Sarabjeet Kaur Case: पाकिस्तान की अदालत में कैसे केस कर सकते हैं भारतीय, क्या हैं इसके कानूनी नियम?
Sarabjeet Kaur Case: हाल ही में भारत के एक नागरिक ने पाकिस्तान की कोर्ट में केस दर्ज किया है. आइए जानते हैं कि पाकिस्तान की कोर्ट में कैसे केस दर्ज कर सकते हैं और इसे लेकर क्या कहता है कानून.

Sarabjeet Kaur Case: हाल ही के एक मामले ने भारत-पाकिस्तान बॉर्डर पर एक अजीब कानूनी स्थिति की तरफ ध्यान खींचा है. दरअसल भारतीय नागरिक करनाल सिंह ने अपनी पत्नी सरबजीत कौर के मामले में कानूनी राहत के लिए पाकिस्तान के लाहौर हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. अपनी याचिका में करनाल सिंह ने पाकिस्तानी नागरिक नासिर हुसैन के साथ अपनी पत्नी की दूसरी शादी को अमान्य घोषित करने और उन्हें भारत वापस भेजने का अनुरोध किया है. इसी बीच आइए जानते हैं कि क्या भारतीय नागरिक पाकिस्तानी कोर्ट में केस फाइल कर सकते हैं?
विदेशी नागरिकों का कोर्ट जाने का कानूनी अधिकार
पाकिस्तान के कानूनी सिस्टम के तहत विदेशी नागरिकों को लोकल कोर्ट में सिविल केस फाइल करने की पूरी इजाजत है. पाकिस्तान का कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर यह कानूनी अधिकार देता है और यह भारतीय नागरिकों के साथ विदेशियों पर भी समान रूप से लागू होता है.
जब तक विवाद पाकिस्तानी कानून के तहत आता है या फिर इसमें पाकिस्तान के अधिकार क्षेत्र में हुई घटनाएं शामिल हैं, विदेशी नागरिक देश की कोर्ट के जरिए कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं. आसान शब्दों में कहें तो विदेशियों को दिए गए कानूनी अधिकार पाकिस्तानी नागरिकों को सिविल मामलों में दिए गए अधिकारों जैसे ही हैं.
सिविल प्रोसीजर कोड की भूमिका
पाकिस्तान में सिविल लिटिगेशन की प्रक्रिया को कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर कंट्रोल करता है. ध्यान देने वाली बात यह है कि पाकिस्तान और भारत को ब्रिटिश कॉलोनियल पीरियड से एक जैसे लीगल फ्रेमवर्क विरासत में ही मिले हैं. इस वजह से सीपीसी के कई प्रोविजन दोनों देशों में काफी मिलते-जुलते हैं.
यही समानता अक्सर भारतीय कानून से परिचित वकीलों के लिए पाकिस्तान में प्रोसीजरल नियमों को समझना आसान बनाती है. सीपीसी बताता है कि मुकदमे कैसे फाइल किए जाते हैं, सबूत कैसे पेश किए जाते हैं और कोर्ट पार्टियों के बीच विवादों को कैसे हैंडल करते हैं.
पाकिस्तानी वकील का अपॉइंटमेंट
कोई भारतीय नागरिक स्पेशल परमिशन के बिना सीधे पाकिस्तानी कोर्ट में अपना केस नहीं फाइल कर सकता. उन्हें एक ऐसा वकील अप्वॉइंट करना होगा जो पाकिस्तान बार काउंसिल में रजिस्टर्ड हो. यह ऑथराइजेशन आमतौर पर पावर ऑफ अटॉर्नी के जरिए दिया जाता है. इससे पाकिस्तानी वकील को डॉक्यूमेंट फाइल करने, हियरिंग में शामिल होने और कोर्ट की कार्यवाही में भारतीय नागरिक का केस लड़ने की इजाजत मिलती है.
केस शुरू करने के लिए वकील एक फॉर्मल लीगल क्लेम तैयार करता है जिसे प्लेंट कहते हैं. इस डॉक्यूमेंट में केस के फैक्ट, मौजूदा सबूत और कोर्ट से मांगी जा रही खास राहत के बारे में बताया जाता है. केस फाइल करने के लिए पहचान और राष्ट्रीयता वेरीफाई करने के लिए वैलिड पासपोर्ट के कॉपी देनी होती है.
इसी के साथ वादी को एक वकालतनामा भी देना होगा जो वकील को औपचारिक रूप से उनका प्रतिनिधित्व करने के लिए ऑथराइज करता है. इसी के साथ केस के फैक्टर को कंफर्म करने वाला एक शपथ पत्र भी जरूरी है.
पर्सनल अपीरियंस के लिए वीजा की जरूरत
अगर कोर्ट भारतीय नागरिक को कार्रवाई के दौरान पर्सनली पेश होने को कहता है तो उन्हें एक वैध पाकिस्तान वीजा भी लेना होगा. यह कानूनी मकसद से दिया गया विजिट वीजा हो सकता है.
इसी के साथ कुछ मामलों में पाकिस्तानी कोर्ट विदेशी वादियों से एक सिक्योरिटी अमाउंट जमा करने के लिए कह सकते हैं. जिसे कॉस्ट के लिए सिक्योरिटी कहा जाता है. यह तरीका डिफेंडेंट को बचाने के लिए है, अगर वादी केस हार जाता है और लिटिगेशन का खर्च नहीं उठा सकता.
वैसे तो भारतीयों के लिए पाकिस्तानी कोर्ट में जाने के लीगल चैनल मौजूद हैं लेकिन डिप्लोमेटिक रिलेशंस, वीजा पाबंदी और एडमिनिस्ट्रेटिव रूकावटों की वजह से क्रॉस बॉर्डर डिस्प्यूट मुश्किल हो सकते हैं.
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Source: IOCL



























