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शपथ ग्रहण में क्या-क्या कहते हैं मुख्यमंत्री, क्या ईश्वर का नाम लेना होता है जरूरी?

किसी भी राज्य में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले कैंडिडेट को क्या-क्या कहना होता है? शपथ ग्रहण में क्यों लिया जाता है ईश्वर का नाम?

महाराष्ट्र में आज शाम (गुरुवार) यानी 5 दिसंबर को आजाद मैदान में देवेंद्र फडणवीस का शपथ ग्रहण समारोह होगा. वह तीसरी बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे. ऐसे में सवाल यह उठता है कि शपथ ग्रहण के दौरान मुख्यमंत्री क्या-क्या कहते हैं? क्या शपथ लेते वक्त ईश्वर का नाम लेना जरूरी होता है? आइए आपको इन सवालों के जवाब से रूबरू कराते हैं.

यह है पूरा मामला

महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस तीसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे. उनके साथ अजीत पवार और एकनाथ शिंदे डिप्टी सीएम पद की शपथ लेंगे. उन्हें महाराष्ट्र के राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन शपथ दिलाएंगे. इस कार्यक्रम के लिए बीजेपी जोर-शोर से तैयारी कर रही है, जिसमें पीएम मोदी समेत बीजेपी के कई दिग्गज नेता शामिल होंगे. 

कैसी होती है शपथ ग्रहण की प्रक्रिया?

किसी भी राज्य में सरकार बनाने से पहले राज्यपाल नए मुख्यमंत्री को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाते हैं. इसके बाद उप-मुख्यमंत्री को शपथ दिलाई जाती है, जिसके बाद मंत्रियों का नंबर आता है. मंत्रियों के सीरियल की बात करें तो सबसे पहले कैबिनेट मंत्री शपथ लेते हैं. इसके बाद स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री और आखिर में राज्यमंत्रियों को शपथ दिलाई जाती है. पद और गोपनीयता की शपथ लेने के बाद मुख्यमंत्री एक संवैधानिक परिपत्र पर हस्ताक्षर करते हैं, जिसे राज्यपाल संरक्षित करते हैं. यह देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का संवैधानिक दस्तावेज होता है, जो हमेशा सुरक्षित रखा जाता है. 

पद के शपथ ग्रहण में क्या-क्या बोलते हैं मुख्यमंत्री?

जब भी कोई विधायक को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेनी होती है तो उन्हें ये बातें कहनी पड़ती हैं. 'मैं ईश्वर की शपथ लेता हूं. सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा. मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूंगा. मैं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और कर्तव्यनिष्ठा से निर्वहन करूंगा तथा मैं सभी प्रकार के लोगों के साथ संविधान और विधि के अनुसार भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना न्याय करूंगा.

गोपनीयता की शपथ में कहनी होती है यह बात

विधायक को गोपनीयता की शपथ लेते वक्त कहना होता है, 'मैं, <मंत्री का नाम>, ईश्वर की शपथ लेता हूं. सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं कि मैं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी व्यक्ति को कोई मामला नहीं बताऊंगा या प्रकट नहीं करूंगा, जो <राज्य का नाम> राज्य के मंत्री के रूप में मेरे विचाराधीन लाया जाएगा या मुझे ज्ञात होगा, सिवाय इसके कि ऐसे मंत्री के रूप में मेरे कर्तव्यों के समुचित निर्वहन के लिए ऐसा करना आवश्यक हो.'

क्या ईश्वर का नाम लेना होता है जरूरी?

अब सवाल उठता है कि क्या कोई भी शपथ लेते वक्त ईश्वर का नाम लेना जरूरी होता है? भारतीय संविधान के मुताबिक, शपथ लेते वक्त ईश्वर का नाम लेना अनिवार्य नहीं है. भारतीय संविधान के आर्टिकल 60 के मुताबिक, ईश्वर की शपथ लेना जरूरी नहीं है. देश में ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं, जब शपथ लेते वक्त ईश्वर का नाम नहीं लिया गया. साल 2020 के दौरान दिल्ली में जब आम आदमी पार्टी की सरकार बनी तो मंत्री गोपाल राय ने आजादी के लिए जान लुटाने वाले शहीदों के नाम की शपथ ली थी. इसके अलावा, साल 2023 के दौरान कर्नाटक में डिप्टी सीएम शिव कुमार ने ईश्वर की जगह आध्यात्मिक गुरु गंगाधर अज्जा का नाम लिया था.

यह भी पढ़ें: महाराष्ट्र में डिप्टी सीएम पर संशय खत्म, शपथ ग्रहण के बाद अमित शाह से मिलेंगे एकनाथ शिंदे

खबर कोई भी हो... कैसी भी हो... उसकी नब्ज पकड़ना और पाठकों को उनके मन की बात समझाना कुमार सम्भव जैन की काबिलियत है. मुहब्बत की नगरी आगरा से मैंने पत्रकारिता की दुनिया में पहला कदम रखा, जो अदब के शहर लखनऊ में परवान चढ़ा. आगरा में अकिंचन भारत नाम के छोटे से अखबार में पत्रकारिता का पाठ पढ़ा तो लखनऊ में अमर उजाला ने खबरों से खेलना सिखाया. 

2010 में कारवां देश के आखिरी छोर यानी राजस्थान के श्रीगंगानगर पहुंचा तो दैनिक भास्कर ने मेरी मेहनत में जुनून का तड़का लगा दिया. यहां करीब डेढ़ साल बिताने के बाद दिल्ली ने अपने दिल में जगह दी और नवभारत टाइम्स में नौकरी दिला दी. एनबीटी में गुजरे सात साल ने हर उस क्षेत्र में महारत दिलाई, जिसका सपना छोटे-से शहर से निकला हर लड़का देखता है. साल 2018 था और डिजिटल ने अपना रंग जमाना शुरू कर दिया था तो मैंने भी हवा के रुख पकड़ लिया और भोपाल में दैनिक भास्कर पहुंच गया. 

झीलों के शहर की खूबसूरती ने दिल और दिमाग पर काबू तो किया, लेकिन जरूरतों ने वापस दिल्ली ला पटका और जनसत्ता में काफी कुछ सीखा. यह पहला ऐसा पड़ाव था, जिसकी आदत धारा के विपरीत चलना थी. इसके बाद अमर उजाला नोएडा में करीब तीन साल गुजारे और अब एबीपी न्यूज में बतौर फीचर एडिटर लोगों के दुख-दर्द और तकलीफ का इलाज ढूंढता हूं. करीब 18 साल के इस सफर में पत्रकारिता की दुनिया के हर कोने को खंगाला, चाहे वह रिपोर्टिंग हो या डेस्क... प्रिंटिंग हो या मैनेजमेंट... 

काम की बात तो बहुत हो चुकी अब अपने बारे में भी चंद बातें बयां कर देता हूं. मिजाज से मस्तमौला तो काम में दबंग दिखना मेरी पहचान है. घूमने-फिरने का शौकीन हूं तो कभी भी आवारा हवा के झोंके की तरह कहीं न कहीं निकल जाता हूं. पढ़ना-लिखना भी बेहद पसंद है और यारों के साथ वक्त बिताना ही मेरा पैशन है. 

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