क्या न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफरेशन सिर्फ दुश्मनों के लिए है? ट्रंप प्रशासन, सऊदी अरब और अमेरिका का दोहरा मापदंड

दुनिया में अगर किसी मुल्क का नाम "न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफरेशन" (परमाणु प्रसार रोकने) का सबसे बड़ा झंडाबरदार बनकर सामने आता है, तो वह अमेरिका है. दशकों से वॉशिंगटन दुनिया को यह समझाता रहा है कि परमाणु तकनीक का प्रसार मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा है. लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सिद्धांत सबके लिए बराबर है, या फिर केवल उन देशों के लिए जिनसे अमेरिका के रिशते बेहतर नहीं है.
हाल ही में CNN की रिपोर्ट ने इसी सवाल को फिर जिंदा कर दिया है. रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप प्रशासन ने सऊदी अरब के नागरिक परमाणु कार्यक्रम के लिए यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) की इजाजत देने वाले मसौदा समझौते पर सहमति जताई है. सबसे हैरत की बात यह बताई गई कि इस समझौते में वे सख्त अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा प्रावधान शामिल नहीं हैं जिन्हें अब तक परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के लिए जरूरी माना जाता रहा है. इतना ही नहीं, रिपोर्ट के अनुसार यह मसौदा अभी तक कांग्रेस के सामने भी नहीं रखा गया है.
सऊदी मीडिया में इस खबर को ख़ासतौर पर विज़न 2030, ऊर्जा विविधीकरण और भविष्य की आर्थिक जरूरतों के संदर्भ में देखा जा रहा है. रियाद का तर्क है कि उसके पास विशाल यूरेनियम भंडार हैं और वह केवल ऊर्जा आत्मनिर्भरता चाहता है. सऊदी ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुलअज़ीज़ बिन सलमान अल सऊद पहले ही सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि "हम यूरेनियम को समृद्ध करेंगे, "सऊदी अरब का कहना है कि उसके पास यूरेनियम के बड़े भंडार हैं और अब वह केवल तेल पर निर्भर नहीं रहना चाहता. रियाद की योजना है कि अपने यूरेनियम का इस्तेमाल करके परमाणु ईंधन तैयार करे, उसे दुनिया को बेचे और भविष्य में अपने नागरिक परमाणु कार्यक्रम को भी आगे बढ़ाए."
दूसरी तरफ़, इजरायल के रणनीतिक हल्क़ों में तस्वीर इतनी आसान नजर नहीं आती. कई विश्लेषकों को डर है कि अगर किसी अरब देश को संवर्धन की छूट मिलती है, तो इससे पूरे मध्य-पूर्व में परमाणु हतियारों की दौड़ शुरु हो सकती है. आज सऊदी अरब, कल कोई और. फिर ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर रोक कैसे लगाएंगे ? और अगर ईरान आगे बढ़ेगा तो दूसरे देश भी अपनी सुरक्षा के नाम पर वही रास्ता चुनेंगे. यानी जिस आग को बुझाने का दावा किया जा रहा है, उसी में पेट्रोल भी डाला जा रहा है. यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है.
ईरान जब यूरेनियम संवर्धन करता है, तो कहा जाता है कि पूरी दुनिया खतरे में है. प्रतिबंध लगते हैं, धमकियां दी जाती हैं, सैन्य कार्रवाई की बातें होती हैं. लेकिन अगर वही संवर्धन अमेरिका के करीबी सहयोगी को मिले, तो अचानक भाषा बदल जाती है, उसे "सिविल न्यूक्लियर कोऑपरेशन", "रणनीतिक साझेदारी" और "ऊर्जा सुरक्षा" जैसे आकर्षक नाम दे दिए जाते हैं. क्या परमाणु तकनीक का स्वभाव देश देखकर बदल जाता है? अगर संवर्धन अपने आप में खतरनाक है, तो वह सबके लिए खतरनाक होना चाहिए और अगर शांतिपूर्ण इस्तेमाल के लिए मंज़ूर है, तो फिर यह अधिकार केवल चुनिंदा मित्र देशों तक क्यों रहे ?
अमेरिका अक्सर "रूल्स-बेस्ड इंटरनेशनल ऑर्डर" की बात करता है. लेकिन जब नियम दोस्त और दुश्मन देखकर बदलने लगें, तो फिर वह नियम नहीं, बल्कि राजनीतिक सुविधा (Political Convenience) बन जाते हैं. दिलचस्प बात ये भी है कि 2009 में संयुक्त अरब अमीरात के साथ हुए परमाणु समझौते को "गोल्ड स्टैंडर्ड" कहा गया था क्योंकि उसके मसौदे में यूरेनियम संवर्धन और पुनःप्रसंस्करण (Reprocessing) से साफ तौर पर परहेज किया गया था इसके अलावा अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय निगरानी स्वीकार की गई थी. अब अगर सऊदी अरब के लिए अलग मानक बनाया जाता है, तो यह ख़ुद अमेरिका की घोषित नीति से भटकना माना जाएगा.
कुछ अमेरिकी विशेषज्ञों का तर्क है कि अगर अमेरिका यह सहयोग नहीं देगा, तो चीन या रूस सऊदी अरब को और भी कम शर्तों पर तकनीक उपलब्ध करा सकते हैं. यह तर्क रणनीतिक नज़रिए से समझा जा सकता है. लेकिन तब अमेरिका को यह भी क़बूल करना चाहिए कि उसका फैसला पूरी तरह भू-राजनीतिक है, न कि केवल "नॉन-प्रोलिफरेशन" के नैतिक सिद्धांत पर आधारित. यानी असली बहस परमाणु तकनीक की नहीं, बल्कि शक्ति-संतुलन और प्रभाव-क्षेत्र की है. आज दुनिया एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है जहां अंतरराष्ट्रीय कानूनों की विश्वसनीयता पहले ही कई संघर्षों के कारण सवालों के घेरे में है. ऐसे समय यदि सबसे ताकतवर देश ही अलग-अलग देशों के लिए अलग-अलग नियम बनाएगा, तो भविष्य में किसी अन्य राष्ट्र को नैतिकता का पाठ पढ़ाना पहले से कहीं अधिक कठिन हो जाएगा.
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सबक शायद यही है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आदर्शों से अधिक महत्व हितों का होता है. लेकिन कम-से-कम ईमानदारी इतनी तो होनी चाहिए कि इसे सिद्धांत का नाम देकर पेश न किया जाए. आख़िर में ट्रम्प प्रशासन से सिर्फ़ एक हल्का-सा सवाल, जनाब! अगर यूरेनियम ईरान के हाथ में हो तो वह "दुनिया के लिए ख़तरा" और अगर वही तकनीक दोस्त के हाथ में हो तो "ऊर्जा का उज्ज्वल भविष्य" बन जाती है? लगता है वॉशिंगटन की लैब में यूरेनियम से पहले शब्दों का संवर्धन (Enrichment) होता है, जहां दोस्त के लिए वही चीज़ "शांति" और दुश्मन के लिए "ख़तरा" बन जाती है. यही है अमेरिकी नॉन-प्रोलिफरेशन की नई डिक्शनरी!
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