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सांस्कृतिक राष्ट्रवादी संगठन ने SIR पूरे करने की समय सीमा बढ़ाने की मांग की, BLO की आत्महत्या पर उठाए सवाल

Rajasthan News: ABRSM ने कहा कि चुनाव आयोग ने SIR को लेकर लोगों को जागरूक भी नहीं किया है, जिसकी वजह से बीएलओ और वोटर्स दोनों को ही दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है.

देश के कई राज्यों में हो रही वोटर लिस्ट की एसआईआर पर छिड़े सियासी घमासान के बीच खुद को सांस्कृतिक राष्ट्रवादी संस्था बताने वाले शिक्षकों के संगठन ने भी सवाल उठाए हैं. अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (ABRSM) ने SIR की समय सीमा बढ़ाए जाने की मांग की है. संगठन ने साफ तौर पर कहा है कि इतने कम समय में एसआईआर का काम पूरा होना अव्यवहारिक है. साथ ही मौत का शिकार हुए बीएलओ के परिजनों को एक करोड़ रुपए का मुआवजा दिए जाने और आश्रित को सरकारी नौकरी देने की मांग की गई है. इस संगठन का साफ कहना है कि वो एसआईआर के खिलाफ नहीं है, बल्कि इसकी समय सीमा बढ़ाए जाने को लेकर मांग कर रहा है.

इसमें यह भी कहा गया है कि चुनाव आयोग ने एसआईआर को लेकर लोगों को जागरूक भी नहीं किया है, जिसकी वजह से बीएलओ और वोटर्स दोनों को ही दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. समय सीमा और संसाधनों की कमी और अधिकारियों के रवैए का जिक्र करते हुए बीएलओ का काम करने वाले शिक्षकों के मानवाधिकारों का हनन बताया गया है.

संघ से जुड़े संगठन ने EC को लिखे पत्र में क्या मांगें रखी?

सवाल उठाते हुए कहा गया है कि चुनाव आयोग की इस तरह की कार्यप्रणाली लोकतांत्रिक संस्थानों में नैतिक मानदंडों के मुताबिक नहीं है. महासंघ ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर एसआईआर की प्रक्रिया की समय अवधि को बढ़ाए जाने की मांग की है. पत्र के जरिए मुख्य रूप से 6 प्रमुख मांगे रखी गई हैं-

  • एसआईआर की अंतिम तिथि को बढ़ाए जाने की मांग की गई है, ताकि यह काम बिना दबाव के सटीक तरीके से गुणवत्ता के साथ हो सके
  • SIR के दबाव के चलते जिन BLO शिक्षकों का असामयिक निधन या आत्महत्या हुई है, उनके परिवार को एक करोड़ रुपये का अनुग्रह मुआवजा और एक आश्रित को सरकारी नौकरी दी जाए. जिन BLO ने काम के दबाव में आकर खुदकुशी की है या बीमार हुए हैं, उनके मामलों की उच्च स्तरीय जांच हो और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो.
  • हर बूथ या ब्लॉक पर तकनीकी सहायक, कंप्यूटर ऑपरेटर या बीएलओ सहयोगी उपलब्ध कराए जाएं. इसके लिए प्रशिक्षित युवाओं, कंप्यूटर साइंस के स्टूडेंट्स अथवा बेरोजगार भत्ता प्राप्त युवाओं में से चयन किया जा सकता है. बीएलओ को 5 जी नेटवर्क की सुविधा, टैबलेट या लैपटॉप, यात्रा भत्ता तथा अन्य जरूरी संसाधन प्रदान किए जाएं.
  • अधिकारियों के स्पष्ट निर्देष दिए जाएं कि वे किसी भी तरह की धमकी, प्रताड़ना, अपमानजनक भाषा या दंडात्मक कार्यवाही से परहेज करें.
  • बीएलओ शिक्षकों को कार्यभार और चुनौतियों के अनुरुप सम्मानजनक अतिरिक्त मानदेय दिया जाए.
  • दुर्गम पहाड़ी, मरूस्थलीय और दुरस्थ जगहों पर जहां अधिक समस्या है, वहां अतिरिक्त बीएलओ की तैनाती की जाए. 

