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बिना खाना खाए कितने दिन तक जिंदा रह सकता है इंसान, भूख हड़ताल से कब हो जाती है मौत

देश की राजधानी दिल्ली में नीट परीक्षा में हुई गड़बड़ी को लेकर सोनम वांगचुक CJP के साथ भूख हड़ताल पर बैठे हैं. चलिए जानें कि आखिर बिना खाने के इंसान की मौत कितने दिन में हो सकती है.

दिल्ली में इस वक्त देश के सबसे बड़े एग्जामिनेशन सिस्टम NEET को लेकर विरोध की आग सुलग रही है. जंतर-मंतर पर चल रहे इस प्रदर्शन के बीच मशहूर एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक भी भूख हड़ताल पर बैठे हैं. उनके इस कड़े कदम ने देश के सामने एक बड़ा सवाल पैदा कर दिया है कि आखिर एक इंसान बिना खाने के कितनी देर जिंदा रह सकता है? रिसर्च की मानें तो पानी के सहारे एक स्वस्थ इंसान करीब दो महीने काट सकता है, लेकिन बिना पानी के तो कुछ ही दिनों में मौत हो सकती है. 

भूख हड़ताल पर बैठा शख्स कब तक जिंदा रह सकता है?

जब कोई इंसान अन्न का एक दाना भी छोड़ देता है, तो शुरुआती तीन दिनों तक उसका शरीर खून में मौजूद ग्लूकोज से ताकत खींचता है. इस दौरान पेट में तेज मरोड़ और भूख का गहरा अहसास परेशान करता है. लेकिन असली खेल पहले हफ्ते के बाद शुरू होता है, जब शरीर अपनी ही चर्बी यानी फैट को पिघलाकर ऊर्जा बनाने लगता है. अगर हड़ताल पर बैठा व्यक्ति लगातार पानी पी रहा है, तो वह एक हफ्ते तक खुद को सामान्य महसूस करा सकता है. इस चरण में शरीर खुद को जिंदा रखने के लिए अंदरूनी स्तर पर सारे इंतजाम खुद करने में जुट जाता है.

भूख हड़ताल के तीसरे हफ्ते में कैसे होते हैं शरीर के हालात?

भूख हड़ताल जब दूसरे से तीसरे हफ्ते में कदम रखता है, तो हालात बिगड़ने लगते हैं. शरीर का पूरा फैट खत्म हो जाने के बाद, जिंदा रहने की जद्दोजहद में अंदरूनी सिस्टम मांसपेशियों और जरूरी टिश्यूज को ही खाना शुरू कर देते हैं. इससे इंसान को भयंकर कमजोरी महसूस होती है, उठने बैठने पर सिर घूमने लगता है और चक्कर आने लगते हैं. असल में शरीर अपने सबसे महत्वपूर्ण अंगों जैसे दिल और दिमाग को बचाने के लिए बाकी हिस्सों की ताकत को धीरे-धीरे सोखने लगता है, जिससे वजन तेजी से गिरने लगता है.

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कब साथ छोड़ने लगते हैं अंग?

चौथे से छठे हफ्ते के बीच भूख का असर दिमाग और नसों पर दिखने लगता है. इंसान को धुंधला दिखाई देने लगता है, कान बजने लगते हैं और लगातार उल्टी की शिकायत होने लगती है. अगर यह हड़ताल 55 दिनों के पार चली जाए तो शरीर के अंदरूनी अंग पूरी तरह से घुटने टेक देते हैं. अंत में दिल की धड़कन रुक जाती है, जिसे मेडिकल भाषा में कार्डियोवैस्कुलर फेलियर कहते हैं. यही वह आखिरी मोड़ होता है, जब भूख हड़ताल पर बैठे शख्स की मौत हो जाती है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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