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Aurora Lights: आसमान में कैसे बनती हैं ऑरोरा लाइट्स, क्या भारत में भी देखने को मिल सकता है यह नजारा?

Aurora Lights: ऑरोरा लाइट्स पृथ्वी पर मौजूद सबसे दुर्लभ और लुभावने प्राकृतिक नजारों में से एक है. आइए जानते हैं कि ये आसमान में कैसे बनती हैं.

Aurora Lights: ऑरोरा लाइट्स पृथ्वी पर मौजूद सबसे दुर्लभ और लुभावने प्राकृतिक नजारों में से एक है. आइए जानते हैं कि ये आसमान में कैसे बनती हैं.

Aurora Lights: ऑरोरा लाइट्स जिन्हें अक्सर पोलर लाइट भी कहा जाता है पृथ्वी पर सबसे लुभावने प्राकृतिक नजारों में से एक है. लंबे समय से स्कैंडिनेविया और आर्कटिक के बर्फीले आसमान से जुड़ी ऑरोरा लाइट्स लोगों को काफी ज्यादा आकर्षित करती हैं. आइए जानते हैं कि आसमान में यह कैसे बनती हैं और क्या भारत में भी इन्हें देखा जा सकता है.

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ऑरोरा लाइट्स की शुरुआत सूरज पर होने वाली तेज गतिविधि से होती है. सूरज लगातार चार्जड पार्टिकल्स की धाराएं छोड़ता रहता है जिन्हें सोलर विंड कहा जाता है. ज्यादातर सौर गतिविधि के समय यह फ्लो काफी ज्यादा तेज हो जाता है जिस वजह से काफी बड़ी संख्या में एनर्जेटिक प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन अंतरिक्ष में पृथ्वी की तरफ तेजी से बढ़ते हैं.
ऑरोरा लाइट्स की शुरुआत सूरज पर होने वाली तेज गतिविधि से होती है. सूरज लगातार चार्जड पार्टिकल्स की धाराएं छोड़ता रहता है जिन्हें सोलर विंड कहा जाता है. ज्यादातर सौर गतिविधि के समय यह फ्लो काफी ज्यादा तेज हो जाता है जिस वजह से काफी बड़ी संख्या में एनर्जेटिक प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन अंतरिक्ष में पृथ्वी की तरफ तेजी से बढ़ते हैं.
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जैसे ही यह चार्जड पार्टिकल पृथ्वी के पास आते हैं ज्यादातर ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र, जिसे मैग्नेटोस्फीयर कहा जाता है, के जरिए डिफलेक्ट हो जाते हैं. हालांकि यह ढाल उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के पास कमजोर होती है. जिस वजह से कुछ पार्टिकल्स चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के साथ घूमते हुए ऊपरी वायुमंडल में चले जाते हैं.
जैसे ही यह चार्जड पार्टिकल पृथ्वी के पास आते हैं ज्यादातर ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र, जिसे मैग्नेटोस्फीयर कहा जाता है, के जरिए डिफलेक्ट हो जाते हैं. हालांकि यह ढाल उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के पास कमजोर होती है. जिस वजह से कुछ पार्टिकल्स चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के साथ घूमते हुए ऊपरी वायुमंडल में चले जाते हैं.
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जब सौर पार्टिकल्स पृथ्वी के वायुमंडल में मौजूद गैस से टकराते हैं तो ऊर्जा रोशनी के रूप में निकलती है. यह गैस मुख्य रूप से ऑक्सीजन और नाइट्रोजन होती है. यह प्रक्रिया वैसी ही है जैसे नियॉन लैंप जलता है. यह टकराव लगभग 80 किलोमीटर से लेकर 300 किलोमीटर से ज्यादा की ऊंचाई पर होते हैं.
जब सौर पार्टिकल्स पृथ्वी के वायुमंडल में मौजूद गैस से टकराते हैं तो ऊर्जा रोशनी के रूप में निकलती है. यह गैस मुख्य रूप से ऑक्सीजन और नाइट्रोजन होती है. यह प्रक्रिया वैसी ही है जैसे नियॉन लैंप जलता है. यह टकराव लगभग 80 किलोमीटर से लेकर 300 किलोमीटर से ज्यादा की ऊंचाई पर होते हैं.
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ऑरोरा लाइट्स का रंग इसमें शामिल गैस और टकराव की ऊंचाई पर निर्भर करता है. हरा रंग काफी ज्यादा आम है जो लगभग 100 किलोमीटर की ऊंचाई पर ऑक्सीजन से आता है. लाल रंग काफी दुर्लभ है जो ऑक्सीजन के कारण ज्यादा ऊंचाई पर बनते हैं. बैंगनी, नीला और गुलाबी रंग नाइट्रोजन की वजह से होते हैं.
ऑरोरा लाइट्स का रंग इसमें शामिल गैस और टकराव की ऊंचाई पर निर्भर करता है. हरा रंग काफी ज्यादा आम है जो लगभग 100 किलोमीटर की ऊंचाई पर ऑक्सीजन से आता है. लाल रंग काफी दुर्लभ है जो ऑक्सीजन के कारण ज्यादा ऊंचाई पर बनते हैं. बैंगनी, नीला और गुलाबी रंग नाइट्रोजन की वजह से होते हैं.
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भारत भूमध्य रेखा के पास है जो पृथ्वी के चुंबकीय ध्रुव से काफी दूर है. इस वजह से यहां पर यह नजारा दिखना काफी दुर्लभ है. सामान्य परिस्थितियों में ऑरोरा ओवल कभी भी इतना दक्षिण तक नहीं फैलता की भारतीय उपमहाद्वीप से दिखाई दे.
भारत भूमध्य रेखा के पास है जो पृथ्वी के चुंबकीय ध्रुव से काफी दूर है. इस वजह से यहां पर यह नजारा दिखना काफी दुर्लभ है. सामान्य परिस्थितियों में ऑरोरा ओवल कभी भी इतना दक्षिण तक नहीं फैलता की भारतीय उपमहाद्वीप से दिखाई दे.
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मुश्किलों के बावजूद हाल के सालों में भारत में भी यह नजारा देखा गया है. 2024 और 2025 में लद्दाख के कुछ हिस्सों में लाल और बैंगनी रंग की ऑरोरा लाइट्स देखने को मिली. अब क्योंकि सोलर साइकिल 25 के 2026 में अपने चरम पर पहुंचने की उम्मीद है इस वजह से वैज्ञानिकों का कहना है कि उत्तर भारत में इस घटना को फिर से देखने की संभावना है.
मुश्किलों के बावजूद हाल के सालों में भारत में भी यह नजारा देखा गया है. 2024 और 2025 में लद्दाख के कुछ हिस्सों में लाल और बैंगनी रंग की ऑरोरा लाइट्स देखने को मिली. अब क्योंकि सोलर साइकिल 25 के 2026 में अपने चरम पर पहुंचने की उम्मीद है इस वजह से वैज्ञानिकों का कहना है कि उत्तर भारत में इस घटना को फिर से देखने की संभावना है.

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