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खुद को क्यों नहीं आती अपने ही परफ्यूम की खुशबू? जानें इसका विज्ञान

आपने ध्यान दिया होगा कि जब भी आप कोई अच्छा परफ्यूम यूज करते हैं तो कुछ देर के बाद हमें इसकी खुशबू आनी बंद हो जाती है, लेकिन दूसरों को वही खुशबू आती है. चलिए जानें कि इसका विज्ञान क्या है.

आपने ध्यान दिया होगा कि जब भी आप कोई अच्छा परफ्यूम यूज करते हैं तो कुछ देर के बाद हमें इसकी खुशबू आनी बंद हो जाती है, लेकिन दूसरों को वही खुशबू आती है. चलिए जानें कि इसका विज्ञान क्या है.

महंगा और बेहतरीन परफ्यूम लगाने के थोड़ी ही देर बाद हमें उसकी खुशबू खुद आना बंद हो जाती है. अधिकांश लोग सोचते हैं कि परफ्यूम हवा में उड़ गया, लेकिन विज्ञान की नजर में सच्चाई पूरी तरह अलग है. असल में यह खुशबू का खत्म होना नहीं, बल्कि हमारी नाक और दिमाग का एक खास सुरक्षात्मक तंत्र है, जिसे साइंस में ऑलफैक्ट्री एडॉप्टेशन या नोस ब्लाइंडनेस कहा जाता है. दिमाग लगातार मिलने वाले गंध के संकेतों को नजरअंदाज करना शुरू कर देता है ताकि वह परिवेश में होने वाले नए और संभावित खतरों पर अपना ध्यान केंद्रित रख सके.

