क्या चुनाव आयोग में कोई छोटा-बड़ा है, SC के अनुसार किसके पास ज्यादा पावर?
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के अनुसार चुनाव आयोग में कोई छोटा-बड़ा नहीं है; मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य दोनों चुनाव आयुक्तों के पास फैसले लेने में बिल्कुल बराबर पावर होती है.

भारतीय चुनाव आयोग ECI में जब भी शक्तियों और अधिकारों की बात आती है, तो देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट का फैसला ही सबसे अहम माना जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने T.N. Seshan केस में एक ऐतिहासिक फैसला लिया कि चुनाव आयोग को चलाने वाले तीनों शीर्ष अधिकारी मुख्य चुनाव आयुक्त और दो अन्य चुनाव आयुक्त के पास फैसला लेने की शक्तियां बिल्कुल एक बराबर हैं. अदालत का मानना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के पास कोई ऐसी विशेष या तानाशाही पावर नहीं है और वे बाकी दो कमीश्नरों के फैसलों को दबा सकें.
क्या चुनाव आयुक्तों में कोई छोटा बड़ा है?
अक्सर लोगों को नाम से ऐसा लग सकता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त सबसे सीनियर या सबसे शक्तिशाली होगें. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त को आप बस सिर्फ बराबरी के लोगों के पहले कह सकते हैं. इसका सीधा मतलब यह है कि वह बस आयोग की बैठकों की अध्यक्षता करते हैं और कामकाज को संभालते हैं.
जब भी देश में चुनाव कराने, किसी नेता पर बैन लगाने या किसी पार्टी के विवाद को सुलझाने की बात आती है, तो तीनों कमिश्नरों के पास एक-एक वोट की पावर होती है. मुख्य चुनाव आयुक्त अपने स्तर पर अकेले कोई भी ऐसा बड़ा फैसला नहीं थोप सकते जिससे बाकी दोनों कमिश्नर असहमत हों.

क्या कहता है नियम?
भारतीय संविधान के चुनाव आयोग के नियम धारा 17 के अनुसार, चुनाव से जुड़ा कोई भी नीतिगत या महत्वपूर्ण निर्णय केवल मुख्य चुनाव आयुक्त की मर्जी से नहीं थोपा जा सकता. आयोग के सामने जब भी कोई शिकायत या प्रस्ताव आता है, तो तीनों कमिश्नर एक साथ बैठकर उस पर विचार करते हैं. वहीं धारा 18 (1) के तहत निर्वाचन आयोग के पास यह अधिकार है कि वह सर्वसम्मति से अपने काम करने के तरीकों के नियम तय कर सके. इसके साथ ही, वह यह भी तय कर सकता है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के बीच कामों का बंटवारा किस तरह से किया जाएगा. धारा 18(2) के अनुसार तीनों कमिश्नरों के पास एक-एक वोट की ताकत होती है. मुख्य चुनाव आयुक्त के पास ऐसी कोई विशेष या वीटो पावर नहीं होती जिससे वे बाकी दोनों कमिश्नरों के सामूहिक फैसले को अकेले खारिज कर सकें.
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अगर किसी बात पर न बने सहमति तो कैसे लिया जाता है फैसला
चुनाव के दौरान कई बार ऐसे मामले सामने आते हैं जहां तीनों चुनाव आयुक्तों के विचार एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हो जाते हैं और उनके बीच आम सहमति नहीं बन पाती. ऐसे समय में आयोग में धारा 18(2) के तहत बहुमत का नियम काम करता है. जैसे कि अगर किसी मुद्दे पर मुख्य चुनाव आयुक्त एक तरफ हों और बाकी दोनों चुनाव आयुक्त उनके फैसले के खिलाफ हों, तो जीत हमेशा उन दोनों चुनाव आयुक्तों के राय की होगी. चुनाव आयोग में कोई भी अंतिम निर्णय 2 बनाम 1 के बहुमत के आधार पर ही कानूनी रूप पास माना जाता है.
क्या है पूरा मामला, क्यों हो रही है चर्चा?
यह चर्चा अचानक इसलिए तेज हो गई क्योंकि आज 23 सितंबर को मीडिया और अखबारों में एक बहुत बड़ा खुलासा हुआ है. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पिछले 10 महिनों के दौरान चुनाव आयोग के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था. चुनाव आयोग के तीन सदस्यों में से दो चुनाव आयुक्तों- सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर कम से कम 14 बार लिखित रूप से अपनी आपत्ति दर्ज कराई है.
इस खुलासे के बाद देश की राजनीति में हलचल मच गई और विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग चलाने और सुप्रीम कोर्ट से इस मामले पर हस्तक्षेप करने की मांग कर रहे हैं.
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