स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान कैसे हावी, बाकी खाड़ी देश क्यों नहीं दिखा पाते ताकत?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में 700 टैंकर फंसे हुए हैं. आइए जानते हैं कि यहां ईरान का दबदबा कैसे है और दूसरा कोई देश वहां अपनी ताकत क्यों नहीं दिखा पाता.

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में 700 टैंकर फंसे हुए हैं. इस वजह से लगभग 86% नॉर्मल ईस्ट वेस्ट क्रूड ट्रैफिक रुक गया है. हाल ही में अमेरिका और इजरायल के साथ जारी सैन्य संघर्ष के बाद ईरान (Israel-Iran War) के रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) को बंद करने का ऐलान कर दिया था और यह चेतावनी भी दी थी कि इस रास्ते से गुजरने की कोशिश करने वाले किसी भी जहाज को आग के हवाले कर दिया जाएगा. इसी बीच आइए जानते हैं कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान का दबदबा कैसे हैं और बाकी खाड़ी देश वहां अपनी ताकत क्यों नहीं दिखा पाते.
क्या है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज सिर्फ पानी का एक पतला सा हिस्सा नहीं है. यह दुनिया की सबसे सेंसिटिव एनर्जी आर्टरी है. अपने सबसे पतले से पॉइंट पर यह सिर्फ 30 मील चौड़ा है और इसके बावजूद भी दुनिया की रोजाना की तेल खपत का लगभग पांचवा हिस्सा इससे होकर गुजरता है. अगर यह समुद्री रास्ता थोड़ी देर के लिए भी रुकता है तो दुनिया भर में तेल की कीमतें बढ़ जाती हैं, स्टॉक मार्केट हिल जाता है और बड़ी इकोनॉमी को तुरंत झटका लगता है. इस वजह से समुद्र की इस छोटी सी पट्टी को अक्सर धरती का सबसे ताकतवर चोक पॉइंट कहा जाता है.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और आखिर में खुले हिंद महासागर से जोड़ता है. ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब, बहरीन, कतर और यूएई से निकलने वाले हर तेल टैंकर को इसी रास्ते से गुजरना पड़ता है.
ईरान के हक में स्ट्रैटेजिक ज्योग्राफिक
ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पूरे उत्तरी कोस्टलाइन को कंट्रोल करता है. इससे भी जरूरी बात यह है कि यह शिपिंग लेन के किनारे मौजूद कई जरूरी आइलैंड को भी कंट्रोल करता है. इनमें होर्मुज, केशम और लारक शामिल हैं. यह आइलैंड नेचुरल मिलिट्री आउटपोस्ट की तरह काम करते हैं. इससे ईरान स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाज पर कड़ी नजर रख सकता है और उन्हें ट्रैक करने के साथ-साथ उन्हें टारगेट भी कर सकता है.
स्ट्रेट के सबसे पतले हिस्से में नेविगेबल शिपिंग लेन ईरान और ओमान के टेरिटोरियल वॉटर में है. इंटरनेशनल मैरीटाइम कानून के तहत कोस्टल देश अपने किनारों से 12 नॉटिकल मील तक फैले पानी पर सॉवरेनिटी रखते हैं. अब क्योंकि यह स्ट्रेट काफी पतला है इस वजह से यह असल में मेन ट्रांजिट रूट को ईरानी सर्विलांस सिस्टम, मिसाइल बैटरी और नेवल एसेट्स की रेंज में रखता है.

