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जब अकेले फैसला नहीं ले सकता CEC, तो क्यों कहा जाता है उन्हें चीफ?

CEC ज्ञानेश कुमार भले ही अकेले फैसला न ले सकें, लेकिन वह चुनाव आयोग के प्रशासनिक मुखिया होते हैं. वह बैठकों की अध्यक्षता और तीनों कमिश्नरों के बीच समान शक्ति के बावजूद आयोग का प्रतिनिधित्व करते हैं.

चुनाव आयोग के अंदर मतभेदों को लेकर खबरें सामने आने के बाद सियासी हंगामा मचा हुआ है. रिपोर्ट्स में बताया गया कि दो चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार मुख्य चुनाव आयुक्त यानी CEC के फैसलों पर लिखित आपत्ति दर्ज कराई. इस खबर के बाद एक बार फिर यह सवाल उठा कि आखिर जब CEC अकेले कोई बड़ा फैसला नहीं ले सकते और उन्हें बाकी दो चुनाव आयुक्तों के साथ मिलकर ही निर्णय करना होता है, तो फिर उन्हें चीफ यानी प्रमुख क्यों कहा जाता है. आइए इस दिलचस्प सवाल को समझते हैं.

चुनाव आयोग की बनावट कैसी है?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत बना चुनाव आयोग एक मल्टी-मेंबर बॉडी है. शुरुआत में 1950 में यह सिर्फ एक सदस्य, यानी सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त वाली संस्था थी, लेकिन अक्टूबर 1993 से इसे स्थायी तौर पर तीन सदस्यों वाला आयोग बना दिया गया, जिसमें एक CEC और दो चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं. इसके बाद से आयोग एक सामूहिक निर्णय लेने वाली संस्था के तौर पर काम करता है.

चीफ होने का मतलब क्या है?

CEC को चीफ कहे जाने का मतलब यह नहीं है कि उनके पास वीटो पावर या फैसलों को पलटने का अधिकार है. दरअसल CEC को आयोग का चेयरमैन यानी अध्यक्ष माना जाता है, जिसका काम बैठकों की अध्यक्षता करना, चर्चा को दिशा देना और आयोग के प्रशासनिक कामकाज का नेतृत्व करना है. लेकिन जब बात किसी बड़े फैसले की आती है, तो यह फैसला तीनों सदस्यों की राय के आधार पर बहुमत से लिया जाता है, यानी अगर दोनों चुनाव आयुक्त किसी मुद्दे पर एकमत हों तो CEC अकेले उनके खिलाफ फैसला नहीं थोप सकते.

सुप्रीम कोर्ट ने भी की है स्पष्ट व्याख्या

टीएन शेषन बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि बाकी दोनों चुनाव आयुक्त सिर्फ सलाहकार नहीं हैं, बल्कि आयोग के पूर्ण सदस्य हैं और फैसलों में उनकी भी बराबर की भूमिका है. कोर्ट ने यह भी कहा था कि अगर सीईसी को हमेशा आखिरी फैसला लेने का अधिकार मान लिया जाए, तो बाकी दोनों आयुक्त सिर्फ दिखावटी पद बनकर रह जाएंगे. इसी वजह से CEC को बराबरी वालों में पहला कहा जाता है.

यह भी पढ़ें: क्या चुनाव आयोग में कोई छोटा-बड़ा है, SC के अनुसार किसके पास ज्यादा पावर?

तो फिर चीफ कहलाने की वजह क्या है?

CEC को चीफ कहे जाने की असली वजह उनका प्रशासनिक नेतृत्व और आयोग का सार्वजनिक चेहरा होना है. वे ही आयोग की तरफ से आधिकारिक घोषणाएं करते हैं, बैठकों की अध्यक्षता करते हैं और आयोग के रोजमर्रा के कामकाज का संचालन करते हैं. लेकिन जहां तक फैसलों की बात है, वहां चुनाव आयोग एक टीम की तरह काम करता है, जहां CEC सिर्फ कप्तान की भूमिका निभाते हैं, अकेले फैसला लेने वाले किसी सर्वोच्च अधिकारी की नहीं. यही वजह है कि चीफ का पद होते हुए भी उन्हें हर बड़े फैसले के लिए बाकी दो सदस्यों की सहमति या बहुमत की जरूरत पड़ती है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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