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रेगिस्तान में आसानी से कर सकते हैं इन सब्जियों की खेती, धूप हो या बारिश कभी नहीं थमेगा काम

थार रेगिस्तान में कैर, सांगरी, काचरी और ग्वार जैसी कई फसलें बेहद कम पानी में भी उगाई जा सकती हैं. जानिए रेगिस्तानी खेती की सफल और पारंपरिक तकनीकों के बारे में.

थार रेगिस्तान में कैर, सांगरी, काचरी और ग्वार जैसी कई फसलें बेहद कम पानी में भी उगाई जा सकती हैं. जानिए रेगिस्तानी खेती की सफल और पारंपरिक तकनीकों के बारे में.

रेगिस्तान का नाम सुनते ही हमारे मन में सूखी और बंजर जमीन की तस्वीर आ जाती है. इसको देख लगता है कि वहां के किसान खेत में कुछ भी नहीं उग सकता. लेकिन ऐसा नहीं है राजस्थान के थार रेगिस्तान में सदियों से किसान कुछ खास सब्जियां उगाते आ रहे हैं. जो कि बहुत कम पानी में भी अच्छी तरह बढ़ जाती हैं. चाहे तेज धूप हो या तेज गर्मी, इन पौधों पर कोई फर्क नहीं पड़ता. यही वजह है कि रेगिस्तान में रहने वाले किसानों के लिए ये सब्जियां बहुत काम की साबित होती हैं. ऐसे में आपके दिमाग में ये सवाल आता कि आखिर ऐसे कौन से पौधे हैं जो कम पानी में भी फल देने लगते है. आइए जानते हैं इसके बारे में पूरी जानकारी.

