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Mobile Internet: कैसे काम करता है इंटरनेट, जानें बिना तारों के मोबाइल तक कैसे पहुंचती है इंटरनेट स्पीड

Mobile Internet: हम सभी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इंटरनेट का इस्तेमाल जरूर करते हैं. लेकिन आखिर यह हमारे फोन तक पहुंच कैसे रहा है. आइए जानते हैं.

Mobile Internet: हम सभी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इंटरनेट का इस्तेमाल जरूर करते हैं. लेकिन आखिर यह हमारे फोन तक पहुंच कैसे रहा है. आइए जानते हैं.

Mobile Internet: जब भी हम इंस्टाग्राम स्क्रॉल करते हैं, यूट्यूब देखते हैं या फिर व्हाट्सएप मैसेज भेजते हैं तो इंटरनेट का इस्तेमाल होता है. लेकिन यह इंटरनेट हमारे फोन तक पहुंच कैसे रहा है. दरअसल इसके पीछे एक काफी बड़ा ग्लोबल सिस्टम है. आइए जानते हैं कि बिना किसी तार के इंटरनेट आखिर काम कैसे करता है.

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लगभग 99% इंटरनेट हवा के जरिए नहीं बल्कि फिजिकल केबल्स के जरिए ट्रैवल करता है. ये हाई स्पीड ऑप्टिकल फाइबर केबल्स होती हैं जो जमीन के नीचे और समुद्र के नीचे बिछाई जाती हैं.  ये डेटा को लाइट सिग्नल के रूप में लगभग लाइट की स्पीड से ले जाती हैं.
लगभग 99% इंटरनेट हवा के जरिए नहीं बल्कि फिजिकल केबल्स के जरिए ट्रैवल करता है. ये हाई स्पीड ऑप्टिकल फाइबर केबल्स होती हैं जो जमीन के नीचे और समुद्र के नीचे बिछाई जाती हैं. ये डेटा को लाइट सिग्नल के रूप में लगभग लाइट की स्पीड से ले जाती हैं.
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जब आप किसी दूसरे देश में होस्ट की गई वेबसाइट खोलते हैं तो आपका डेटा समुद्र तल पर बिछाई गई सबमरीन फाइबर ऑप्टिकल केबल्स के जरिए ट्रैवल करता है. इन्हीं केबल्स की मदद से वीडियो, ईमेल और क्लाउड सेवा के साथ-साथ इंटरनेशनल डेटा ट्रांसफर होता है.
जब आप किसी दूसरे देश में होस्ट की गई वेबसाइट खोलते हैं तो आपका डेटा समुद्र तल पर बिछाई गई सबमरीन फाइबर ऑप्टिकल केबल्स के जरिए ट्रैवल करता है. इन्हीं केबल्स की मदद से वीडियो, ईमेल और क्लाउड सेवा के साथ-साथ इंटरनेशनल डेटा ट्रांसफर होता है.
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एक बार जब डेटा फाइबर केबल्स के जरिए आपके देश और शहर तक पहुंच जाता है तो इसे सबसे नजदीकी मोबाइल टावर पर रूट किया जाता है. मॉडर्न टावर सीधे फाइबर नेटवर्क से जुड़े होते हैं, जिससे डेटा वायरलेस होने से पहले कम से कम देरी और हाई स्पीड डिलीवरी पक्की होती है.
एक बार जब डेटा फाइबर केबल्स के जरिए आपके देश और शहर तक पहुंच जाता है तो इसे सबसे नजदीकी मोबाइल टावर पर रूट किया जाता है. मॉडर्न टावर सीधे फाइबर नेटवर्क से जुड़े होते हैं, जिससे डेटा वायरलेस होने से पहले कम से कम देरी और हाई स्पीड डिलीवरी पक्की होती है.
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असली वायरलेस इंटरनेट सिर्फ मोबाइल टावर और आपके फोन के बीच होता है. टावर डेटा को रेडियो तरंगों में बदल देता है. इसके बाद आपका फोन उन तरंगों को रिसीव करता है और वापस टेक्स्ट, इमेज या वीडियो में डीकोड करता है.
असली वायरलेस इंटरनेट सिर्फ मोबाइल टावर और आपके फोन के बीच होता है. टावर डेटा को रेडियो तरंगों में बदल देता है. इसके बाद आपका फोन उन तरंगों को रिसीव करता है और वापस टेक्स्ट, इमेज या वीडियो में डीकोड करता है.
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इंटरनेट स्पीड इस्तेमाल किए गए फ्रीक्वेंसी बैंड पर काफी ज्यादा निर्भर करती है. 4G, 5G और शुरुआती 6G जैसे टेक्नोलॉजी अलग-अलग फ्रीक्वेंसी का इस्तेमाल करती हैं. ज्यादा फ्रीक्वेंसी ज्यादा डेटा ले जाती है और तेज स्पीड देती है.
इंटरनेट स्पीड इस्तेमाल किए गए फ्रीक्वेंसी बैंड पर काफी ज्यादा निर्भर करती है. 4G, 5G और शुरुआती 6G जैसे टेक्नोलॉजी अलग-अलग फ्रीक्वेंसी का इस्तेमाल करती हैं. ज्यादा फ्रीक्वेंसी ज्यादा डेटा ले जाती है और तेज स्पीड देती है.
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यहां तक की वाई-फाई भी पूरी तरह से वायरलेस नहीं है. इंटरनेट आपके घर के राउटर तक एक फिजिकल ब्रॉडबैंड या फिर फाइबर केबल के जरिए पहुंचता है. फिर राउटर उस सिग्नल को रेडियो तरंगों में बदल देता है जिससे फोन और लैपटॉप एक कमरे या घर जैसे सीमित एरिया में वायरलेस तरीके से कनेक्ट हो पाते हैं.
यहां तक की वाई-फाई भी पूरी तरह से वायरलेस नहीं है. इंटरनेट आपके घर के राउटर तक एक फिजिकल ब्रॉडबैंड या फिर फाइबर केबल के जरिए पहुंचता है. फिर राउटर उस सिग्नल को रेडियो तरंगों में बदल देता है जिससे फोन और लैपटॉप एक कमरे या घर जैसे सीमित एरिया में वायरलेस तरीके से कनेक्ट हो पाते हैं.

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