Middle East Conflict: ईरान-अमेरिका की दुश्मनी में तीसरे विश्व युद्ध की तरफ बढ़ी दुनिया तो कौन होगा किस तरफ, कितने देश बदल सकते हैं पाला?
Middle East Conflict: ईरान और अमेरिका के बीच चल रही यह जंग रुकने का नाम नहीं ले रही है. आइए जानते हैं कि अगर यह युद्ध विश्व युद्ध में बदलता है तो कौन सा देश किसका साथ देगा.

- ईरान-अमेरिका संघर्ष से विश्व युद्ध की आशंका; पश्चिमी देश अमेरिका संग।
- ईरान को रूस, चीन, सीरिया जैसे देशों का समर्थन।
- भारत, ब्राजील समेत कई देश सैन्य तटस्थता अपनाएंगे।
- भारत को जटिल कूटनीतिक संतुलन साधना; तटस्थता रहेगी प्राथमिकता।
Middle East Conflict: ईरान और अमेरिका के बीच चल रही जंग, संघर्ष विराम के उल्लंघन और बढ़ते तनाव ने एक बड़े संघर्ष की संभावना पर फिर से वैश्विक बहस को छेड़ दिया है. अगर हालात बिगड़कर पूरी तरह से विश्व युद्ध में बदल जाते हैं तो ऐसा कहा जा रहा है कि दुनिया सिर्फ दो पक्षों के बीच के संघर्ष के बजाय कई सैन्य और कूटनीतिक गुटों में बंट सकती है. आइए जानते हैं कि कौन सा देश किसका पक्ष लेगा.
कौन देगा अमेरिका का साथ?
अगर कोई बड़ा संघर्ष छिड़ता है तो अमेरिका को अपने कई पुराने सहयोगियों का समर्थन मिलने की उम्मीद है. उम्मीद है कि नाटो सदस्य जैसे कि यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी और कई दूसरे यूरोपीय देश अलग-अलग स्तरों पर अमेरिका को सहायता दे सकते हैं.
मिडिल ईस्ट में ईरान से जुड़ी अपनी लंबे समय से चले आ रही सुरक्षा चिंता की वजह से इजरायल निश्चित रूप से अमेरिका का सबसे करीबी क्षेत्रीय सहयोगी बना रहेगा. अगर एशिया प्रशांत क्षेत्र की बात करें तो जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया जाते देश भी अमेरिका का समर्थन कर सकते हैं.
कौन होगा ईरान के खेमे में?
ऐसी उम्मीद की जा रही है कि ईरान के सबसे मजबूत अंतरराष्ट्रीय संबंध ही विरोधी गुट को तय करेंगे. हालांकि भागीदारी का सटीक स्तर परिस्थितियों पर ही निर्भर करेगा लेकिन ऐसा कहा जाता है कि रूस और चीन सीधे युद्ध के मैदान में उतरने के बजाय कूटनीतिक समर्थन, खुफिया सहयोग और साइबर सहायता दे सकते हैं.
अगर क्षेत्रीय स्तर की बात करें तो सीरिया और उत्तर कोरिया को अक्सर ऐसी सरकारों के रूप में देखा जाता है जिनके तेहरान के साथ काफी करीबी रणनीतिक संबंध है. ईरान के कई गैर-राज्य सशस्त्र समूहों के साथ भी संबंध हैं. इनमें हिजबुल्लाह, हूथी और अलग-अलग संगठन शामिल हैं.
कई देश होंगे तटस्थ
ऐसी उम्मीद की जा रही है कि कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएं सैन्य रूप से किसी भी पक्ष में शामिल होने से बचेंगी. भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और कई ASEAN सदस्य जैसे देश सैन्य भागीदारी के बजाय कूटनीति पर ही ध्यान लगाएंगे.
इसी तरह सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और पाकिस्तान किसी एक गुट के साथ पूरी तरह से जुड़ने के बजाय कई ताकतों के साथ अपने रिश्तों में संतुलन बनाने की कोशिश कर सकते हैं.
यह भी पढ़ेंः 400 स्क्वायर फीट की स्लेप डालने में कितनी मौरंग और बालू लगती है, कितना आता है टोटल खर्च?
मुश्किल रणनीतिक फैसले
कुछ देश ऐसे भी होंगे जिन पर भारी राजनयिक दबाव पड़ सकता है. खाड़ी देशों के अमेरिका के साथ करीबी सुरक्षा संबंध हैं. लेकिन दूसरी तरफ चीन के साथ भी उनके काफी अच्छे आर्थिक संबंध हैं. साथ ही उन्हें ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर ईरान की जवाबी कार्रवाई के जोखिम पर भी विचार करना होगा.
भारत की स्थिति पर बारीकी से नजर
भारत को सबसे नाजुक राजनयिक संतुलन बनाने की चुनौती का सामना करना पड़ेगा. भारत के अमेरिका और इजरायल के साथ मजबूत रणनीतिक संबंध हैं. इसी के साथ ईरान के साथ भी भारत काफी जरूरी संबंध बनाए हुए हैं. यह संबंध चाबहार बंदरगाह परियोजना के जरिए और रूस के साथ लंबे समय से रक्षा सहयोग से जुड़ा हुआ है.
इन सभी कारणों की वजह से भारत से उम्मीद की जाएगी कि वह तटस्थता को प्राथमिकता दे. साथ ही खाड़ी देशों में रहने वाले अपने लाखों नागरिकों की सुरक्षा करे, कच्चे तेल की आपूर्ति की रक्षा करे और क्षेत्रीय संघर्ष को रोकने के उद्देश्य से राजनयिक प्रयासों का समर्थन करे.
यह भी पढ़ेंः 41 डिग्री में 51 जैसी क्यों महसूस हो रही गर्मी, जानें इस मौसम में चिपचिप के पीछे का साइंस?

