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सबसे पहले बात करते हैं कैर की. कैर छोटी झाड़ी होती है, जिसमें छोटे-छोटे गोल फल लगते हैं. इन्हीं फलों की सब्जी बनाई जाती है. कैर की खास बात यह है कि यह बहुत कम बारिश में भी उग जाती है. जिन इलाकों में साल भर में सिर्फ 150 मिलीमीटर बारिश होती है, वहां भी कैर की झाड़ी उग जाती है. गर्मी के मौसम में जब थार रेगिस्तान का तापमान 50 डिग्री तक पहुंच जाता है, तब भी यह पौधा सूखता नहीं है.  इसके अलावा कैर हर तरह की मिट्टी में उग सकती है, चाहे मिट्टी में कम खाद हो या ज्यादा.
सबसे पहले बात करते हैं कैर की. कैर छोटी झाड़ी होती है, जिसमें छोटे-छोटे गोल फल लगते हैं. इन्हीं फलों की सब्जी बनाई जाती है. कैर की खास बात यह है कि यह बहुत कम बारिश में भी उग जाती है. जिन इलाकों में साल भर में सिर्फ 150 मिलीमीटर बारिश होती है, वहां भी कैर की झाड़ी उग जाती है. गर्मी के मौसम में जब थार रेगिस्तान का तापमान 50 डिग्री तक पहुंच जाता है, तब भी यह पौधा सूखता नहीं है. इसके अलावा कैर हर तरह की मिट्टी में उग सकती है, चाहे मिट्टी में कम खाद हो या ज्यादा.
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अब बात करते हैं सांगरी की, जो खेजड़ी के पेड़ से मिलती है. खेजड़ी को राजस्थान में बहुत पवित्र माना जाता है और इसे रेगिस्तान का कल्पवृक्ष भी कहा जाता है. इसकी हरी फलियों को सांगरी कहा जाता है. इन्हीं फलियों को उबालकर सब्जी बनाई जाती है. वहां के लोग सांगरी को सुखाकर भी रखते हैं, जिससे यह कई महीनों तक खराब नहीं होती है. कैर और सांगरी को मिलाकर बनाई गई सब्जी राजस्थान में बहुत मशहूर है और बड़े आयोजनों में भी परोसी जाती है.
अब बात करते हैं सांगरी की, जो खेजड़ी के पेड़ से मिलती है. खेजड़ी को राजस्थान में बहुत पवित्र माना जाता है और इसे रेगिस्तान का कल्पवृक्ष भी कहा जाता है. इसकी हरी फलियों को सांगरी कहा जाता है. इन्हीं फलियों को उबालकर सब्जी बनाई जाती है. वहां के लोग सांगरी को सुखाकर भी रखते हैं, जिससे यह कई महीनों तक खराब नहीं होती है. कैर और सांगरी को मिलाकर बनाई गई सब्जी राजस्थान में बहुत मशहूर है और बड़े आयोजनों में भी परोसी जाती है.
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इसके बाद बात करते हैं फूट ककड़ी की, जिसे कचरी भी कहा जाता है. यह सब्जी भी गर्म और सूखे मौसम में अच्छी तरह उग जाती हैं. फूट ककड़ी 45 से 48 डिग्री तापमान में भी आसानी से उग जाती है, इसलिए यह सूखा प्रभावित इलाकों के लिए बहुत फायदेमंद मानी जाती है. कचरी का इस्तेमाल चटनी, अचार और सब्जी बनाने में किया जाता है. इसे सुखाकर भी रखा जा सकता है, जिससे जब हरी सब्जियां मिलना मुश्किल हो जाएं, तब भी इसका इस्तेमाल किया जा सके.
इसके बाद बात करते हैं फूट ककड़ी की, जिसे कचरी भी कहा जाता है. यह सब्जी भी गर्म और सूखे मौसम में अच्छी तरह उग जाती हैं. फूट ककड़ी 45 से 48 डिग्री तापमान में भी आसानी से उग जाती है, इसलिए यह सूखा प्रभावित इलाकों के लिए बहुत फायदेमंद मानी जाती है. कचरी का इस्तेमाल चटनी, अचार और सब्जी बनाने में किया जाता है. इसे सुखाकर भी रखा जा सकता है, जिससे जब हरी सब्जियां मिलना मुश्किल हो जाएं, तब भी इसका इस्तेमाल किया जा सके.
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कुमट का पेड़ भी रेगिस्तान में आसानी से मिल जाता है. इसके फल को कुमटी या चापटिया कहा जाता है. ये फल सर्दियों के महीनों में तोड़े जाते हैं औऱ गर्मी में उगाए जाते हैं.  कुमटी को कैर, सांगरी, मेथी और गूंदा जैसी अन्य सूखी सब्जियों के साथ मिलाकर एक खास सब्जी बनाई जाती है, जिसे पंचकूटा कहते हैं. इसकी सब्जी बनाने के साथ साथ रेगिस्तान में रहने वाले लोग इन्हें सुखाकर सालभर के लिए जमा कर लेते हैं, ताकि जब खेतों में ताजी सब्जियां ना मिलें, तब भी खाने को कुछ मिल सके.
कुमट का पेड़ भी रेगिस्तान में आसानी से मिल जाता है. इसके फल को कुमटी या चापटिया कहा जाता है. ये फल सर्दियों के महीनों में तोड़े जाते हैं औऱ गर्मी में उगाए जाते हैं. कुमटी को कैर, सांगरी, मेथी और गूंदा जैसी अन्य सूखी सब्जियों के साथ मिलाकर एक खास सब्जी बनाई जाती है, जिसे पंचकूटा कहते हैं. इसकी सब्जी बनाने के साथ साथ रेगिस्तान में रहने वाले लोग इन्हें सुखाकर सालभर के लिए जमा कर लेते हैं, ताकि जब खेतों में ताजी सब्जियां ना मिलें, तब भी खाने को कुछ मिल सके.
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इन पारंपरिक सब्जियों के अलावा कुछ और सब्जियां भी रेगिस्तान में अच्छी तरह उगाई जा सकती हैं, जैसे मूंग, मोठ और ग्वार. ये सभी फसलें कम पानी में भी बढ़ जाती हैं और इनकी जड़ें जमीन के अंदर गहराई तक पानी खोज लेती हैं. इससे पौधे को सूखे के मौसम में भी पानी मिलता रहता है. साथ ही ये फसलें मिट्टी को भी उपजाऊ बनाने में मदद करती हैं, जिससे आगे की खेती में भी फायदा मिलता है. किसान इन फसलों को अपनी मुख्य फसल के साथ भी उगा सकते हैं, जिससे एक ही खेत से दो तरह की कमाई हो जाती है.
इन पारंपरिक सब्जियों के अलावा कुछ और सब्जियां भी रेगिस्तान में अच्छी तरह उगाई जा सकती हैं, जैसे मूंग, मोठ और ग्वार. ये सभी फसलें कम पानी में भी बढ़ जाती हैं और इनकी जड़ें जमीन के अंदर गहराई तक पानी खोज लेती हैं. इससे पौधे को सूखे के मौसम में भी पानी मिलता रहता है. साथ ही ये फसलें मिट्टी को भी उपजाऊ बनाने में मदद करती हैं, जिससे आगे की खेती में भी फायदा मिलता है. किसान इन फसलों को अपनी मुख्य फसल के साथ भी उगा सकते हैं, जिससे एक ही खेत से दो तरह की कमाई हो जाती है.

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