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क्या है अमर धान, बाढ़ के पानी में भी 20 दिन तक क्यों नहीं सड़ती चावल की यह फसल?

Amar Dhan Farming Tips: बाढ़ के पानी में आम धान जहां हफ्ते भर में सड़ जाता है. वहीं अमर धान 20 दिनों तक पूरी तरह डूबे रहने पर भी नहीं गलता. जान लें इस किस्म में क्या होती है खासियत.

Amar Dhan Farming Tips: धान की खेती करने वाले किसानों के लिए सबसे बड़ी चिंता अचानक आने वाली बाढ़ होती है. कई बार खेत 15 से 20 दिनों तक पानी में डूबे रहते हैं और पूरी फसल खराब हो जाती है. ऐसे में अमर धान किस्म किसानों के बीच तेजी से चर्चा में है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह मानी जाती है कि यह लंबे समय तक पानी में डूबी रहने के बाद भी जीवित रह सकती है और पानी उतरते ही फिर से बढ़ने लगती है. 

यही वजह है कि बाढ़ प्रभावित इलाकों में इसे उम्मीद की नई किरण माना जा रहा है. यह किस्म खास तौर पर उन किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है. जिनके खेत हर साल जलभराव या नदी के बढ़ते पानी की चपेट में आ जाते हैं. बदलते मौसम और अनियमित बारिश के दौर में ऐसी धान किस्में किसानों का जोखिम कम करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं. 

20 दिन तक पानी में डूबने पर भी कैसे बच जाती है फसल?

अमर धान की सबसे बड़ी ताकत इसकी बाढ़ सहन करने की क्षमता है. सामान्य धान की फसल कुछ दिनों तक पानी में डूबी रहे तो पौधे गलने और सड़ने लगते हैं. लेकिन इस किस्म में ऐसे आनुवंशिक गुण मौजूद हैं जो इसे लंबे समय तक जीवित रहने में मदद करते हैं. पौधा अपनी ऊर्जा को संभालकर रखता है और ऑक्सीजन की कमी वाले माहौल में भी कुछ समय तक टिक सकता है. 

जैसे ही खेत से पानी निकलता है पौधा दोबारा तेजी से बढ़ने लगता है. यही वजह है कि लगभग 20 दिन तक जलमग्न रहने के बाद भी इसकी फसल पूरी तरह खत्म नहीं होती. बाढ़ वाले क्षेत्रों के किसानों के लिए यह धान बेहद उपयोगी माना जाता है. भारी बारिश में भी इस फसल बचने की संभावना काफी बढ़ जाती है और नुकसान कम होता है.

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किसानों के लिए क्यों बन रही है भरोसेमंद किस्म?

हर साल बाढ़ की वजह से किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है. कई बार दोबारा बुवाई करनी पड़ती है.  जिससे बीज, मजदूरी और सिंचाई पर एक्सट्रा खर्च बढ़ जाता है. अमर धान जैसी किस्म अपनाने से थोड़ी राहत मिल सकती है. अगर खेत कुछ दिनों तक पानी में डूब भी जाए. तब भी पूरी फसल खत्म होने का खतरा कम रहता है. 

इससे उत्पादन बेहतर रहने की संभावना बढ़ती है और किसान की मेहनत भी बच जाती है. क्लामेट चेंज की वजह से बाढ़ की घटनाएं बढ़ रही हैं. इसलिए वैज्ञानिक भी ऐसी धान किस्मों पर लगातार काम कर रहे हैं. यही वजह है कि पूर्वी भारत और बाढ़ प्रभावित इलाकों में अमर धान जैसी किस्में किसान ज्यादा उगा रहे हैं.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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