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क्या होती है जीरो एफआईआर, नॉर्मल एफआईआर से क्यों है अलग- जानिए ZERO FIR का कॉन्सेप्ट

एफआईआर यानी First Information Report वह पहली लिखित रिपोर्ट है जो पुलिस अपराध की सूचना पर दर्ज करती है. यह केवल उसी थाने में दर्ज की जाती है जिसके क्षेत्र में अपराध हुआ हो.

भारतीय कानून व्यवस्था में एफआईआर दर्ज कराना सबसे अहम प्रक्रिया मानी जाती है. किसी भी अपराध की जांच तभी शुरू होती है जब पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज हो जाती है. लेकिन अक्सर पीड़ितों को यह दिक्कत आती थी कि थाने वाले यह कहकर मामला दर्ज करने से मना कर देते थे कि यह केस उनके क्षेत्राधिकार का नहीं है. ऐसे में पीड़ित इधर-उधर भटकते रहते थे और कई बार देर होने से सबूत भी मिट जाते थे. इसी समस्या का समाधान करने के लिए जीरो एफआईआर का कॉन्सेप्ट लाया गया. यह नियम खासतौर पर निर्भया कांड के बाद बनाए गए संशोधनों का हिस्सा है ताकि पीड़ित को तुरंत राहत मिल सके और अपराधी को सजा से बचने का मौका न मिले.

क्या होती है एफआईआर?

एफआईआर यानी First Information Report वह पहली लिखित रिपोर्ट है जो पुलिस अपराध की सूचना पर दर्ज करती है. यह केवल उसी थाने में दर्ज की जाती है जिसके क्षेत्र में अपराध हुआ हो. उदाहरण के लिए अगर कोई चोरी, लूट, हत्या या रेप की घटना किसी इलाके में हुई है तो एफआईआर उसी थाने में दर्ज होगी. इसके बाद उस थाने की पुलिस जांच और कार्रवाई शुरू करती है. एफआईआर दर्ज करना पुलिस के लिए कानूनी रूप से अनिवार्य है.

जीरो एफआईआर क्या है?

जीरो एफआईआर का मतलब है कि अपराध कहीं भी हुआ हो, पीड़ित किसी भी नजदीकी थाने में जाकर शिकायत दर्ज करा सकता है. इसमें एफआईआर का नंबर "0" (Zero) से शुरू होता है, इसलिए इसे जीरो एफआईआर कहा जाता है. बाद में यह केस संबंधित क्षेत्र के थाने को ट्रांसफर कर दिया जाता है. इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि शिकायत दर्ज करने में देरी नहीं होती और तुरंत जांच शुरू हो जाती है.

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जीरो एफआईआर का कॉन्सेप्ट क्यों आया?

निर्भया गैंगरेप केस (2012) के बाद जब पूरे देश में आक्रोश फैला तो यह देखा गया कि कई बार पीड़िताओं को थाने में शिकायत दर्ज कराने में बहुत दिक्कत आती है. पुलिस अधिकारी यह कहकर मामले को टाल देते थे कि यह उनके क्षेत्र का मामला नहीं है. इसी वजह से 2013 में बने क्रिमिनल लॉ (अमेंडमेंट) एक्ट में जीरो एफआईआर का प्रावधान जोड़ा गया. गृह मंत्रालय और सुप्रीम कोर्ट ने भी इस व्यवस्था को अनिवार्य किया ताकि पीड़ित को तुरंत न्याय की प्रक्रिया मिल सके.

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शेख इंजमाम उल हक

हजरत शेख इंजमाम को पत्रकारिता में 2 साल से ज्यादा का अनुभव है. भारत की शाही संस्कृति और गौरवशाली इतिहास के गवाह राजस्थान से उनका संबंध है. भारत की शिक्षा नगरी के तौर पर मशहूर कोटा उनकी कर्मभूमि है, जहां हर साल हजारों युवक बड़े-बड़े सपने लेकर, आईआईटी–जेईई और नीट की तैयारी के लिए इस शहर को अपना बसेरा बनाते हैं, लेकिन इंजमाम को इस शहर का ये माहौल रास नहीं आया और उन्होंने डॉक्टर, इंजीनियर बनने के बजाए पत्रकार बनने का फैसला किया. हालांकि, कोटा से 72 किमी दूर एक छोटे से गांव सीसवाली में जन्म लेने वाले इंजमाम ने इंटरमीडियट तक की पढ़ाई इसी शहर से की.

बचपन से हिंदी में रुचि और लगाव उन्हें पत्रकारिता के लिए दिल्ली खींच लाया. जहां उन्होंने पत्रकारिता में स्नातक की डिग्री ली. उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया से हिंदी साहित्य में MA और एम.फिल. की डिग्री भी हासिल की.

इंडिया न्यूज़ और विकिपीडिया के लिए कार्य करने के बाद इंजमाम एबीपी लाइव से बतौर ट्रेनी जुड़े और अब प्रमोट होकर बतौर कॉपी एडिटर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं.

शेख इंजमाम का हिंदी और उर्दू से खासा लगाव है और दोनों भाषाओं में शौकिया शायरी भी करते हैं. उन्होंने कई कविताएं रची हैं और अनेक साहित्यिक लेखों का सृजन किया है. साहित्य की एक अन्य विधा व्यंग्य भी उनका पसंदीदा विषय है.

ट्रेंडिंग और राजनीति उनकी पसंदीदा बीट है. राजनीतिक खबरों पर पैनी नजर की वजह से वो रोजाना के ट्रेंड और सोशल मीडिया पर पनपने वाले विचारों की बखूबी समझ रखते हैं.

शेख इंजमाम को घूमना पसंद है और उन्होंने भारत के कई शहरों और देहात का सफर किया है और वहां के रीति रिवाज, रहन सहन और सामाजिक ताने बाने को खूब समझते हैं.

इंजमाम को फिल्में देखने और गाने सुनने का भी शौक है. अमरीश पुरी और सलमान खान को वह अपने पसंदीदा अभिनेताओं में शुमार करते हैं. सूफी और क्लासिकल म्यूजिक भी उन्हें रुहानी सुकून देता है. उन्हें फिल्मी अभिनेताओं, कलाकारों और नेताओं के इंटरव्यू देखने का भी शौक है.

भाषा पर मजबूत पकड़ और लेखन की विभिन्न शैली में गहरी समझ रखने की वजह से वो खूबसूरत अंदाज़ में बड़ी आसानी से खबरों को पेश करने में सफल रहते हैं.

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