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जब भी हम किसी परफ्यूम या गंध के संपर्क में आते हैं, तो नाक में मौजूद गंध संवेदी रिसेप्टर्स तुरंत उस खुशबू को पहचानकर मस्तिष्क तक बिजली के सिग्नल भेजते हैं. दिमाग शुरुआत में उस खुशबू को पहचानता है और उससे जुड़ी भावनाएं या जुड़ाव पैदा करता है.
जब भी हम किसी परफ्यूम या गंध के संपर्क में आते हैं, तो नाक में मौजूद गंध संवेदी रिसेप्टर्स तुरंत उस खुशबू को पहचानकर मस्तिष्क तक बिजली के सिग्नल भेजते हैं. दिमाग शुरुआत में उस खुशबू को पहचानता है और उससे जुड़ी भावनाएं या जुड़ाव पैदा करता है.
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हालांकि, जब वही खुशबू बिना रुके लगातार नाक के जरिए दिमाग तक पहुंचती रहती है, तो दिमाग का न्यूरोलॉजिकल रिस्पॉन्स धीरे-धीरे सुस्त पड़ जाता है. इस वजह से हमें अपने ही शरीर पर लगी खुशबू महसूस होना बंद हो जाती है.
हालांकि, जब वही खुशबू बिना रुके लगातार नाक के जरिए दिमाग तक पहुंचती रहती है, तो दिमाग का न्यूरोलॉजिकल रिस्पॉन्स धीरे-धीरे सुस्त पड़ जाता है. इस वजह से हमें अपने ही शरीर पर लगी खुशबू महसूस होना बंद हो जाती है.
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यह ऑलफैक्ट्री एडॉप्टेशन केवल इंसानों तक सीमित नहीं है, बल्कि इंसानों के साथ-साथ कई जानवरों में भी प्राकृतिक रूप से पाया जाता है. कीड़े-मकोड़ों से लेकर चूहों तक में लंबे समय से मौजूद गंध के प्रति संवेदनशीलता कम होने का गुण देखा गया है.
यह ऑलफैक्ट्री एडॉप्टेशन केवल इंसानों तक सीमित नहीं है, बल्कि इंसानों के साथ-साथ कई जानवरों में भी प्राकृतिक रूप से पाया जाता है. कीड़े-मकोड़ों से लेकर चूहों तक में लंबे समय से मौजूद गंध के प्रति संवेदनशीलता कम होने का गुण देखा गया है.
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जानवरों में यह क्षमता इसलिए विकसित हुई है ताकि वे हर समय अपने ही शरीर या आसपास की पुरानी गंध पर प्रतिक्रिया देने में ऊर्जा बर्बाद न करें. इससे उन्हें जंगल में किसी नई, अनजान या शिकारी जानवर की गंध को तुरंत पहचानने में मदद मिलती है.
जानवरों में यह क्षमता इसलिए विकसित हुई है ताकि वे हर समय अपने ही शरीर या आसपास की पुरानी गंध पर प्रतिक्रिया देने में ऊर्जा बर्बाद न करें. इससे उन्हें जंगल में किसी नई, अनजान या शिकारी जानवर की गंध को तुरंत पहचानने में मदद मिलती है.
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गंध की याददाश्त और नोस ब्लाइंडनेस पर वर्षों तक गहराई से शोध किया गया है. एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रयोग में लोगों को तीन हफ्तों के लिए पाइन (देवदार) की खुशबू वाला एयर फ्रेशनर इस्तेमाल करने को दिया गया.
गंध की याददाश्त और नोस ब्लाइंडनेस पर वर्षों तक गहराई से शोध किया गया है. एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रयोग में लोगों को तीन हफ्तों के लिए पाइन (देवदार) की खुशबू वाला एयर फ्रेशनर इस्तेमाल करने को दिया गया.
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कुछ ही दिनों के बाद कई प्रतिभागियों ने शोधकर्ताओं से पूछा कि क्या वह एयर फ्रेशनर खत्म हो गया है या काम कर रहा है, जबकि कमरे में उसकी खुशबू पूरी तीव्रता से मौजूद थी. इस प्रयोग ने साबित किया कि दिमाग बहुत जल्दी किसी भी स्थाई गंध का आदी हो जाता है.
कुछ ही दिनों के बाद कई प्रतिभागियों ने शोधकर्ताओं से पूछा कि क्या वह एयर फ्रेशनर खत्म हो गया है या काम कर रहा है, जबकि कमरे में उसकी खुशबू पूरी तीव्रता से मौजूद थी. इस प्रयोग ने साबित किया कि दिमाग बहुत जल्दी किसी भी स्थाई गंध का आदी हो जाता है.
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मानव विकास में इस क्षमता ने इंसानों को जीवित रखने और खतरों को समय रहते पहचानने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है. उदाहरण के लिए, जब हमारे सामने कोई सड़ी-गली चीज या गैस लीक जैसी तेज गंध आती है, तो हमारी नाक तुरंत उसका सिग्नल दिमाग को देती है और हम सतर्क हो जाते हैं.
मानव विकास में इस क्षमता ने इंसानों को जीवित रखने और खतरों को समय रहते पहचानने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है. उदाहरण के लिए, जब हमारे सामने कोई सड़ी-गली चीज या गैस लीक जैसी तेज गंध आती है, तो हमारी नाक तुरंत उसका सिग्नल दिमाग को देती है और हम सतर्क हो जाते हैं.
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वहीं दूसरी तरफ, लगातार मौजूद रहने वाली सामान्य या जानी-पहचानी खुशबू को दिमाग फालतू डेटा मानकर फिल्टर कर देता है, ताकि हमारा ध्यान पर्यावरण में मिलने वाले नए और ज्यादा जरूरी संकेतों पर बना रहे.
वहीं दूसरी तरफ, लगातार मौजूद रहने वाली सामान्य या जानी-पहचानी खुशबू को दिमाग फालतू डेटा मानकर फिल्टर कर देता है, ताकि हमारा ध्यान पर्यावरण में मिलने वाले नए और ज्यादा जरूरी संकेतों पर बना रहे.

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