Climate Change Sleep Loss: सावधान! बढ़ते तापमान ने उड़ाई इंसानों की नींद, साल में 56 घंटे कम सो रहे हैं लोग
Sleep Deprivation: एक नए एनालिसिस के अनुसार, बढ़ते तापमान की वजह से दुनिया भर में लोग औसतन साल में 56 घंटे कम सो रहे हैं. सबसे ज्यादा असर उन इलाकों में देखा गया है.

Climate Change Impact On Sleep: क्लाइमेट चेंज अब सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर लोगों की नींद पर भी साफ दिखाई देने लगा है. एक नए एनालिसिस के अनुसार, बढ़ते तापमान की वजह से दुनिया भर में लोग औसतन साल में 56 घंटे कम सो रहे हैं. सबसे ज्यादा असर उन इलाकों में देखा गया है, जहां रात का तापमान लगातार बढ़ रहा है. एक्सपर्ट का कहना है कि नींद की कमी हार्ट रोग, मेंटल हेल्थ, कमजोर इम्यूनिटी और कामकाज की क्षमता में गिरावट जैसी कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है.
1,338 प्रमुख शहरों को शामिल किया गया
क्लाइमेट सेंट्रल की ओर से किए गए इस एनालिसिस में दुनिया के 1,338 प्रमुख शहरों को शामिल किया गया. इसमें भारत के 107 शहरों का भी स्टडी किया गया. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत उन देशों में शामिल है जहां क्लाइमेट चेंज के कारण लोगों की नींद पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है. खासकर दक्षिण भारत के शहरों में रहने वाले लोग हर साल 78 से 91 घंटे तक की नींद गंवा रहे हैं, जिनमें से 8 से 9 घंटे की नींद सीधे जलवायु परिवर्तन के कारण कम हो रही है.
कौन से शहर सबसे ज्यादा प्रभावित?
रिपोर्ट के अनुसार, तमिलनाडु इस मामले में सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य है. यहां हर व्यक्ति की नींद में क्लाइमेट चेंज के कारण हर साल औसतन 7.9 घंटे की अतिरिक्त कमी दर्ज की गई है. वहीं, देश के बड़े महानगरों में चेन्नई सबसे ज्यादा प्रभावित रहा, जहां लोग साल में करीब 93 घंटे कम सो रहे हैं. इसके बाद मुंबई में 84 घंटे और कोलकाता में 80 घंटे की नींद कम होने का अनुमान लगाया गया है.
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एक समय ठंडी रातों के लिए पहचाने जाने वाले बेंगलुरु और देहरादून जैसे शहर भी अब बढ़ते तापमान की चपेट में हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, 1970 के दशक में बेंगलुरु के लोग साल में लगभग 59 घंटे की नींद गंवाते थे, लेकिन 2025 तक यह आंकड़ा बढ़कर 67 घंटे हो गया. इनमें 8 घंटे की अतिरिक्त नींद की कमी सीधे जलवायु परिवर्तन से जुड़ी है, जो देश के प्रमुख महानगरों में सबसे अधिक है. वहीं, देहरादून में पिछले पांच वर्षों के दौरान नींद की कमी में करीब 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई.
महाराष्ट्र के 22 शहरों में रहने वाले लोग औसतन 76.3 घंटे की नींद हर साल खो रहे हैं, जिनमें से 5.8 घंटे क्लाइमेट चेंज की वजह से कम हो रहे हैं. वहीं, उत्तर प्रदेश के 11 शहरों में लोगों की सालाना नींद करीब 69 घंटे कम हो रही है और इसमें 4.9 घंटे की कमी सीधे बढ़ते तापमान से जुड़ी है.
कमी अब कम से कम दोगुनी
रिपोर्ट बताती है कि 1970 के दशक की तुलना में तापमान बढ़ने के कारण होने वाली नींद की कमी अब कम से कम दोगुनी हो चुकी है. वर्ल्ड स्तर पर मध्य पूर्व के शहरों में इसका सबसे ज्यादा असर देखा गया, जबकि दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई हिस्से भी इस सूची में शामिल हैं. रिसर्चर का मानना है कि अगर रात के तापमान में इसी तरह बढ़ोतरी जारी रही, तो आने वाले वर्षों में नींद की समस्या और उससे जुड़ी स्वास्थ्य चुनौतियां और गंभीर हो सकती हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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