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जब घड़ियां नहीं थीं, तब वक्त कैसे देखते थे लोग? पढ़ें पहर बनने की कहानी

घड़ियों से पहले भी इंसान समय का गुलाम नहीं, बल्कि समय का ज्ञानी था. पहर, सूरज, चांद और प्रकृति ने मिलकर वक्त को समझने की कहानी लिखी. आइए जानें कि जब घड़ियां नहीं थीं, तब वक्त कैसे देखा जाता था.

घड़ियों से पहले भी इंसान समय का गुलाम नहीं, बल्कि समय का ज्ञानी था. पहर, सूरज, चांद और प्रकृति ने मिलकर वक्त को समझने की कहानी लिखी. आइए जानें कि जब घड़ियां नहीं थीं, तब वक्त कैसे देखा जाता था.

आज हम मोबाइल और घड़ियों पर एक नजर डालते ही समय जान लेते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब घड़ियां नहीं थीं, तब इंसान वक्त कैसे पहचानता था? बिना मिनट, बिना सेकंड, बिना अलार्म के फिर भी दिनचर्या बिल्कुल तय होती थी. खेतों में काम, पूजा-पाठ, यात्रा और राजकाज सब समय पर होता था. आखिर वह कौन-सी समझ थी, कौन-सा तरीका था, जिसने इंसान को समय का एहसास कराया? आइए समझते हैं.

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घड़ी का आविष्कार भले ही 15वीं शताब्दी के आसपास हुआ हो, लेकिन इंसान उससे बहुत पहले समय को पहचानना सीख चुका था. दिन-रात का फर्क, सूरज का उगना-डूबना और मौसम का बदलना, यही इंसान की पहली समय-सारिणी थी. धीरे-धीरे इंसान ने समझ लिया कि सूरज और चांद की चाल से वक्त का अंदाजा लगाया जा सकता है.
घड़ी का आविष्कार भले ही 15वीं शताब्दी के आसपास हुआ हो, लेकिन इंसान उससे बहुत पहले समय को पहचानना सीख चुका था. दिन-रात का फर्क, सूरज का उगना-डूबना और मौसम का बदलना, यही इंसान की पहली समय-सारिणी थी. धीरे-धीरे इंसान ने समझ लिया कि सूरज और चांद की चाल से वक्त का अंदाजा लगाया जा सकता है.
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प्राचीन भारत में सूरज की छाया से समय मापने की परंपरा थी. जमीन पर गड़े एक खंभे या डंडे की छाया देखकर यह तय किया जाता था कि दिन का कौन-सा हिस्सा चल रहा है. इसी आधार पर दिन को अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया, जिन्हें पहर कहा गया. एक दिन और रात मिलाकर आठ पहर माने जाते थे, यानी हर पहर लगभग तीन घंटे का होता था.
प्राचीन भारत में सूरज की छाया से समय मापने की परंपरा थी. जमीन पर गड़े एक खंभे या डंडे की छाया देखकर यह तय किया जाता था कि दिन का कौन-सा हिस्सा चल रहा है. इसी आधार पर दिन को अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया, जिन्हें पहर कहा गया. एक दिन और रात मिलाकर आठ पहर माने जाते थे, यानी हर पहर लगभग तीन घंटे का होता था.
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जब सूरज नहीं होता था, तब चांद और तारों की मदद ली जाती थी. चांद की स्थिति, उसका आकार और तारों का उगना-डूबना देखकर रात का समय पहचाना जाता था. अनुभवी लोग आकाश देखकर बिना किसी उपकरण के बता देते थे कि रात का कौन-सा पहर चल रहा है.
जब सूरज नहीं होता था, तब चांद और तारों की मदद ली जाती थी. चांद की स्थिति, उसका आकार और तारों का उगना-डूबना देखकर रात का समय पहचाना जाता था. अनुभवी लोग आकाश देखकर बिना किसी उपकरण के बता देते थे कि रात का कौन-सा पहर चल रहा है.
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सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी समय मापने के अलग तरीके थे. करीब दो हजार साल पहले प्राचीन यूनान में पानी से चलने वाली घड़ियों का इस्तेमाल होता था. इन घड़ियों में एक पात्र से पानी धीरे-धीरे निकलता था. तय स्तर तक पानी गिरते ही आवाज या घंटी बजती थी, जिससे समय का पता चल जाता था.
सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी समय मापने के अलग तरीके थे. करीब दो हजार साल पहले प्राचीन यूनान में पानी से चलने वाली घड़ियों का इस्तेमाल होता था. इन घड़ियों में एक पात्र से पानी धीरे-धीरे निकलता था. तय स्तर तक पानी गिरते ही आवाज या घंटी बजती थी, जिससे समय का पता चल जाता था.
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पहर की अवधारणा इंसान की रोजमर्रा की जरूरत से पैदा हुई. जब घड़ियां नहीं थीं, तब भी लोगों को यह जानना जरूरी था कि काम कब शुरू करना है, पूजा कब करनी है और यात्रा के लिए सही समय कौन-सा है. इसी जरूरत ने पहर को जन्म दिया.
पहर की अवधारणा इंसान की रोजमर्रा की जरूरत से पैदा हुई. जब घड़ियां नहीं थीं, तब भी लोगों को यह जानना जरूरी था कि काम कब शुरू करना है, पूजा कब करनी है और यात्रा के लिए सही समय कौन-सा है. इसी जरूरत ने पहर को जन्म दिया.
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सबसे पहले इंसान ने सूरज की चाल को समझा. उसने देखा कि सूरज उगने से डूबने तक एक तय रास्ता तय करता है और उसकी रोशनी व छाया लगातार बदलती रहती है. इसी बदलाव के आधार पर दिन को बराबर हिस्सों में बांटने का विचार आया. दिन और रात दोनों को मिलाकर कुल आठ हिस्से किए गए, जिन्हें पहर कहा गया. यानी चार पहर दिन के और चार पहर रात के.
सबसे पहले इंसान ने सूरज की चाल को समझा. उसने देखा कि सूरज उगने से डूबने तक एक तय रास्ता तय करता है और उसकी रोशनी व छाया लगातार बदलती रहती है. इसी बदलाव के आधार पर दिन को बराबर हिस्सों में बांटने का विचार आया. दिन और रात दोनों को मिलाकर कुल आठ हिस्से किए गए, जिन्हें पहर कहा गया. यानी चार पहर दिन के और चार पहर रात के.
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एक पहर करीब तीन घंटे का माना गया. सुबह सूरज निकलने के बाद पहला पहर, फिर दूसरा, तीसरा और चौथा पहर आता था. सूरज ढलने के बाद रात के चार पहर माने जाते थे. यह व्यवस्था इतनी सरल थी कि बिना किसी यंत्र के भी समय का अंदाजा लगाया जा सकता था.
एक पहर करीब तीन घंटे का माना गया. सुबह सूरज निकलने के बाद पहला पहर, फिर दूसरा, तीसरा और चौथा पहर आता था. सूरज ढलने के बाद रात के चार पहर माने जाते थे. यह व्यवस्था इतनी सरल थी कि बिना किसी यंत्र के भी समय का अंदाजा लगाया जा सकता था.

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