दुनिया की एनर्जी लाइफ लाइन
फारस की खाड़ी के इलाके में दुनिया के लगभग आधे प्रूवन तेल रिजर्व और ग्लोबल नेचुरल गैस रिजर्व का लगभग 40% है. दुनिया की लगभग 20% तेल सप्लाई रोज होर्मुज से होकर गुजरती है. इसका ज्यादातर हिस्सा एशियाई इकोनॉमी के लिए है.
चीन अपने इंपॉर्टेंट कच्चे तेल का लगभग आधा हिस्सा इसी रास्ते से मंगाता है. जापान अपनी ज्यादातर एनर्जी जरूरतें इंपोर्ट करता है और इसमें से लगभग 80% इसी रास्ते से होकर गुजरती हैं. भारत भी अपना लगभग 70% तेल और लगभग आधी नेचुरल गैस गल्फ प्रोड्यूसर्स से इंपोर्ट करता है और इसी तरह साउथ कोरिया भी इसी रास्ते पर निर्भर है.
मौजूदा समय में एनर्जी ट्रांसपोर्ट की इस मात्रा को बदलने के लिए कोई भी पूरा समुद्री विकल्प नहीं है. अगर होर्मुज को हफ्तों तक ब्लॉक कर दिया गया तो इसके नतीजे मिडल ईस्ट से कहीं आगे तक फैलेंगे. इसका असर ग्लोबल सप्लाई चेन, महंगाई दर और करेंसी मार्केट पर पड़ेगा.
कैसे कर रहा है ईरान यहां पर सुरक्षा?
ईरान पारंपरिक फ्लीट लड़ाइयों के जरिए ग्लोबल नेवी सुपर पावर्स के साथ मुकाबला नहीं करता है. इसके बजाय ईरान तेज अटैक बोट्स के फ्लीट ऑपरेट करता है. ये बड़े जहाज पर हमला करने में सक्षम हैं. यह छोटी और काफी ज्यादा मैन्यूवरेबल बोट्स तेजी से टैंकरों या वॉरशिप को घेर सकती हैं. इसी के साथ स्ट्रेट का कम गहरा पानी इसे नेवल माइंस के लिए कमजोर बनाता है. कम माइन लगाने से भी ट्रैफिक में रुकावट आ सकती है और बड़े क्लीयरेंस ऑपरेशन की जरूरत पड़ सकती है.
इतना ही नहीं बल्कि ईरान ने अपने कोस्टलाइन और आईलैंड्स पर एंटी शिप क्रूज मिसाइलों, बैलिस्टिक मिसाइलों और हथियारबंद ड्रोन में भारी इन्वेस्ट किया है. दरअसल ईरान को दबदबा बनाने के लिए स्ट्रेट को हमेशा के लिए बंद करने की जरूरत ही नहीं है. रुकावट का सिर्फ भरोसेमंद खतरा ही ग्लोबल मार्केट पर असर डालने के लिए काफी है.
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दूसरे गल्फ देश ईरान का मुकाबला क्यों नहीं कर सकते?
कई गल्फ देश जियोग्राफिक फारस की गल्फ के अंदर फंसे हुए हैं. कुवैत, कतर और बहरीन के पास होर्मुज से गुजरे बिना खुले समुद्र तक सीधी पहुंच ही नहीं है. यह ज्योग्राफिक घेरा उनके स्ट्रैटेजिक ऑप्शन को लिमिट करता है. सऊदी अरब और यूएई ने लिमिटेड बाईपास पाइपलाइन बनाई है. सऊदी अरब की ईस्ट वेस्ट पाइपलाइन लाल सागर तक तेल पहुंचती है और यूएई गल्फ के बाहर तेल ले जाने के लिए हबशान फुजैरा पाइपलाइन चलाता है. लेकिन यह पाइपलाइन कुल एक्सपोर्ट वॉल्यूम का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा ही हैंडल कर सकती हैं.

काफी ज्यादा आर्थिक असमानता
जहां खाड़ी के कुछ देश अपनी नेशनल इनकम के लिए लगभग पूरी तरह से तेल के रेगुलर एक्सपोर्ट पर ही निर्भर हैं, वहीं ईरान ने पहले से ही पाबंदियों और आर्थिक दबाव में काम किया है. यही वजह है कि तेहरान होर्मुज को सिर्फ एक आर्थिक रास्ते के बजाय एक स्ट्रैटेजिक दबाव बनाने वाले टूल के तौर पर देखता है.
किसी भी संकट में खड़ी के एक्सपोर्टर्स को शिपमेंट रुकने से तुरंत फाइनेंशियल नुकसान होगा. ईरान इस खतरे का इस्तेमाल बड़े जियोपॉलिटिकल झगड़ों में फायदे के तौर पर करता है. यही संतुलन बताता है कि दूसरे खाड़ी देश स्ट्रेट में आक्रामक तरीके से ताकत क्यों नहीं दिखा सकते.
बाहरी ताकतों की भूमिका
अमेरिका इस इलाके में अपनी मजबूत नेवल मौजूदगी को बनाए रखता है. इसमें बहरीन में मौजूद पांचवां फ्लीट भी शामिल है. कतर, कुवैत, सऊदी अरब और यूएई में अमेरिकी मिलिट्री बेस का मकसद बड़े पैमाने पर गड़बड़ी को रोकना और समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना है. लेकिन एडवांस्ड नेवल पावर होने के बावजूद होर्मुज जैसे सीमित पानी में अलग-अलग तरीकों को पूरी तरह से बेअसर करना काफी मुश्किल है.
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