Iran America Conflict: इंटरनेशनल कोर्ट का आदेश न माने कोई देश तो क्या कार्रवाई हो सकती है, कितनी ताकतवर है यह अदालत
ईरान और अमेरिका के बीच शांति समझौते के बाद भी दोनों देश बाज नहीं आ रहे हैं और एक-दूसरे पर हमले कर रहे हैं. ऐसे में सवाल है कि अगर कोई देश अंतरराष्ट्रीय अदालत का नियम न मानें तो क्या हो सकता है.

- सुरक्षा परिषद सैन्य कार्रवाई कर सकती है, पर वीटो बाधा।
Iran America Conflict: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बाद एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय कानून चर्चा में बना हुआ है. दोनों देश फिलहाल सैन्य हमले रोकने के लिए सहमत हो चुके हैं. ईरान और अमेरिका के बीच कतर में तकनीकी स्तर की बातचीत भी होने वाली है, लेकिन इसी बीच ईरान के अंतरराष्ट्रीय अदालत जाने की चर्चा हो रही है. ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि अगर कोई देश इस सर्वोच्च अदालत के आदेश को मानने से इनकार कर दे तो, क्या होता है? क्या यह अदालत इतनी ताकतवर है कि दुनिया के दो देशों को झुका सके, या फिर इसके फैसले सिर्फ कागजी ही रह जाते हैं.
कितना ताकतवर है सुरक्षा परिषद
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के पास अपनी कोई पुलिस या सेना नहीं है, जो किसी देश में जबरन घुसकर अपने फैसले लागू करवा सके. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इसके फैसले बेअसर हैं. संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 94 के तहत अगर कोई देश इस अदालत के आदेश की अनदेखी करता है, तो पीड़ित देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का दरवाजा खटखटा सकता है. सुरक्षा परिषद के पास उस देश को सबक सिखाने और फैसला मनवाने के लिए कड़े कदम उठाने की पूरी कानूनी शक्ति होती है, जिससे मामला बेहद गंभीर हो जाता है.
तो क्या फैसला न मानने वाले देशों पर लग सकती है पाबंदी?
जब दो देशों के बीच का मामला सुरक्षा परिषद में पहुंचता है, तो दोषी देश के खिलाफ सख्त आर्थिक और राजनयिक पाबंदियों का दौर शुरू हो सकता है. सुरक्षा परिषद उस देश के वैश्विक व्यापार पर रोक लगा सकती है, उसकी अंतरराष्ट्रीय संपत्तियों और बैंक खातों को फ्रीज कर सकती है, और उसके नागरिकों की वैश्विक यात्राओं पर प्रतिबंध लगा सकती है. इस तरह की चौतरफा नाकेबंदी किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को घुटनों पर लाने के लिए काफी होती है. दुनिया से कट जाने के डर से भी कई देश इसके फैसले मानने पर राजी हो जाते हैं.
वैश्विक शांति के लिए सैन्य कार्रवाई
अगर कोई देश अदालत का फैसला मानने से इनकार कर देता है और उसकी इस जिद से दुनिया की शांति में को लेकर खतरा पैदा हो जाता है, तो फिर सुरक्षा परिषद आखिरी रास्ते के तौर पर बल प्रयोग की अनुमति दे सकती है. चार्टर के अनुच्छेद 42 के तहत, सुरक्षा परिषद एक बहुराष्ट्रीय सेना भेजकर फैसले को जबरन लागू करा सकती है. इसके अलावा वैश्विक मंच पर उस देश की जमकर बदनामी भी होती है और वह दुनिया में बिल्कुल अकेला हो जाता है.
वीटो पावर की कमजोरी
इस अदालत के नियम इतने सख्त होने के बाद भी इसकी एक बहुत बड़ी कमजोरी भी है, जिसे वीटो पावर कहा जाता है. सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस या फिर उनके करीबी मददगार देशों के खिलाफ कार्रवाई करना लगभग नामुमकिन हो जाता है. अगर अदालत इन देशों के खिलाफ कोई फैसला सुना भी देती है तो ये देश सुरक्षा परिषद में अपनी वीटो पावर का इस्तेमाल करके अपने खिलाफ होने वाली हर कार्रवाई या प्रस्ताव को तुरंत रोक सकते हैं. इसीलिए कई बार ताकतवर देश इस अदालत के फैसले नहीं मानते हैं.
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