24 नवंबर को भेजा गया पत्र

यह पत्र 24 नवंबर को भेजा गया है. इसमें ये भी कहा गया है कि इस बार तकनीकी और प्रशासनिक दिक्कतों के चलते बीएलओ को काम करने में खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. बीएलओ बेहद मुश्किल हालात में काम कर रहे हैं. चुनाव आयोग के सामने चार प्रमुख समस्याओं को रखा गया है. इसमें कहा गया है कि तकनीकी सुविधाओं की कमी और अधिकारियों के दबाव और उत्पीड़न की वजह से बीएलओ का काम कर रहे टीचर्स मानसिक दबाव में हैं.

बीएलओ के साथ अपमानजनकर व्यवहार का भी आरोप

इसमें ये भी कहा गया है कि अधिकारी अपमानजनक व्यवहार कर रहे हैं जो न सिर्फ शिक्षकों के मानवाधिकारों का खुले तौर पर उल्लंघन है बल्कि उन्हें विचलित करने वाला भी है. इस तरह की कार्यप्रणाली लोकतांत्रिक संस्थाओं में कतई नैतिक मानदंडों के मुताबिक नहीं है. तकनीकी खामियों और संसाधनों की कमी को उजागर करते हुए कहा गया है कि बीएलओ एप और पोर्टल बार-बार क्रैश हो जा रहा है. कनेक्टिविटी में दिक्कत हो रही है. दूर दराज के इलाकों में नेटवर्क नहीं आ रहा है. बीएलओ को अपने संसाधनों से काम करना पड़ रहा है. ऑनलाइन सत्यापन में दिक्कत हो रही है.

'अधिकारी जो दबाव बना रहे हैं वह कतई उचित नहीं'

;चुनाव आयोग को लिखे पत्र में ये भी कहा गया है कि व्यावहारिक लक्ष्य को समय से पूरा करने के लिए अधिकारी जो दबाव बना रहे हैं वह कतई उचित नहीं है, ये शिक्षकों के सम्मान के खिलाफ है और उनका उत्पीड़न है. यह निर्वाचन की गरिमा के मुताबिक भी नहीं है. दो दशक पुराने रिकॉर्ड मांगे जाने पर भी पत्र के जरिए सवाल उठाए गए हैं 

संगठन के महासचिव प्रोफेसर गीता भट्ट ने कहा, ''उम्मीद है कि चुनाव आयोग इस पत्र को संज्ञान में लेगा. इसके जरिए उठाई गई समस्याओं पर ध्यान देगा और समय सीमा को जरूर बढ़ाएगा. बहरहाल आरएसएस के सहयोगी संगठन द्वारा सवाल उठाए जाने और एसआईआर की समय सीमा बढ़ाए जाने की मांग के बाद इसे लेकर नए सिरे से बहस छिड़ गई है. इस मुद्दे पर अब सियासत और गरमाने की संभावना जताई जा रही है.

मोहम्मद मोईन को पत्रकारिता का करीब तीन दशक का अनुभव है. वह प्रिंट - इलेक्ट्रानिक और डिजिटल तीनों ही माध्यमों में सालों तक काम कर चुके हैं. ABP नेटवर्क से वह पिछले करीब 18 सालों, स्टार न्यूज़ के समय से ही जुड़े हुए हैं. राजनीति - धर्म और लीगल टापिक के साथ सम सामयिक विषयों के एक्सपर्ट हैं. पत्रकार होने के साथ ही राजनीतिक विश्लेषक, एक्सपर्ट पैनलिस्ट, आलोचक और टिप्पणीकार भी हैं. इनकी चुनावी भविष्यवाणी ज्यादातर मौकों पर सटीक साबित हुई है. 8 लोकसभा चुनाव और कई विधानसभा चुनाव कवर कर चुके हैं. 7 कुंभ और महाकुंभ की कवरेज कर अपनी अलग पहचान बनाई है. यह अपनी बेबाक- निष्पक्ष और तथ्यपरक पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं. मोहम्मद मोईन ने चार विषयों पत्रकारिता एवं जनसंचार, राजनीति विज्ञान, हिंदी और मध्यकालीन व आधुनिक इतिहास विषयों में मास्टर डिग्री यानी स्नातकोत्तर किया हुआ है. लॉ ग्रेजुएट भी हैं. देश के कई राज्यों में काम करने का अनुभव रखते हैं. देश की तमाम नामचीन हस्तियों का इंटरव्यू ले चुके हैं और कई चर्चित घटनाओं को कवर चुके हैं. 

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