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Arhar Dal Farming: अरहर की खेती के लिए आजमाएं ये तकनीक, 20 गुना तक बढ़ जाएगी पैदावार

Arhar Dal Farming: अरहर की खेती में बुवाई के तरीके, पौधों की सही दूरी और ड्रिप सिंचाई जैसी तकनीकों को अपनाकर किसान पैदावार में करीब 20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी कर सकते हैं. जानें पूरी जानकारी.

Arhar Dal Farming: अरहर की खेती में बुवाई के तरीके, पौधों की सही दूरी और ड्रिप सिंचाई जैसी तकनीकों को अपनाकर किसान पैदावार में करीब 20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी कर सकते हैं. जानें पूरी जानकारी.

अरहर की खेती भारत के किसानों के लिए हमेशा से एक प्रॉफिटेबल बिजनेस रहा है. साथ ही अरहर की दाल भारत के लगभग हर घर की रसोई का हिस्सा होता है. यही वजह है कि इसकी मांग सालभर बनी रहती है. लेकिन कई किसान आज भी पुराने तरीके से खेती करते हैं, जिससे उन्हें उम्मीद के मुताबिक उत्पादन नहीं मिल पाता. ऐसे में कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर बुवाई के तरीके और पौधों की दूरी में थोड़ा बदलाव किया जाए तो अरहर की पैदावार में करीब 20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की जा सकती है. इस लिए अब खेती की इस तकनीक को अपनाना बेहद जरूरी हो गया है.

