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रेतीली मिट्टी में उगायें लाल फल, ये तकनीक बदल देगी किस्मत, किसान भाई जानें तरीका

Dragon Fruit Farming Tips: रेतीली और बंजर जमीन पर ड्रैगन फ्रूट की आधुनिक खेती किसानों के लिए बंपर कमाई का नया जरिया बन चुकी है. पिलर और ड्रिप इरिगेशन तकनीक से रिकॉर्ड पैदावार ले सकते हैं.

Dragon Fruit Farming Tips: आजकल खेती-किसानी में वही किसान आगे बढ़ रहा है जो लीक से हटकर कुछ नया और स्मार्ट कर रहा है. अगर आपके पास भी ऐसी रेतीली या बंजर जमीन है जिसे आप बेकार समझते हैं, तो यह खबर आपकी किस्मत बदल सकती है. गुजरात के प्रगतिशील किसानों ने एक ऐसी कमाल की तकनीक अपनाई है, जिससे रेत में भी लाल सोना यानी ड्रैगन फ्रूट की बंपर पैदावार ली जा रही है. 

यह विदेशी फल अपनी जबरदस्त डिमांड और ऊंचे दामों की वजह से भारतीय मार्केट में तहलका मचा रहा है. इस फल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे बहुत कम पानी की जरूरत होती है. जिससे यह सूखे और रेतीले इलाकों के लिए एक परफेक्ट कैश क्रॉप बन चुका है. अगर आप भी पारंपरिक फसलों के घाटे से परेशान हैं. तो इस खेती को अपनाकर अपनी बंजर जमीन से मोटा मुनाफा कमा सकते हैं.

रेतीली जमीन के लिए बेस्ट है ड्रैगन फ्रूट 

ड्रैगन फ्रूट मूल रूप से कैक्टस प्रजाति का पौधा है, इसलिए इसे पनपने के लिए बहुत ज्यादा उपजाऊ जमीन या पानी की जरूरत नहीं होती. रेतीली और अर्ध-शुष्क मिट्टी जहां दूसरी फसलें दम तोड़ देती हैं, इस फल के लिए सबसे बेस्ट मानी जाती है. इस खेती की शुरुआत करने के लिए खेत में कंक्रीट के खंभे (पोल) लगाए जाते हैं और उनके ऊपर एक चक्र या रिंग फिट की जाती है. 

इन खंभों के सहारे ड्रैगन फ्रूट के पौधों को ऊपर चढ़ाया जाता है. रेतीली जमीन में पानी को रोकने की क्षमता कम होती है, इसलिए यह पौधा वहां आसानी से सरवाइव कर लेता है क्योंकि इसकी जड़ों को ज्यादा पानी मिलने पर सड़ने का खतरा रहता है.

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हाईटेक पिलर और ड्रिप इरिगेशन तकनीक

इस खेती को सुपर-सक्सेसफुल बनाने के लिए गुजरात के किसानों ने पिलर सिस्टम के साथ 'ड्रिप इरिगेशन' यानी टपक सिंचाई तकनीक को जोड़ा है. इस मॉडर्न सेटअप से हर पौधे की जड़ तक सिर्फ उतना ही पानी पहुंचता है जितनी उसे जरूरत होती है, जिससे पानी की बर्बादी बिल्कुल शून्य हो जाती है. 

एक बार खेत में खंभे और ड्रिप लाइन सेट हो जाने के बाद यह पूरा सिस्टम अगले 20 से 25 सालों तक लगातार फल देता रहता है. इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें लेबर का खर्च बहुत कम हो जाता है और पौधों को खाद या जरूरी न्यूट्रिशन देना भी बेहद आसान हो जाता है, जिससे हर साल फलों का साइज और क्वालिटी दोनों शानदार मिलते हैं.

इतना होता है मुनाफा 

अगर आप एक एकड़ खेत में ड्रैगन फ्रूट की खेती शुरू करते हैं तो इसमें करीब 450 से 500 कंक्रीट के खंभे लगाए जाते हैं और हर खंभे पर 4 पौधे लगते हैं. यानी पूरे एक एकड़ में करीब 1800 से 2000 पौधे लगाए जाते हैं. पहले साल में खेत तैयार करने पोल लगाने ड्रिप सिस्टम बिछाने और पौधे खरीदने में लगभग 4 से 5 लाख रुपये का शुरुआती खर्च आता है. जो कि सिर्फ एक बार का इन्वेस्टमेंट है. 

दूसरे-तीसरे साल से ही पौधे फल देना शुरू कर देते हैं जिससे सालाना कमाई 6 लाख से 8 लाख रुपये होने लगती है. चौथे और पांचवें साल तक पैदावार बढ़कर करीब 8 से 10 टन प्रति एकड़ तक पहुंच जाती है, जिससे हर साल 10 लाख रुपये से ज्यादा का शुद्ध मुनाफा सीधे किसानों की जेब में आता है.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

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