CJP Sansad March: प्रदर्शन के दौरान कौन देता है लाठी चार्ज का ऑर्डर, क्या जवान खुद लेते हैं फैसला?
CJP Sansad March: कॉकरोच जनता पार्टी के संसद मार्च के दौरान पुलिस के साथ झड़प की खबरें सामने आ रही हैं. इसी बीच आइए जानते हैं कि लाठी चार्ज करने का आदेश कौन देता है.

- लाठीचार्ज का आदेश वरिष्ठ अधिकारी या मजिस्ट्रेट ही देते हैं।
- यह अंतिम उपाय है; पहले शांतिपूर्ण तरीके आजमाए जाते हैं।
- पुलिसकर्मी अपनी मर्जी से लाठीचार्ज का आदेश नहीं दे सकते।
- लाठीचार्ज में सिर, गर्दन पर मारना सख्त मना है।
CJP Sansad March: कॉकरोच जनता पार्टी के संसद तक प्रस्तावित मार्च के दौरान हुई झड़पों की खबरों के बाद सार्वजनिक प्रदर्शन में बल प्रयोग पर फिर से बहस शुरू हो गई है. जहां कुछ प्रदर्शनकारियों का यह आरोप है कि जंतर मंतर पर लाठी चार्ज किया गया वहीं दिल्ली पुलिस का यह कहना है कि ऐसी कोई भी घटना नहीं हुई है. विरोध प्रदर्शन से जुड़े दावों के बावजूद भारतीय कानून में प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग के लिए एक तय प्रक्रिया है. आमतौर पर कोई भी पुलिसकर्मी अपनी मर्जी से लाठी चार्ज का आदेश नहीं दे सकता.
लाठी चार्ज का आदेश देने का अधिकार किसे है?
भारत के कानून व्यवस्था ढांचे के तहत लाठीचार्ज का आदेश देने का अधिकार आमतौर पर एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट या फिर मौके पर मौजूद सबसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के पास ही होता है. यह स्थिति पर निर्भर करता है.
अगर विरोध की जगह पर कोई भी एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट जैसे सब डिविजनल मजिस्ट्रेट मौजूद है तो उनके पास गैर कानूनी भीड़ को तितर बितर करने के लिए बल प्रयोग का निर्देश देने का कानूनी अधिकार होता है. ऐसी स्थिति में पुलिस अधिकारी मजिस्ट्रेट के निर्देशों पर काम करते हैं.
अगर कोई भी मजिस्ट्रेट मौजूद नहीं है तो जिम्मेदारी मौके पर मौजूद सबसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी जैसे कि स्टेशन हाउस ऑफिसर, डेप्युटी सुपरीटेंडेंट ऑफ पुलिस या फिर सुपरीटेंडेंट ऑफ पुलिस पर आती है. इन्हें बल प्रयोग की अनुमति देने से पहले स्थिति का आकलन करना होता है.
लाठी चार्ज को आखिरी उपाय माना जाता है
पुलिस मैनुअल और कानून व्यवस्था की स्थापित प्रक्रिया के मुताबिक अधिकारियों को शारीरिक बल का इस्तेमाल करने से पहले शांतिपूर्ण तरीके को ही आजमाना चाहिए. पहला कदम आमतौर पर प्रदर्शनकारियों के साथ बातचीत करना और उन्हें अपनी मर्जी से तितर-बितर होने के लिए प्रोत्साहित करना होता है. अगर कानून का उल्लंघन करते समय भीड़ बनी रहती है तो आमतौर पर लाउडस्पीकर के जरिए घोषणा की जाती है. इसमें भीड़ को गैर कानूनी घोषित किया जाता है और प्रतिभागियों को उस जगह से जाने का निर्देश दिया जाता है.
अगर इसके बावजूद भी भीड़ वहां से नहीं हटती और इनकार करती है, साथ ही स्थिति भी बिगड़ने लगती है तो अधिकारी भीड़ को कंट्रोल करने के लिए कम घातक उपाय जैसे कि वॉटर कैनन या फिर आंसू गैस का इस्तेमाल कर सकते हैं. लाठी चार्ज पर तभी विचार किया जाता है जब इस तरह के उपाय बेअसर साबित हो जाते हैं या फिर भीड़ हिंसक हो जाती है.
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क्या कोई पुलिसकर्मी बल का इस्तेमाल करने का फैसला ले सकता है?
विरोध प्रदर्शन में तैनात पुलिसकर्मी को सिर्फ अपनी व्यक्तिगत राय या फिर गुस्से के आधार पर स्वतंत्र रूप से लाठी चार्ज का आदेश देने या फिर शुरू करने का अधिकार नहीं है. बल प्रयोग के लिए कमांड की चेन का पालन करना अनिवार्य है. अगर किसी भी स्थिति में कोई अफसर बिना सही मंजूरी के लाठी का इस्तेमाल करता है या फिर नियमों का उल्लंघन करता है तो उसे पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है.
सिर्फ निजी बचाव के अधिकार के सिद्धांत के तहत ही एक अहम अपवाद माना जाता है. अगर पुलिस कर्मी पर अचानक जानलेवा हमला होता है और सीनियर अफसर से निर्देश लेने का कोई व्यावहारिक मौका नहीं होता तो वह अपनी या फिर दूसरों की सुरक्षा के लिए उचित बल का इस्तेमाल कर सकता है.
लाठी के इस्तेमाल से जुड़े नियम
पुलिस मैनुअल में लाठी चार्ज करने के तरीके के बारे में भी दिशा-निर्देश दिए गए हैं. अफसर को निर्देश दिया जाता है कि वह व्यवस्था को बहाल करने के लिए कम से कम जरूरी बल का इस्तेमाल करें. आमतौर पर लाठी शरीर के निचले हिस्से खासकर पैरों पर मारी जानी चाहिए और सिर, गर्दन, छाती पर वार करना मना है.
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