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Sperm Retrieval Coma Patient: कैसे निकाला जाता है कोमा में गए लोगों का स्पर्म, कितनी महंगी है यह तकनीक?

Sperm Retrieval From Coma Patient: दिल्ली हाई कोर्ट ने एक फैसले में कोमा में पड़े सेना के जवान का स्पर्म निकालकर सुरक्षित रखने की मंजूरी दी है. आइए जानें कि यह प्रक्रिया कितनी महंगी है.

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  • कोमा रोगी से स्पर्म निकालने को मिली कानूनी मंजूरी.
  • मानव जनन क्षमता संरक्षण पर अदालत का ऐतिहासिक फैसला.
  • सर्जिकल स्पर्म रिट्रीवल तकनीक से मिलती है पिता बनने की उम्मीद.
  • स्पर्म निकालने, संरक्षित करने व इस्तेमाल की पूरी प्रक्रिया.
  • स्पर्म रिट्रीवल की लागत शहर और अस्पताल पर निर्भर करती है.

Sperm Retrieval From Coma Patient: मेडिकल साइंस ने आज उन दीवारों को भी ढहा दिया है, जिन्हें कभी पार करना नामुमकिन माना जाता था. जब कोई व्यक्ति कोमा में चला जाता है, तो उसका शरीर बाहरी दुनिया के लिए सुन्न हो जाता है, लेकिन उसके भीतर जीवन की निरंतरता बनाए रखने की क्षमता मौजूद रहती है. दिल्ली हाई कोर्ट के ताजा फैसले ने न केवल एक महिला को मां बनने की उम्मीद दी है, बल्कि चिकित्सा जगत की उस तकनीक को भी रोशनी में लाया है. जिसके जरिए अचेत अवस्था में भी स्पर्म रिट्रीव किया जा सकता है.

अदालत का ऐतिहासिक फैसला 

दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में भारतीय सेना के एक जवान के मामले में बड़ा फैसला सुनाया है. वह जवान लंबे समय से कोमा में है और उसकी पत्नी ने वंश आगे बढ़ाने के लिए पति का स्पर्म सुरक्षित रखने की अनुमति मांगी थी. न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने श्रीमद् भागवत का उदाहरण देते हुए कहा कि केवल लिखित सहमति न होने के आधार पर एक पत्नी को उसके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता है. चूंकि दंपति पहले से आईवीएफ के जरिए माता-पिता बनने की कोशिश कर रहे थे, इसलिए कोर्ट ने इसे 'असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी एक्ट-2021' के तहत वैध सहमति माना.

क्या है सर्जिकल स्पर्म रिट्रीवल तकनीक?

जब कोई पुरुष कोमा में होता है या ऐसी स्थिति में होता है जहां वह प्राकृतिक रूप से स्पर्म देने में सक्षम नहीं है, तब डॉक्टर 'सर्जिकल स्पर्म रिट्रीवल' (SSR) का सहारा लेते हैं. यह एक छोटी लेकिन बेहद सटीक शल्य चिकित्सा प्रक्रिया है. इसमें यूरोलॉजिस्ट (मूत्र रोग विशेषज्ञ) पुरुष के प्रजनन अंगों से सीधे शुक्राणु निकालते हैं. यह तकनीक उन लोगों के लिए वरदान है जो किसी दुर्घटना या बीमारी के कारण अचेत हो चुके हैं, लेकिन उनके अंग अभी भी सक्रिय हैं. 

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PESA और TESA प्रक्रिया 

स्पर्म निकालने के मुख्य रूप से दो तरीके अपनाए जाते हैं. पहला है PESA (Percutaneous Epididymal Sperm Aspiration), जिसमें एक बहुत महीन सुई के जरिए 'एपिडिडिमिस' (अंडकोष के ऊपर की नली) से शुक्राणु खींचे जाते हैं. 

दूसरा तरीका TESA (Testicular Sperm Aspiration) कहलाता है. इस प्रक्रिया में डॉक्टर सीधे अंडकोष के ऊतकों (Tissues) से सुई डालकर शुक्राणु निकालते हैं. यह पूरी प्रक्रिया एनेस्थीसिया के प्रभाव में की जाती है ताकि मरीज को कोई दर्द न हो.

समय की अहमियत और बायोलॉजिकल क्लॉक

कोमा या ब्रेन-डेड की स्थिति में समय सबसे महत्वपूर्ण कारक होता है. डॉक्टरों के अनुसार, स्पर्म की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए यह प्रक्रिया अचेत होने या मृत्यु (विशेष स्थितियों में) के 48 से 72 घंटों के भीतर पूरी कर लेनी चाहिए. यदि समय अधिक बीत जाता है, तो शुक्राणुओं की गतिशीलता और उनकी जीवित रहने की संभावना कम होने लगती है. इसलिए, ऐसी कानूनी मंजूरियां और चिकित्सा प्रक्रियाएं बेहद तेज गति से पूरी की जानी जरूरी होती हैं.

सुरक्षित रखने का क्या है तरीका?

एक बार जब सफलतापूर्वक शुक्राणु निकाल लिए जाते हैं, तो उन्हें तुरंत इस्तेमाल करना जरूरी नहीं होता है. इन्हें 'क्रायोप्रिजर्वेशन' तकनीक के माध्यम से बेहद कम तापमान पर नाइट्रोजन टैंकों में फ्रीज कर दिया जाता है. इस प्रक्रिया से स्पर्म सालों तक सुरक्षित रह सकते हैं. जब भी पत्नी आईवीएफ या आईसीएसआई (ICSI) प्रक्रिया के लिए तैयार होती है, इन जमे हुए शुक्राणुओं को पिघलाकर (Thawing) गर्भधारण के लिए उपयोग में लाया जाता है.

इस तकनीक पर कितना आता है खर्च?

भारत में सर्जिकल स्पर्म रिट्रीवल (SSR) की लागत कई कारकों पर निर्भर करती है. आमतौर पर PESA या TESA जैसी बुनियादी प्रक्रियाओं का खर्च 25,000 रुपये से लेकर 50,000 रुपये के बीच आता है. यदि मामला जटिल हो और 'Micro-TESE' जैसी उन्नत तकनीक की आवश्यकता पड़े, जिसमें माइक्रोस्कोप का उपयोग होता है, तो यह खर्च 1.2 लाख रुपये या उससे अधिक तक जा सकता है. इसमें सर्जन की फीस, अस्पताल का चार्ज और एनेस्थीसिया का खर्च शामिल होता है.

अस्पताल और शहर के आधार पर कीमतों में होता है अंतर

इस तकनीक की लागत इस बात पर भी निर्भर करती है कि इलाज किस शहर या अस्पताल में हो रहा है. दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु जैसे मेट्रो शहरों के बड़े प्राइवेट अस्पतालों में यह प्रक्रिया महंगी हो सकती है. इसके अलावा, स्पर्म निकालने के बाद अक्सर आईसीएसआई (ICSI) पैकेज की जरूरत पड़ती है, जो कुल खर्च को बढ़ा देता है. हालांकि, सरकारी अस्पतालों या चैरिटेबल संस्थानों में यह सुविधाएं तुलनात्मक रूप से सस्ती मिल सकती हैं, लेकिन वहां उपलब्धता एक बड़ी चुनौती होती है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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