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रेल की पटरियों पर दाएं जाना है या बाएं, रास्ता कैसे पहचानता है ड्राइवर? जान लें जवाब
ट्रेन में स्टीयरिंग न होने के बावजूद ड्राइवर होम सिग्नल, रेलवे कंट्रोल रूम के शेड्यूल और ऑटोमैटिक ट्रैक स्विच की मदद से दाएं या बाएं मुड़ने का सही रास्ता पहचानते हैं. आइए इस बारे में और जानें.
भारतीय रेलवे से हर दिन करोड़ों लोग सफर करते हैं, लेकिन पटरियों के बिछे जाल को देखकर अक्सर मन में यह सवाल उठता है कि ट्रेन को दाएं जाना है या बाएं, यह ड्राइवर को कैसे पता चलता है? कार या बस की तरह ट्रेन में कोई स्टीयरिंग व्हील नहीं होता जिसे घुमाकर रास्ता बदला जा सके. ऐसे में लोको पायलट बिना किसी भ्रम के ट्रेन को बिल्कुल सही पटरी पर कैसे ले जाते हैं, इसके पीछे सिग्नलों का एक बेहद सटीक नेटवर्क, कंट्रोल रूम का तालमेल और पटरियों की आधुनिक तकनीक काम करती है.
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लोको पायलट ट्रेन को सही रास्ते पर आगे बढ़ाने के लिए मुख्य रूप से तीन चीजों के कॉम्बिनेशन का इस्तेमाल करते हैं. इनमें रेलवे के ऊंचे सिग्नल, ट्रैक स्विच यानी पटरियों को आपस में जोड़ने वाली प्रणाली और पहले से तय समय सारणी या शेड्यूल शामिल हैं.
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जब ट्रेन स्टेशन या यार्ड से आगे बढ़ती है, तो पटरियों के पास लगे संकेत ड्राइवर को बताते हैं कि आगे का रास्ता पूरी तरह सुरक्षित है या नहीं. इसी सिग्नल के आधार पर ही लोको पायलट को ट्रैक बदलने और आगे बढ़ने की अनुमति मिलती है.
Published at : 17 May 2026 04:38 PM (IST)
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एपी सिंहएडवोकेट
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