CJP Protest: भारत में क्यों नामुमकिन है नेपाल-बांग्लादेश जैसा सत्ता परिवर्तन, जानें संविधान में कितनी मजबूत व्यवस्था?
CJP Protest: भारत में नेपाल और बांग्लादेश जैसा हिंसक तख्तापलट होना नामुमकिन है क्योंकि यहां का संविधान, न्यायपालिका, निष्पक्ष चुनाव आयोग और सेना की गैर-राजनीतिक परंपरा से लोकतंत्र को मजबूती मिलती है.

CJP Protest: संसद के मानसून सत्र के पहले ही दिन दिल्ली में संसद भवन के बाहर कॉकरोच जनता पार्टी का जबरदस्त विरोध प्रदर्शन देखने को मिला. नीट पेपर लीक के गंभीर मुद्दे को लेकर CJP ने संसद मार्च का आह्वान किया, जिससे उस क्षेत्र में भारी हड़कंप मच गया. सुबह-सुबह बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी वहां जमा हो गए और दोपहर तक वे संसद संसद कूच करने लगे. उनको तितर-बितर करने के लिए सुरक्षा बलों को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े और लाठियां भी चलाईं. दोपहर तक पुलिस ने जंतर-मंतर और कनॉट प्लेस को पूरी तरह से खाली कराकर सीजेपी का मंच खाली करा दिया है. इस गतिरोध के बीच में देश में तख्तापलट जैसी बातें भी सुनने को मिली है, जिससे यह चर्चा छिड़ गई है कि क्या भारत में कभी नेपाल, बांग्लादेश जैसी स्थिति भी बन सकती है? या यहां का संविधान इतना ताकतवर है कि ऐसा संभव ही नहीं है, चलिए यहां विस्तार से जानें.
अभिजीत दिपके ने मांगा पीएम का इस्तीफा
दो दिन पहले जब सोनम वांगचुक को दिल्ली के जंतर-मंतर से पुलिस ने जबरन हटाकर सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया को सीजेपी के फाउंडर अभिजीत दिपके ने कहा कि अभी तक तो शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग रहे थे, लेकिन अब पीएम मोदी इस्तीफा दें. कहा जा रहा है कि इस प्रोटेस्ट में सबसे ज्यादा थात्र और Gen-Z शामिल हैं. कुछ ऐसा ही विरोध प्रदर्शन पिछले कुछ सालों में भारत के पड़ोसी देशों बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका आदि में देखने को मिला है, जहां पर जेन-जी के विरोध ने तख्तापलट तक करवा दिया. ऐसे में फिर से वही सवाल उठ रहा है कि आखिर भारत में इस तरीके का तख्तापलट संभव क्यों नहीं है.
लोकतंत्र की मजबूत जड़ें
भारत में बांग्लादेश या नेपाल की तरह से अचानक और गैर-कानूनी तरीके से सरकार बदल देना पूरी तरह से असंभव है. इसकी सबसे बड़ी वजह देश का परिपक्व लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया है. हर पांच साल में होने वाले आम चुनाव जनता को अपनी पसंद की सरकार चुनने का सीधा मौका देते हैं. भारत का स्वतंत्र निर्वाचन आयोग पूरी दुनिया में निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए जाना जाता है. देश के नागरिक जानते हैं कि अगर उनको किसी सरकार से नाराजगी है तो उसे हटाने के लिए सही तरीके सड़कों पर हिंसा फैलाना नहीं, बल्कि मतदान केंद्रों पर वोट की ताकत का इस्तेमाल करना है.
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सेना का पूरी तरह से गै-राजनीतिक होना
पड़ोसी देशों में तख्तापलट के पीछे अक्सर वहां की सेना या फिर सुरक्षाबलों की राजनीतिक भूमिका रही है. इसके विपरीत भारत में सशस्त्र बल पूरी तरह से राजनीतिक नियंत्रण से बाहर और केवल संविधान के प्रति वफादार हैं. आजादी के बाद से ही भारतीय सेना का चरित्र गैर-राजनीतिक रहा है और उनका ध्यान सिर्फ देश की सीमाओं की रक्षा करने पर केंद्रित होता है. भारत में सेना किसी भी सरकार को उखाड़ फेंकने या राजनीतिक आंदोलने का हिस्से बनने के बारे में सोच भी नहीं सकती है, जो किसी भी गैर संवैधानिक तख्तापलट की संभावना को सिरे से खारिज करता है.
संविधान की रक्षा और सुप्रीम कोर्ट
भारतीय संविधान की सर्वोच्चता और न्यायपालिका की आजादी देश को किसी भी तानाशाही या फिर अराजकता से बचाती है. देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के पास न्यायिक समीक्षा का विशेष अधिकार होता है. अगर कोई सरकार या सड़क पर उतरी भीड़ गैर-संवैधानिक तरीके से सत्ता पर कब्जा करने की कोशिश करती है या हिंसा फैलाने की कोशिश करती है तो अदालत तुरंत हस्तक्षेप कर सकती है. सुप्रीम कोर्ट संविधान के मूल ढांचे का रक्षक है. न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि देश का शासन केवल और केवल कानून और तय संवैधानिक नियमों के हिसाब से ही चलाया जाए.
विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच ताकतों का संतुलन
भारत के संविधान में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का बिल्कुल साफ और संतुलित बंटवारा किया गया है. इसका मतलब यह है कि देश का कोई भी एक अंग या कोई अकेला नेता पूरे तंत्र पर कब्जा जमाकर मनमानी नहीं कर सकता है. अगर कार्यपालिका कोई गलत फैसला लेती है तो विधायिका संसद में सवाल पूछती है और न्यायपालिका उस पर रोक लगा सकती है. ताकतों का यह संतुलन और परस्पर नियंत्रण देश के पूरे प्रशासनिक ढांचे को इतना मजबूत बना देता है कि उसे किसी एक आंदोलन से हिला पाना नामुमकिन है.
विकेंद्रीकृत सत्ता
भारत एक विशाल और विविधता से भरा हुआ देश है, जहां पर सत्ता सिर्फ दिल्ली या केंद्र तक सीमित नहीं है. यहां पर संघीय ढांचा लागू है, जिसके तहत अलग-असग राज्यों में अलग-अलग क्षेत्रीय दलों की सरकारें चलती हैं. इतने बड़े देश में सिर्फ राजधानी दिल्ली या फिर किसी एक शहर में उग्र प्रदर्शन करके पूरे देश की सत्ता पर कब्जा कर लेना तकनीकी और व्यावहारिक दोनों तरह से असंभव है. देश के विभिन्न हिस्सों की राजनीतिक सोच अलग है, जिससे कोई एक आंदोलन पूरे भारत की सत्ता की दिशा को रातोंरात नहीं मोड़ सकता है.
नागरिकों के मौलिक अधिकार और सुरक्षा
भारतीय संविधान अपने नागरिकों को अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की आजादी और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का अधिकार देता है. जनता को सरकार की नीतियों पर असहमति का जताने का पूरा हक है, लेकिन इसकी सीमाएं भी तय हैं. नागरिक अधिकारों की आड़ में हिंसा करने या संवैधानिक सरकार को गिराने की इजाजत कानून नहीं देता है. अगर कोई प्रदर्शन उग्र होता है तो कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुरक्षा बल सख्त कदम उठाते हैं, जैसा कि आज दिल्ली में सीजेपी के प्रदर्शन के दौरान देखने को मिला. संविधान में संशोधन की प्रक्रिया भी इतनी जटिल है कि कोई भी सरकार या समूह मनमाने ढंग से नियम नहीं बदल सकता है.
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