक्रोमीटियोरॉइड्स कहीं जाने वाले अंतरिक्ष के छोटे पत्थर काफी तेजी से चांद की सतह तक पहुंच सकते हैं.
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इनका टकराना कोई इक्का-दुक्का  घटना नहीं है. बल्कि यह लगातार चांद की सतह पर बमबारी करते रहते हैं. इतनी तेज रफ्तार से टकराने की वजह से चांद की चट्टान और मिट्टी टूटकर और पीसकर काफी बारीक कणों में बदल जाती है. यह प्रक्रिया चांद की सतह को आकार देने और रेगोलिथ कहे जाने वाली बारीक धूल बनाने में बड़ी भूमिका निभाती है.
इनका टकराना कोई इक्का-दुक्का घटना नहीं है. बल्कि यह लगातार चांद की सतह पर बमबारी करते रहते हैं. इतनी तेज रफ्तार से टकराने की वजह से चांद की चट्टान और मिट्टी टूटकर और पीसकर काफी बारीक कणों में बदल जाती है. यह प्रक्रिया चांद की सतह को आकार देने और रेगोलिथ कहे जाने वाली बारीक धूल बनाने में बड़ी भूमिका निभाती है.
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पृथ्वी का वायुमंडल और महासागर तापमान को कंट्रोल करने में मदद करते हैं. इससे तापमान में काफी ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं होता. चांद पर वायुमंडल या फिर महासागर जैसी कोई भी चीज नहीं है जो तापमान को कंट्रोल कर सके.
पृथ्वी का वायुमंडल और महासागर तापमान को कंट्रोल करने में मदद करते हैं. इससे तापमान में काफी ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं होता. चांद पर वायुमंडल या फिर महासागर जैसी कोई भी चीज नहीं है जो तापमान को कंट्रोल कर सके.
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जब सूरज की रोशनी चली जाती है तो चांद का तापमान तेजी से गिर जाता है. रात के वक्त तापमान लगभग - 130 डिग्री सेल्सियस तक और कभी-कभी -200 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे जा सकता है.
जब सूरज की रोशनी चली जाती है तो चांद का तापमान तेजी से गिर जाता है. रात के वक्त तापमान लगभग - 130 डिग्री सेल्सियस तक और कभी-कभी -200 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे जा सकता है.

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