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Holi 2025: जब पिचकारी नहीं थी तो कैसे दूर तक फेंका जाता था रंग? होली पर इन चीजों का होता था इस्तेमाल

Holi 2025: जैसे-जैसे युग बदलता गया है, वैसे-वैसे पिचकारियों की बनावट भी बदल चुकी है और रंग खेलने का तरीका भी बदल गया है. लेकिन क्या आपको पता है कि जब पिचकारी नहीं हुआ करती थी तब रंग कैसे खेलते थे.

Holi 2025: जैसे-जैसे युग बदलता गया है, वैसे-वैसे पिचकारियों की बनावट भी बदल चुकी है और रंग खेलने का तरीका भी बदल गया है. लेकिन क्या आपको पता है कि जब पिचकारी नहीं हुआ करती थी तब रंग कैसे खेलते थे.

Holi 2025: होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं बल्कि खुशियों, सुख और समृद्धि का भी त्योहार है. होली आने से पहले ही पिचकारियों का बाजार गुलजार है. यहां हर तरह की पिचकारियों की बहार है. भारत में पिचकारियां सोशल मीडिया पर वायरल चीजों से भी प्रेरित रहती हैं. जैसे पुष्पा हथौड़ा पिचकारी और केजीएफ की हथौड़ा पिचकारी का जबरदस्त क्रेज देखा जा रहा है. ये पिचकारियां अलग-अलग कीमतों में होती हैं और बच्चों के बीच बहुत चर्चा में रहती हैं. लेकिन कभी सोचा है कि जब पिचकारियां नहीं थीं तो दूर तक रंग कैसे फेंका जाता था. चलिए जानते हैं.

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पिचकारियां हमेशा से होली के उत्सव का जरूरी अंग रही हैं. इनका इस्तेमाल कब से शुरू हुआ, इसके तो प्रमाण नहीं मिल पाए हैं, लेकिन इनको खासतौर से होली में इस्तेमाल करने के लिए ही बनाया जाता था.
पिचकारियां हमेशा से होली के उत्सव का जरूरी अंग रही हैं. इनका इस्तेमाल कब से शुरू हुआ, इसके तो प्रमाण नहीं मिल पाए हैं, लेकिन इनको खासतौर से होली में इस्तेमाल करने के लिए ही बनाया जाता था.
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पुराने जमाने में पिचकारियां बांस या फिर जानवरों की सींग जैसे प्राकृतिक सामान का इस्तेमाल करके बनाई जाती थी. इसमें एक छोटा सा बल्ब लगा होता था, जिसे दबाने से पानी का छिड़काव होता था.
पुराने जमाने में पिचकारियां बांस या फिर जानवरों की सींग जैसे प्राकृतिक सामान का इस्तेमाल करके बनाई जाती थी. इसमें एक छोटा सा बल्ब लगा होता था, जिसे दबाने से पानी का छिड़काव होता था.
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पहले के जमाने में पानी में फूलों के रंग, हल्दी, पलाश के फूलों का खुशबूदार पानी एक-दूसरे पर डाला जाता था, जो न कि केवल खुशबूदार होता था, बल्कि कीटाणुनाशक और त्वचा के लिए भी बहुत अच्छा होता था.
पहले के जमाने में पानी में फूलों के रंग, हल्दी, पलाश के फूलों का खुशबूदार पानी एक-दूसरे पर डाला जाता था, जो न कि केवल खुशबूदार होता था, बल्कि कीटाणुनाशक और त्वचा के लिए भी बहुत अच्छा होता था.
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जब पिचकारी नहीं थी, उस जमाने में घर के आंगन में बड़े-बड़े बर्तनों में रंग घोला जाता था और यहीं से रंग ले लेकर सभी एक-दूसरे के साथ होली खेलते थे. इसके लिए बाल्टी या लोटा जैसे घर में मौजूद बर्तन का इस्तेमाल किया जाता था.
जब पिचकारी नहीं थी, उस जमाने में घर के आंगन में बड़े-बड़े बर्तनों में रंग घोला जाता था और यहीं से रंग ले लेकर सभी एक-दूसरे के साथ होली खेलते थे. इसके लिए बाल्टी या लोटा जैसे घर में मौजूद बर्तन का इस्तेमाल किया जाता था.
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एक लोकप्रिय कहानी की मानें तो पिचकारी का उपयोग करने की परंपरा भगवान कृष्ण से जुड़ी है, जो होली के दौरान रंग खेलने के लिए पिचकारी का उपयोग करते थे.
एक लोकप्रिय कहानी की मानें तो पिचकारी का उपयोग करने की परंपरा भगवान कृष्ण से जुड़ी है, जो होली के दौरान रंग खेलने के लिए पिचकारी का उपयोग करते थे.
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मुगल बादशाह भी होली के दीवाने रहते थे. वो इस त्योहार का बेसब्री से इंतजार करते थे और रंग खेलने के लिए पिचकारी जैसी चीजें इकट्ठा करते थे.
मुगल बादशाह भी होली के दीवाने रहते थे. वो इस त्योहार का बेसब्री से इंतजार करते थे और रंग खेलने के लिए पिचकारी जैसी चीजें इकट्ठा करते थे.
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कहा तो ये भी जाता है कि त्रेता और द्वापर युग में लोग सोने और चांदी की पिचकारियों से रंग खेलते थे. वहीं राजा-महाराजा भी पिचकारी से होली खेलते थे.
कहा तो ये भी जाता है कि त्रेता और द्वापर युग में लोग सोने और चांदी की पिचकारियों से रंग खेलते थे. वहीं राजा-महाराजा भी पिचकारी से होली खेलते थे.

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