Opinion: कौशल विकास, स्वास्थ्य शिविर और माइक्रोलोन... भारत के दिव्यांग दंपतियों की बदलती ज़िंदगी

किसी व्यक्ति की जिंदगी बदलने के लिए हमेशा बड़ी मदद की जरूरत नहीं होती. कई बार सही समय पर मिला इलाज, कोई हुनर सीखने का मौका या छोटा-सा कर्ज भी पूरे परिवार की दिशा बदल सकता है. दिव्यांग दंपतियों के मामले में यह बात और भी महत्वपूर्ण हो जाती है. भारत में ऐसे बहुत से परिवार हैं, जहां पति या पत्नी में से कोई एक, या दोनों दिव्यांग हैं. इनके सामने स्वास्थ्य, रोजगार, कमाई और समाज में सम्मान और बराबरी से जुड़ी कई चुनौतियां होती हैं.
गांवों में यह मुश्किल और बढ़ जाती है, क्योंकि अस्पताल, प्रशिक्षण केंद्र, रोजगार और बैंकिंग सुविधाएं अक्सर दूर होती हैं. लेकिन दिव्यांगता का मतलब किसी व्यक्ति की क्षमता का खत्म हो जाना नहीं है. जरूरत इस बात की है कि उसे अपनी क्षमता दिखाने का अवसर मिले. स्वास्थ्य सुविधा, कौशल प्रशिक्षण और आसान आर्थिक मदद ऐसे तीन रास्ते हैं, जो दिव्यांग दंपतियों को दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय आत्मनिर्भर बनने की दिशा में ले जा सकते हैं.
स्वास्थ्य सहायता जो आत्मनिर्भरता बढ़ाती है
दिव्यांग लोगों के लिए समय पर इलाज और नियमित स्वास्थ्य जांच केवल बीमारी से बचने का जरिया नहीं है. इसका सीधा संबंध उनकी रोजमर्रा की जिंदगी, काम करने की क्षमता और परिवार की आर्थिक स्थिति से भी है. ग्लोबल हेल्थ सिस्टम पर 2026 की मैकिन्से रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि निवारक और लक्षित हस्तक्षेप, जैसे नियमित स्वास्थ्य शिविर और पुनर्वास सेवाएं, लोगों के जीवन में स्वस्थ वर्ष जोड़ सकते हैं. साथ ही, ये सेवाएं व्यक्तियों को काम करने, सामाजिक रूप से जुड़े रहने और अपने परिवारों को बेहतर ढंग से संभालने में सक्षम बनाकर आर्थिक भागीदारी को भी बढ़ा सकती हैं.
दिव्यांग दंपतियों के लिए नियमित स्वास्थ्य सहायता गतिशीलता (Mobility) से जुड़ी बाधाओं को कम करती है, निर्भरता घटाती है और आत्मविश्वास बढ़ाती है. ये सभी कारक आय पैदा करने वाली गतिविधियों और सामुदायिक जीवन में उनकी भागीदारी को मजबूत करते हैं. दिव्यांग लोगों को कई बार अकेलेपन, भेदभाव और सामाजिक दबाव का भी सामना करना पड़ता है. इसलिए मानसिक स्वास्थ्य के लिए सलाह, परिवार का सहयोग और समुदाय में जागरूकता भी जरूरी है. एक स्वस्थ और आत्मविश्वासी व्यक्ति अपने परिवार की जिम्मेदारियां बेहतर तरीके से निभा सकता है. इसलिए स्वास्थ्य सुविधा को केवल खर्च के रूप में नहीं, बल्कि व्यक्ति और परिवार को आत्मनिर्भर बनाने वाले निवेश के रूप में देखने की जरूरत है.
