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Psychological Pricing: 59,99,199... ज्यादातर चीजों की कीमत इस तरह ही क्यों होती है, जानें राउंड फिगर में क्यों नहीं रखे जाते नंबर?

Psychological Pricing: अक्सर ही आपने इस बात पर गौर किया होगा कि कई चीजों के प्राइस ₹59, ₹99 होते हैं और राउंड फिगर में नहीं होते. आइए जानते हैं क्या है इसके पीछे की वजह.

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  • ऑड प्राइसिंग ग्राहकों को आकर्षित करने की एक मार्केटिंग रणनीति है।
  • लेफ्ट डिजिट प्रभाव से ₹199 जैसी कीमत ₹100 के करीब लगती है।
  • 19वीं सदी में कैश रजिस्टर से चोरी रोकने को यह शुरू हुई।
  • ग्राहक अक्सर खुले पैसे नहीं लेते, रिटेल चेन को लाभ होता है।

Psychological Pricing: क्या कभी आपने इस बात पर गौर किया है की दुकानों और ऑनलाइन स्टोर में चीजों की कीमत अक्सर ₹60, ₹100 फिर ₹500 जैसा राउंड नंबर के बजाय ₹59, ₹99 या फिर ₹199 पर खत्म होती है. यह कोई इत्तेफाक नहीं है. दरअसल यह ऑड प्राइसिंग या फिर साइकोलॉजिकल प्राइसिंग नाम की एक मार्केटिंग स्ट्रेटजी है. इसे ग्राहकों की सोच पर असर डालने और उन्हें खरीदारी के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से बनाया गया है. 

लेफ्ट डिजिट इफेक्ट 

ऑड प्राइसिंग के पीछे सबसे बड़ी वजहों में से एक है लेफ्ट डिजिट इफेक्ट नाम की एक साइकोलॉजिकल घटना. जब लोग कोई कीमत देखते हैं तो दिमाग उसे बाएं से दाएं पढ़ता है और पहली डिजिटल को ज्यादा अहमियत देता है.  जैसे जब किसी प्रोडक्ट की कीमत 199 होती है तो कई ग्राहक अनजाने में उसे 200 के करीब के बजाय 100 की रेंज में समझते हैं. 

डिस्काउंट का एहसास 

9 डिजिट पर खत्म होने वाली कीमत अक्सर सस्ते सौदे और डिस्काउंट से जुड़ी होती है. 499 का प्राइस टैग 500 के मुकाबले ज्यादा सस्ता लगता है. भले ही फर्क सिर्फ ₹1 का ही क्यों ना हो. इससे यह साइकोलॉजिकल सोच बनती है कि खरीदार पैसे बचा रहा है या फिर उसे बेहतर डील मिल रही है. 

कैश रजिस्टर से शुरू हुई स्ट्रेटजी 

ऑड प्राइसिंग का चलन 19वीं सदी के आखिर में शुरू हुआ जब रिटेल स्टोर में कैश रजिस्टर आम हो गए. अगर किसी भी चीज की कीमत ठीक 500 होती तो कोई बेईमान कैशियर बिना कैश रजिस्टर खोले या फिर बिक्री दर्ज के पैसे अपनी जेब में रख सकता था.

हालात अगर कीमत 499 होती तो कैशियर को ₹1 वापस करने के लिए रजिस्टर खोलना पड़ता था. इससे यह पक्का होता था कि ट्रांजैक्शन दर्ज हो गया है. इससे चोरी या फिर धोखाधड़ी की संभावना कम हो जाती थी. 

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छुट्टे पैसे को नजरअंदाज करना 

99 या फिर 199 पर खत्म होने वाली कीमतों के पीछे एक और व्यावहारिक वजह है. कई खरीदार बस ₹100 या फिर ₹200 दे देते हैं और बाकी बचे ₹1 वापस नहीं मांगते. कुछ दुकानों में दुकानदार बचे हुए पैसे वापस करने के बजाय एक छोटी कैंडी भी दे सकता है. हालांकि एक बार की खरीदारी के लिए यह बात छोटी लग सकती है लेकिन रोजाना हजारों लेन-देन में यह छोटी-छोटी रकम बड़ी रिटेल चेन के लिए काफी ज्यादा कमाई का जरिया बन जाती है.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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