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इसके मुताबिक अरहर बोने के पैटर्न और टाइमिंग में मामूली सा बदलाव करके न सिर्फ सॉइल हेल्थ सुधारी जा सकती है. बल्कि प्रोडक्शन को भी नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया जा सकता है. यह तकनीक उन किसानों के लिए मुनाफे वाली साबित हो रही है जो पुराने ढर्रे से हटकर कुछ नया और ज्यादा मुनाफे वाला करना चाहते हैं. आप भी जान लें पूरा तरीका.
इसके मुताबिक अरहर बोने के पैटर्न और टाइमिंग में मामूली सा बदलाव करके न सिर्फ सॉइल हेल्थ सुधारी जा सकती है. बल्कि प्रोडक्शन को भी नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया जा सकता है. यह तकनीक उन किसानों के लिए मुनाफे वाली साबित हो रही है जो पुराने ढर्रे से हटकर कुछ नया और ज्यादा मुनाफे वाला करना चाहते हैं. आप भी जान लें पूरा तरीका.
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अरहर की अच्छी फसल के लिए सबसे जरूरी है कि पौधों को पर्याप्त जगह मिले. इस नई तकनीक के तहत अरहर की बुवाई के लिए पौधों की दूरी और लाइनों के बीच के गैप पर विशेष ध्यान देना होता है. पहले किसान बीजों को काफी पास-पास बोते थे. जिससे पौधों को पर्याप्त धूप, हवा और पोषण नहीं मिल पाती थी.  रिसर्च बताती है कि अगर अरहर को बेड प्लांटिंग या चौड़ी कतारों में लगाया जाए. तो पौधों की जड़ों का विकास बेहतर होता है.  वहीं जब पौधों को खुला वातावरण मिलता है तो उनकी बढ़वार भी अच्छी होती है और फलियां ज्यादा लगती हैं.
अरहर की अच्छी फसल के लिए सबसे जरूरी है कि पौधों को पर्याप्त जगह मिले. इस नई तकनीक के तहत अरहर की बुवाई के लिए पौधों की दूरी और लाइनों के बीच के गैप पर विशेष ध्यान देना होता है. पहले किसान बीजों को काफी पास-पास बोते थे. जिससे पौधों को पर्याप्त धूप, हवा और पोषण नहीं मिल पाती थी. रिसर्च बताती है कि अगर अरहर को बेड प्लांटिंग या चौड़ी कतारों में लगाया जाए. तो पौधों की जड़ों का विकास बेहतर होता है. वहीं जब पौधों को खुला वातावरण मिलता है तो उनकी बढ़वार भी अच्छी होती है और फलियां ज्यादा लगती हैं.
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अच्छी फसल की शुरुआत में बुवाई के समय मिट्टी की नमी का ध्यान रखना और हाई-क्वालिटी बीजों का सिलेक्शन करना सबसे अहम है.  बहुत सूखी या बहुत गीली मिट्टी दोनों ही फसल के लिए नुकसानदायक हो सकती हैं.  इसके साथ ही प्रमाणित और अच्छी गुणवत्ता वाले बीजों का चयन करना भी जरूरी है. सही बीज फसल को मजबूत बनाते हैं और रोगों का खतरा कम करते हैं.
अच्छी फसल की शुरुआत में बुवाई के समय मिट्टी की नमी का ध्यान रखना और हाई-क्वालिटी बीजों का सिलेक्शन करना सबसे अहम है. बहुत सूखी या बहुत गीली मिट्टी दोनों ही फसल के लिए नुकसानदायक हो सकती हैं. इसके साथ ही प्रमाणित और अच्छी गुणवत्ता वाले बीजों का चयन करना भी जरूरी है. सही बीज फसल को मजबूत बनाते हैं और रोगों का खतरा कम करते हैं.
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पानी की बचत और सिंचाई के लिए ड्रिप सिस्टम का यूज और समय पर निराई-गुड़ाई करने से फसल को बीमारियों से बचाया जा सकता है. इस तकनीक में पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है.  इससे पानी की बर्बादी कम होती है और पौधों को जरूरत के अनुसार नमी मिलती रहती है.  साथ ही समय-समय पर निराई-गुड़ाई करने से खेत खरपतवार से मुक्त रहता है और फसल स्वस्थ बनी रहती है.
पानी की बचत और सिंचाई के लिए ड्रिप सिस्टम का यूज और समय पर निराई-गुड़ाई करने से फसल को बीमारियों से बचाया जा सकता है. इस तकनीक में पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है. इससे पानी की बर्बादी कम होती है और पौधों को जरूरत के अनुसार नमी मिलती रहती है. साथ ही समय-समय पर निराई-गुड़ाई करने से खेत खरपतवार से मुक्त रहता है और फसल स्वस्थ बनी रहती है.
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अरहर की खेती में किसान इंटरक्रॉपिंग यानी मिश्रित खेती भी अपना सकते हैं. यानी अरहर के साथ दूसरी छोटी फसलें उगाकर अपनी जमीन का मैक्सिमम यूज करना . जिससे लागत कम और प्रॉफिट ज्यादा होता है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि इससे जमीन का बेहतर उपयोग होता है, लागत कम होती है और किसानों की कुल आय बढ़ सकती है.
अरहर की खेती में किसान इंटरक्रॉपिंग यानी मिश्रित खेती भी अपना सकते हैं. यानी अरहर के साथ दूसरी छोटी फसलें उगाकर अपनी जमीन का मैक्सिमम यूज करना . जिससे लागत कम और प्रॉफिट ज्यादा होता है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि इससे जमीन का बेहतर उपयोग होता है, लागत कम होती है और किसानों की कुल आय बढ़ सकती है.
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जब पौधों के बीच सही दूरी होती है तो उन्हें पर्याप्त हवा और धूप मिलती है. इससे नमी कम जमा होती है और कई प्रकार के कीट व रोगों का खतरा भी घट जाता है.  अच्छी रोशनी मिलने से पौधों में फलियों की संख्या बढ़ती है और दानों की गुणवत्ता भी बेहतर होती है.  यही वजह है कि कृषि विशेषज्ञ सही स्पेसिंग को फसल बढ़ाने का सबसे आसान तरीका मानते हैं.
जब पौधों के बीच सही दूरी होती है तो उन्हें पर्याप्त हवा और धूप मिलती है. इससे नमी कम जमा होती है और कई प्रकार के कीट व रोगों का खतरा भी घट जाता है. अच्छी रोशनी मिलने से पौधों में फलियों की संख्या बढ़ती है और दानों की गुणवत्ता भी बेहतर होती है. यही वजह है कि कृषि विशेषज्ञ सही स्पेसिंग को फसल बढ़ाने का सबसे आसान तरीका मानते हैं.
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अरहर की बुवाई के तरीके में किए गए इस मामूली से बदलाव की वजह से अरहर की पैदावार में 20 परसेंट तक की सीधी बढ़ोतरी देखी गई है. यह कोई छोटा आंकड़ा नहीं है. क्योंकि इससे किसानों की नेट सेविंग्स काफी बढ़ जाती है. सही स्पेसिंग और मैनेजमेंट से पौधों में फलियों की संख्या बढ़ती है और दानों की क्वालिटी भी बेहतर होती है.  बता दें कि जब फसल को एयर और लाइट सही मात्रा में मिलती है, तो वह कीड़ों के हमले के प्रति ज्यादा रेजिस्टेंट बन जाती है.
अरहर की बुवाई के तरीके में किए गए इस मामूली से बदलाव की वजह से अरहर की पैदावार में 20 परसेंट तक की सीधी बढ़ोतरी देखी गई है. यह कोई छोटा आंकड़ा नहीं है. क्योंकि इससे किसानों की नेट सेविंग्स काफी बढ़ जाती है. सही स्पेसिंग और मैनेजमेंट से पौधों में फलियों की संख्या बढ़ती है और दानों की क्वालिटी भी बेहतर होती है. बता दें कि जब फसल को एयर और लाइट सही मात्रा में मिलती है, तो वह कीड़ों के हमले के प्रति ज्यादा रेजिस्टेंट बन जाती है.

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