हर साल मिड-डे मील पर कितना पैसा होता है खर्च? पाकिस्तान से कितना ज्यादा
Mid-Day Meal Scheme: भारत में मिड डे मील का प्रोग्राम स्कूलों में छात्रों के पोषण के लिए एक अर्से से चला आ रहा है. आइए जानते हैं कि क्या भारत की तरह पाकिस्तान में भी कुछ ऐसी व्यवस्था है.

Mid-Day Meal Scheme: भारत का स्कूल मील प्रोग्राम दुनिया के सबसे बड़े न्यूट्रिशन और एजुकेशन सपोर्ट प्रोग्राम में से एक बन गया है. यह सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में लाखों बच्चों को खाना देता है. अब प्रधानमंत्री पोषण के नाम से जानी जाने वाली इस स्कीम को केंद्र और राज्यों से हर साल हजारों करोड़ रुपये दिए जाते हैं. यह पैमाना तब और भी ज्यादा बड़ा लगता है जब भारत के खर्च की तुलना पाकिस्तान से की जाती है.
केंद्र ने प्रधानमंत्री पोषण के लिए कितने रुपये दिए
2026-27 फाइनेंशियल ईयर के लिए केंद्र ने प्रधानमंत्री पोषण के लिए लगभग ₹12,750 करोड़ आवंटित किए हैं. राज्य भी अपना हिस्सा देते हैं. इसके बाद इस प्रोग्राम पर भारत का अनुमानित कुल सालाना खर्च लगभग ₹21,000 करोड़ हो जाता है.
यह स्कीम योग्य सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को कवर करती है. साथ ही इसका मकसद क्लासरूम में न्यूट्रिशन और स्कूल में अटेंडेंस, दोनों को बेहतर बनाना है. जरूरतों और लाभार्थियों की संख्या के आधार पर राज्यों को अनाज भी आवंटित किया जाता है.

पांच राज्यों की बड़ी हिस्सेदारी
भारत के बड़े राज्यों में उत्तर प्रदेश और बिहार में लाभार्थियों की संख्या और अनाज की जरूर सबसे ज्यादा है. उत्तर प्रदेश सालाना लगभग ₹4000 से ₹4500 करोड़ खर्च करता है. साथ ही लगभग 1.15 करोड़ बच्चों को खाना देता है. बिहार का खर्च ₹3500 से ₹3800 करोड़ के करीब है. इसमें लगभग 1.15 करोड़ बच्चे शामिल हैं.
महाराष्ट्र लगभग ₹2,200 से ₹2,500 करोड़ खर्च करता है. इसी के साथ पश्चिम बंगाल लगभग ₹2000 से ₹2200 करोड़ खर्च करता है. राजस्थान का सालाना खर्च ₹1500 से ₹1800 करोड़ होने का अनुमान है.
उत्तर प्रदेश का बड़े पैमाने पर मील प्रोग्राम
उत्तर प्रदेश में देश के सबसे बड़े स्कूल मील ऑपरेशन में से एक है. 2025-26 के लिए राज्य को लगभग 2.97 लाख मीट्रिक टन अनाज दिया गया. केंद्र राज्य में प्रोग्राम की फंडिंग का 60% हिस्सा देता है. इसी के साथ उत्तर प्रदेश बाकी 40 प्रतिशत हिस्सा देता है. सीतापुर, लखीमपुर खीरी और बहराइच जैसे जिलों में अनाज की खपत काफी ज्यादा है. ऐसा इसलिए क्योंकि यहां स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या काफी ज्यादा है. राज्य ने खाने में पोषण वाली कुछ और चीजें भी शामिल की हैं. हर हफ्ते एक तय दिन बच्चों को दूध और फल दिए जाते हैं.
राजस्थान में खाने के साथ दूध भी
राजस्थान का खर्च उत्तर प्रदेश और बिहार के मुकाबले कम है. ऐसा इसलिए क्योंकि यहां आबादी का घनत्व काफी कम है. राज्य हर साल लगभग 1500 से 1800 करोड़ खर्च करता है. साथ ही उसे 2025-26 के लिए लगभग 1.33 लाख मीट्रिक टन अनाज मिला.
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पाकिस्तान में ऐसी कोई राष्ट्रीय योजना नहीं
पाकिस्तान के साथ तुलना काफी अलग है. ऐसे इसलिए क्योंकि उसे देश में भारत की प्रधानमंत्री पोषण योजना जैसी कोई भी राष्ट्रीय स्कूल मील योजना नहीं है. रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान के 2026-27 के फेडरल बजट में देशभर में स्कूल से जुड़े प्रोजेक्ट और विकास कार्यों के लिए लगभग 36.3 अरब पाकिस्तानी करेंसी का आवंटन किया गया था. हालांकि यह स्कूलों में खाना खिलाने के लिए कोई खास राष्ट्रीय बजट नहीं है इस वजह से इसकी सीधे तौर पर भारत के प्रधानमंत्री पोषण आवंटन से तुलना नहीं की जा सकती.
पाकिस्तान के कुछ प्रांतों ने चुनिंदा इलाकों में छोटे कार्यक्रम शुरू किए. उदाहरण के लिए बलूचिस्तान में स्कूल मील का एक कार्यक्रम चल रहा है. इसका बजट लगभग 1.58 अरब पाकिस्तानी करेंसी है.

पाकिस्तान के कार्यक्रम भी बाहरी मदद पर निर्भर हैं
पाकिस्तान में स्कूल के पोषण से जुड़ी कुछ योजनाओं को काफी ज्यादा विदेशी मदद मिली है. सिंध में अमेरिकी कृषि विभाग से लगभग 80 मिलियन डॉलर की मदद से एक कार्यक्रम शुरू किया गया. इससे लगभग 2 लाख बच्चों को फायदा हुआ. ऐसे प्रोजेक्ट से यह पता चलता है कि पाकिस्तान में स्कूलों में खाना खिलाने की योजनाएं मौजूद हैं. लेकिन वे भौगोलिक रूप से सीमित है या फिर बाहरी फंड पर ही निर्भर हैं. वहां कोई भी भारत की तरह प्रधानमंत्री पोषण योजना किसी एक राष्ट्रीय कार्यक्रम के तौर पर नहीं चल रही है.
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