Chabahar Port Investment: ईरान के चाबहार पोर्ट पर भारत ने कितने करोड़ किए थे खर्च, खामेनेई के खात्मे से क्या रुक जाएगा यह प्रोजेक्ट?
Chabahar Port Investment: इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव में भारत के लिए एक बड़ी चिंता खड़ी हो गई है. चाबहार पोर्ट को लेकर खतरा बढ़ चुका है. आइए जानते हैं इसमें भारत ने कितना इन्वेस्ट किया.

Chabahar Port Investment: ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की इजरायली-अमेरिकी जॉइंट ऑपरेशन में मौत हो गई है. इजरायल और अमेरिका के इस ज्वाइंट हमले की वजह से भारत के सामने एक बड़ा संकट खड़ा हो चुका है. यह संकट है कि कहीं इसमें ईरान का चाबहार बंदरगाह भी खतरे में न आ जाए. दरअसल यह एक ऐसा प्रोजेक्ट है जो भारत को अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया से जोड़ने वाले एक अहम गेटवे का रोल निभाता है. ईरान में बढ़ते तनाव की वजह से अब यह सवाल उठ रहे हैं कि भारत ने चाबहार प्रोजेक्ट में कितना इन्वेस्टमेंट किया है? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.
चाबहार पोर्ट में भारत का कुल इन्वेस्टमेंट
भारत में पोर्ट इक्विपमेंट और डेवलपमेंट के लिए लगभग 120 मिलियन डॉलर यानी की 1100 करोड़ रुपये का अपना कमिटेड इन्वेस्टमेंट पहले ही पूरा कर लिया है. यह इन्वेस्टमेंट मुख्य रूप से पोर्ट पर टर्मिनल, क्रेन और ऑपरेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करने पर फोकस था.
इस डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट के अलावा भारत ने चाबहार से जुड़े बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को सपोर्ट करने के लिए 250 मिलियन डॉलर की क्रेडिट लाइन भी दी है. भारतीय मुद्रा में यह रकम ₹2100 करोड़ के करीब हो जाती है. इसमें ईरान के जरिए अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया में ट्रेड रूट को बेहतर बनाने के लिए डिजाइन किए गए कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट शामिल हैं.
मौजूदा फाइनेंशियल एलोकेशन कितना?
2026-27 के यूनियन बजट में भारत सरकार ने चाबहार प्रोजेक्ट के लिए कोई नया फंड एलोकेट नहीं किया है. मौजूदा फाइनेंशियल ईयर के लिए एलोकेशन जीरो है. हालांकि पिछले साल के रिवाइज्ड एस्टिमेट में प्रोजेक्ट के लिए लगभग ₹400 करोड़ तय किए गए थे.
भारत के लिए क्यों जरूरी है यह प्रोजेक्ट?
चाबहार पोर्ट भारत के लिए काफी जरूरी है. यह पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया तक सीधी पहुंच देता है. यह पोर्ट बड़े इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर से भी जुड़ा हुआ है. इसका मकसद ईरान और रूस के रास्ते भारत को यूरोप से जोड़ना है.
खामेनेई की मौत के बाद अनिश्चितता
खामेनेई की मौत ने ईरान में पॉलिटिकल अनिश्चितता को पैदा कर दिया है. सेंट्रलाइज्ड पावर स्ट्रक्चर वाले देश में लीडरशिप ट्रांजिशन लंबे समय के एग्रीमेंट पर असर डाल सकता है. भारत ने 2024 में 10 साल का ऑपरेटिंग कॉन्ट्रैक्ट साइन किया था और अब इसका जारी रहना ईरान की नई लीडरशिप की पॉलिसी पर निर्भर कर सकता है.
यूनाइटेड स्टेट सैंक्शन ईरान में भारत की भागीदारी के लिए सबसे बड़ी रूकावटों में से एक बने हुए हैं. डोनाल्ड ट्रंप के नए सैंक्शन नियम के तहत छूट की व्यवस्था खत्म कर दी गई है. इसमें वे भी शामिल हैं जो पहले चाबहार पर सीमित सहयोग की अनुमति देते थे. भारत ने सैंक्शन के दबाव के कारण पहले ही कुछ इन्वेस्टमेंट कम कर दिए हैं. अगर जियोपॉलिटिकल तनाव और बढ़ता है तो भारत डिप्लोमेटिक टकराव से बचने के लिए सतर्क रुख अपना सकता है.
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Source: IOCL
























