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पानी में डूबने पर शरीर में क्या-क्या होता है, आखिर कितनी देर तक बच सकती है जान?

कई बार जब इंसान पानी में डूबता है तो बचने की हर संभव कोशिश करता है, लेकिन क्या आपको पता है कि डूबने के बाद शरीर में क्या होता है और कितनी देर कोई जिंदा रह सकता है.

कई बार जब इंसान पानी में डूबता है तो बचने की हर संभव कोशिश करता है, लेकिन क्या आपको पता है कि डूबने के बाद शरीर में क्या होता है और कितनी देर कोई जिंदा रह सकता है.

फिल्मों में अक्सर दिखाया जाता है कि पानी में डूब रहा इंसान काफी देर तक हाथ-पैर मारता रहता है, चिल्लाता है और मदद मांगता है. लेकिन असल जिंदगी में पानी में डूबने की प्रक्रिया ऐसी नहीं होती है. असल में यह बेहद खामोश और चंद मिनटों के अंदर जान लेने वाली होती है. चिकित्सा विज्ञान और हाइड्रोलॉजिकल अध्ययनों के आधार पर यह स्पष्ट है कि पानी में डूबने का बाद शरीर के अंदर की प्रणालियां बहुत तेजी से ध्वस्त होने लगती हैं, जिससे महज कुछ मिनटों में ही इंसान मौत के मुंह में समा जाता है.

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जब कोई व्यक्ति अचानक पानी में गिरता है, तो उसका शरीर तुरंत प्रतिक्रिया करता है. घबराता और डर के मारे इंसान प्राकृतिक रूप से अपनी सांस को अंदर ही रोक लेता है. चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इस स्थिति को वॉलंटरी एपनिया कहा जाता है.
जब कोई व्यक्ति अचानक पानी में गिरता है, तो उसका शरीर तुरंत प्रतिक्रिया करता है. घबराता और डर के मारे इंसान प्राकृतिक रूप से अपनी सांस को अंदर ही रोक लेता है. चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इस स्थिति को वॉलंटरी एपनिया कहा जाता है.
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इस शुरुआती एक से दो मिनट के दौरान फेफड़ों में पानी नहीं जाता है, क्योंकि सांस की नली का द्वार बंद होता है. हालांकि इस दौरान शरीर के अंदर ऑक्सीजन की भारी कमी होने लगती है और कार्बन डाइऑक्साइड गैस का स्तर तेजी से बढ़ने लगता है, जो आगे चलकर जानलेवा साबित होता है.
इस शुरुआती एक से दो मिनट के दौरान फेफड़ों में पानी नहीं जाता है, क्योंकि सांस की नली का द्वार बंद होता है. हालांकि इस दौरान शरीर के अंदर ऑक्सीजन की भारी कमी होने लगती है और कार्बन डाइऑक्साइड गैस का स्तर तेजी से बढ़ने लगता है, जो आगे चलकर जानलेवा साबित होता है.
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जैसे ही शरीर में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर का निश्चित सीमा से ऊपर चला जाता है, दिमाग फेफड़ों को तुरंत सांस खींचने का आपातकालीन संदेश भेजता है. इस स्थिति में इंसान चाहकर भी अपनी सांस नहीं रोक पाता है, और उसकी इच्छा के खिलाफ मुंह और नाक के जरिए पानी अंदर खिंचा चला जाता है.
जैसे ही शरीर में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर का निश्चित सीमा से ऊपर चला जाता है, दिमाग फेफड़ों को तुरंत सांस खींचने का आपातकालीन संदेश भेजता है. इस स्थिति में इंसान चाहकर भी अपनी सांस नहीं रोक पाता है, और उसकी इच्छा के खिलाफ मुंह और नाक के जरिए पानी अंदर खिंचा चला जाता है.
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पानी सीधे फेफड़ों की सांस थैलियों में भर जाता है, जिससे शरीर में ऑक्सीजन की बची-खुची सप्लाई भी पूरी तरह ठप हो जाती है. पानी के अंदर गिरने से तीन से पांच मिनट के अंदर व्यक्ति बेहोश होने लगता है.
पानी सीधे फेफड़ों की सांस थैलियों में भर जाता है, जिससे शरीर में ऑक्सीजन की बची-खुची सप्लाई भी पूरी तरह ठप हो जाती है. पानी के अंदर गिरने से तीन से पांच मिनट के अंदर व्यक्ति बेहोश होने लगता है.
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फेफड़ों में पानी भर जाने के बाद जब दिमाग की कोशिकाओं को तीन से चार मिनट तक ऑक्सीजन की एक बूंद भी नहीं मिलती, तो वे हमेशा के लिए मरना शुरू हो जाती हैं. पानी के अंदर छह से दस मिनट का समय वह खतरनाक पड़ाव है, जब इंसान ब्रेन डेड की स्थिति में पहुंच जाता है.
फेफड़ों में पानी भर जाने के बाद जब दिमाग की कोशिकाओं को तीन से चार मिनट तक ऑक्सीजन की एक बूंद भी नहीं मिलती, तो वे हमेशा के लिए मरना शुरू हो जाती हैं. पानी के अंदर छह से दस मिनट का समय वह खतरनाक पड़ाव है, जब इंसान ब्रेन डेड की स्थिति में पहुंच जाता है.
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दिमाग के काम करना बंद करते ही दिल की धड़कनें पूरी तरह से रुक जाती हैं और शरीर के अन्य महत्वपूर्ण अंग भी पूरी तरह से फेल हो जाते हैं. इस स्थिति के बाद इंसान को दोबारा होश में लाना नामुमकिन हो जाता है.
दिमाग के काम करना बंद करते ही दिल की धड़कनें पूरी तरह से रुक जाती हैं और शरीर के अन्य महत्वपूर्ण अंग भी पूरी तरह से फेल हो जाते हैं. इस स्थिति के बाद इंसान को दोबारा होश में लाना नामुमकिन हो जाता है.
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डूबने के मामलों में पानी का तापमान एक बहुत बड़ा गेम-चेंजर साबित होता है. अगर कोई व्यक्ति किसी बर्फीली झील या अत्यधिक ठंडे पानी में डूबता है, तो उसका शरीर तुरंत हाइपोथर्मिया की स्थिति में चला जाता है.
डूबने के मामलों में पानी का तापमान एक बहुत बड़ा गेम-चेंजर साबित होता है. अगर कोई व्यक्ति किसी बर्फीली झील या अत्यधिक ठंडे पानी में डूबता है, तो उसका शरीर तुरंत हाइपोथर्मिया की स्थिति में चला जाता है.
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ठंडे पानी के संपर्क में आते ही शरीर का मेटाबॉलिज्म बेहद धीमा हो जाता है, जिससे दिमाग और अंगों को बहुत कम ऑक्सीजन की जरूरत होती है. इसीलिए बर्फीले पानी में डूबने वाले कुछ लोगों को 20 से 30 मिनट के बाद भी सुरक्षित जिंदा बचा लिया गया है.
ठंडे पानी के संपर्क में आते ही शरीर का मेटाबॉलिज्म बेहद धीमा हो जाता है, जिससे दिमाग और अंगों को बहुत कम ऑक्सीजन की जरूरत होती है. इसीलिए बर्फीले पानी में डूबने वाले कुछ लोगों को 20 से 30 मिनट के बाद भी सुरक्षित जिंदा बचा लिया गया है.

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