कौशल जो आय के मार्ग बनाते है
किसी परिवार को लंबे समय तक सहायता देने से ज्यादा जरूरी है कि उसे कमाने का रास्ता दिया जाए. इसके लिए कौशल प्रशिक्षण सबसे बड़ा साधन बन सकता है. दिव्यांग दंपतियों को उनकी क्षमता और स्थानीय जरूरत के हिसाब से सिलाई, कंप्यूटर, मोबाइल से जुड़े काम, हस्तशिल्प, छोटे कारोबार, पैकिंग, खाद्य सामग्री तैयार करने या दूसरे रोजगारों का प्रशिक्षण दिया जा सकता है. खासकर गांवों में प्रशिक्षण ऐसा होना चाहिए जिसे सीखने के बाद व्यक्ति अपने आसपास ही काम शुरू कर सके. हर व्यक्ति को रोजगार के लिए शहर जाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए.
आज तकनीक ने काम के कई नए रास्ते भी खोले हैं. दृष्टिबाधित व्यक्ति स्क्रीन पर लिखी जानकारी सुनकर कंप्यूटर या मोबाइल का इस्तेमाल कर सकते हैं. इसी तरह सुनने में परेशानी वाले लोगों के लिए सांकेतिक भाषा के माध्यम से प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जा सकता है. अगर प्रशिक्षण के साथ बाजार से जोड़ने की व्यवस्था भी हो, तो इसका फायदा और बढ़ सकता है. केवल सिलाई सिखाना पर्याप्त नहीं है. यह भी बताना होगा कि कपड़े कहां से खरीदें, ग्राहक कैसे बनाएं और तैयार सामान बाजार तक कैसे पहुंचाएं. यानी कौशल प्रशिक्षण का लक्ष्य सिर्फ प्रमाणपत्र देना नहीं, बल्कि कमाई का रास्ता तैयार करना होना चाहिए.
माइक्रोलोन से बड़ा बदलाव संभव
दिव्यांग दंपतियों के सामने कारोबार शुरू करने के लिए पूंजी जुटाना बड़ी चुनौती होती है. आसान शर्तों पर मिलने वाला छोटा कर्ज (माइक्रोलोन) उन्हें सिलाई, छोटी दुकान, नाश्ते, हस्तशिल्प या मरम्मत जैसे काम शुरू करने में मदद कर सकता है. हालांकि, सिर्फ कर्ज देना पर्याप्त नहीं है. कारोबार चलाने की जानकारी, बाजार से संपर्क और समय-समय पर मार्गदर्शन भी जरूरी है. गांवों में सरकारी योजनाओं, कौशल प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता की जानकारी भी हर जरूरतमंद तक नहीं पहुंच पाती. पंचायत स्तर पर इन सुविधाओं की जानकारी और पंजीकरण की व्यवस्था हो, तो दिव्यांग परिवारों के लिए रोजगार और आत्मनिर्भरता का रास्ता आसान हो सकता है.
आय से परे: गरिमा और भागीदारी
स्वास्थ्य सेवा, कौशल विकास और समावेशी वित्त तक पहुंच दिव्यांग समुदाय के लिए केवल आर्थिक या भौतिक कल्याण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गरिमा, आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और सामाजिक भागीदारी को भी मजबूत करती है. सही सहयोग मिलने पर दिव्यांग जोड़े घरेलू निर्णयों में अधिक स्वायत्तता, दैनिक जीवन में स्वतंत्रता और अपने समुदायों में प्रभावी आवाज हासिल कर सकते हैं.
भारत का दिव्यांग समुदाय अपार अप्रयुक्त मानवीय और आर्थिक क्षमता रखता है. जब नीति, परोपकार और निजी पहल मिलकर सुलभ एवं समावेशी प्रणालियां तैयार करते हैं, तो इसका लाभ केवल व्यक्तियों और परिवारों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यापक सामाजिक और आर्थिक समृद्धि में भी योगदान देता है. देश भर में दिव्यांग जोड़े यह साबित कर रहे हैं कि विकलांगता भाग्य को परिभाषित नहीं करती- अवसर करता है: कमाने, योगदान देने और सम्मान के साथ जीवन जीने का अवसर.
[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]


















